मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य जमावड़ा तेज: ट्रम्प ने दूसरा एयरक्राफ्ट कैरियर भेजा, ईरान संग तनाव गहरा

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परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने नौसैनिक ताकत बढ़ाई; बातचीत और दबाव साथ-साथ

मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी को और मजबूत किया है। अधिकारियों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, अमेरिका ने अपना सबसे बड़ा परमाणु-संचालित एयरक्राफ्ट कैरियर क्षेत्र की ओर रवाना किया है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर बयानबाज़ी तेज हो गई है।

सूत्रों के अनुसार, नया कैरियर लगभग एक सप्ताह में तैनाती क्षेत्र तक पहुंच सकता है। पहले से मौजूद नौसैनिक संसाधनों के साथ इसकी तैनाती अमेरिका की रणनीतिक शक्ति-प्रदर्शन का संकेत मानी जा रही है। रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि सीमित संख्या में उपलब्ध अमेरिकी कैरियरों की तैनाती सामान्यतः दीर्घकालिक योजना के तहत होती है, इसलिए मौजूदा कदम को विशेष परिस्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है।

अमेरिकी प्रशासन की ओर से हाल के दिनों में कूटनीतिक और सैन्य दोनों मोर्चों पर सक्रियता बढ़ी है। डोनाल्ड ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से संकेत दिया कि यदि वार्ता में प्रगति नहीं होती तो अतिरिक्त सैन्य विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि समझौते की संभावना बनी हुई है, लेकिन असफलता की स्थिति में हालात “गंभीर” हो सकते हैं।

अमेरिका ने संभावित समझौते के लिए कुछ प्रमुख शर्तें रखी हैं, जिनमें यूरेनियम संवर्धन पर रोक, संवर्धित सामग्री का निष्कासन, लंबी दूरी की मिसाइल क्षमताओं पर नियंत्रण और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों को समर्थन सीमित करना शामिल बताया गया है। इसके जवाब में तेहरान ने कहा है कि दबाव की नीति से उसकी परमाणु नीति में बदलाव नहीं होगा और किसी भी समझौते के लिए पारस्परिक सम्मान आवश्यक है।

इस बीच क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ढांचे में भी गतिविधि बढ़ी है। सैटेलाइट विश्लेषण के अनुसार अल‑उदीद एयर बेस पर मिसाइल प्रणालियों की तैनाती में बदलाव देखा गया है, जिससे तेज़ी से स्थान परिवर्तन की क्षमता बढ़ती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम संभावित जोखिमों के प्रति तत्परता दर्शाता है।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकारों के अनुसार, सैन्य तैनाती और कूटनीतिक संकेत एक साथ चल रहे हैं। एक ओर वार्ता की संभावना खुली रखी गई है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बनाए रखने की रणनीति अपनाई जा रही है। ऊर्जा आपूर्ति मार्गों और समुद्री सुरक्षा के कारण यह क्षेत्र वैश्विक राजनीति का संवेदनशील केंद्र बना हुआ है।

भारत समेत कई देशों की नजर इस घटनाक्रम पर है, क्योंकि मध्य-पूर्व में अस्थिरता का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा बाजार और सामरिक संतुलन पर पड़ सकता है। आने वाले सप्ताहों में सैन्य गतिविधि और कूटनीतिक संपर्कों की दिशा से स्थिति की गंभीरता का आकलन किया जाएगा।

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