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प्राकृतिक नियम का उल्लंघन: तीसरे ध्रुव—हिमालय को बचाने की अपील
डिजिटल डेस्क
फ्यूरो इनोवेशन्स (Phuro Innovations) की संस्थापक रचना शर्मा ने शुक्रवार को एक आपातकालीन वैश्विक ब्रीफिंग जारी करते हुए चेतावनी दी कि दुनिया अब उस चरण में प्रवेश कर चुकी है जिसे उन्होंने “प्राकृतिक नियम का उल्लंघन” कहा। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र—जिसे “तीसरा ध्रुव” भी कहा जाता है—तेजी से एक गंभीर जलवायु, भूकंपीय और भू-राजनीतिक संकट केंद्र बनता जा रहा है।
शर्मा ने ये चिंताएं एक लाइव ऑनलाइन प्रेस रिलीज़ को संबोधित करते हुए रखीं।
उन्होंने कहा कि पृथ्वी ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा निर्धारित 1.5°C की “कानूनी तापमान सीमा” को पार कर लिया है। उनके अनुसार यह उल्लंघन न केवल पारिस्थितिक संतुलन को खतरे में डालता है, बल्कि ग्रह की टेक्टोनिक (भू-गर्भीय) और जैविक नींव को भी अस्थिर करता है। उन्होंने इस स्थिति को “प्लैनेट इंजीनियरिंग” की संज्ञा दी।
फ्यूरो इनोवेशन्स के अनुसार, उसका शोध ढांचा “शिवा और गैया परिकल्पना (SHIVA & GAIA Hypothesis)” पर आधारित है। शर्मा ने तर्क दिया कि मानव गतिविधियों ने लाखों वर्षों में स्वाभाविक रूप से संचित हुए कार्बन को मात्र 175 वर्षों में वायुमंडल में संकुचित कर दिया है, जिससे वायुमंडलीय कार्बन स्तर पिछले 45 लाख वर्षों में कभी न देखे गए स्तर तक पहुँच गया है।
हिमालय को निर्णायक मोड़ (टिपिंग पॉइंट) के रूप में चिन्हित किया गया
ब्रीफिंग में हिमालयी क्षेत्र पर विशेष जोर दिया गया, जिसे शर्मा ने मौजूदा संकट का केंद्र बताया। हालिया भूकंपीय मैपिंग का हवाला देते हुए उन्होंने BIS के वैज्ञानिक आंकड़ों को उद्धृत किया, जिनके अनुसार पूरा हिमालयी क्षेत्र अब ज़ोन VI में आता है—जो सबसे उच्च भूकंपीय जोखिम श्रेणी है। इससे भारत के लगभग 61% भूभाग और लगभग 70% आबादी को बड़े भूकंपों का गंभीर खतरा हो सकता है।
उन्होंने MIT Sloan के En-ROADS जैसे जलवायु मॉडलिंग टूल्स और NASA के सिमुलेशन्स का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, दक्षिण एशिया के उच्च हिमालयी क्षेत्र वैश्विक औसत से अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं। ये टूल्स मानवता द्वारा पिछले 200 वर्षों में किए गए कार्बन उपभोग के आंकड़ों को होस्ट करते हैं।
शर्मा ने कहा कि हिमालय में तेजी से हो रहा ग्लेशियर पिघलाव और परमाफ़्रॉस्ट का गलना, फंसे हुए मीथेन और कार्बन को मुक्त कर रहा है, जिससे एक खतरनाक फीडबैक लूप बन रहा है जो तापमान वृद्धि को और तेज करता है। उन्होंने कहा,
“यहीं भूगोल और भू-राजनीति एक-दूसरे से टकराते हैं।”
उत्सर्जन की जिम्मेदारी और चीन की भूमिका
शर्मा ने चीन को दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक बताया। उन्होंने कहा कि 2030 तक उत्सर्जन चरम (पीक) पर पहुंचाने में देरी करना “प्राकृतिक नियम” द्वारा लगाए गए तात्कालिक दबाव के अनुरूप नहीं है।
साथ ही, उन्होंने इस स्थिति को चीन के लिए एक अवसर के रूप में भी प्रस्तुत किया—जहाँ वह अपनी विनिर्माण क्षमता का उपयोग कर हरित हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था का नेतृत्व कर सकता है और दुनिया को सस्ती हरित ऊर्जा उपलब्ध करा सकता है।
कूटनीति की अपील और राष्ट्रपति मैक्रों की भूमिका
तटस्थ कूटनीति की मांग करते हुए, शर्मा ने औपचारिक रूप से फ्रांस और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से अपील की कि वे वैश्विक जलवायु शासन के हिस्से के रूप में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा हेतु चीन के साथ वार्ता शुरू करें। चीन द्वारा “नए विश्व नेतृत्व” के प्रस्ताव की पृष्ठभूमि में उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति मैक्रों को आगे आकर ग्रह की रक्षा के लिए निर्णायक भूमिका निभानी चाहिए।
उन्होंने समाधान के रूप में एक “पारिस्थितिक ढांचा (Ecological Framework)” प्रस्तावित किया, जिसे उन्होंने “शांति का वेन आरेख (Venn Diagram of Peace)” नाम दिया। यह एक नया अंतर-सरकारी संगठन होगा, जो “प्राकृतिक नियम” की राजनीतिक दर्शनशास्त्र पर आधारित होगा, NASA और En-ROADS के वैज्ञानिक आंकड़ों से समर्थित होगा, और तीसरे ध्रुव जैसे संवेदनशील विषय पर तटस्थ भू-राजनीतिक कूटनीति के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित करेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नेतृत्व की अपील करते हुए, शर्मा ने भारतीय परंपरा में हिमालय के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित किया और पर्वतमाला को “देवताओं की आत्मा” कहा।
उन्होंने जलवायु जोखिमों और क्षेत्रीय स्थिरता से निपटने के लिए एक सहयोगात्मक ढांचे की वकालत की—जिसमें चीन की विनिर्माण शक्ति, फ्रांस की कूटनीतिक क्षमता और भारत की आध्यात्मिक विरासत को एक साथ जोड़ा जाए।
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