आखिर क्यों आज की युवा पीढ़ी को 90 के दशक के गाने और कव्वालियां ज्यादा पसंद आ रही हैं?

Vaishnavi Joshi

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तेज रफ्तार जिंदगी, मानसिक तनाव और सुकून की तलाश के बीच पुराना संगीत फिर बन रहा युवाओं की पहली पसंद, सोशल मीडिया ने भी बढ़ाई इसकी लोकप्रियता।

आज अगर आप सोशल मीडिया खोलें या किसी लंबी ड्राइव पर निकलें, तो एक दिलचस्प बदलाव आसानी से दिखाई देता है। पहले जहां नई रिलीज़ होने वाली फिल्मों के गाने लोगों की प्लेलिस्ट पर छाए रहते थे, वहीं अब बड़ी संख्या में लोग 90 के दशक के गाने, पुराने रोमांटिक गीत, सूफी संगीत और कव्वालियां सुनना पसंद कर रहे हैं। चाहे कार में सफर हो, रात का सन्नाटा हो या फिर काम के बीच कुछ पल सुकून के चाहिए हों, लोग बार-बार उन्हीं पुराने गीतों की ओर लौट रहे हैं।

मेरी राय में इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि पुराने गानों में भावनाएं ज्यादा और दिखावा कम होता था। उस दौर का संगीत केवल मनोरंजन के लिए नहीं बनाया जाता था, बल्कि हर गीत के पीछे एक कहानी, एक एहसास और एक संदेश होता था। गीतों के बोल इतने सरल और गहरे होते थे कि सुनने वाला खुद को उनसे जोड़ लेता था। आज भी जब कुमार सानू, उदित नारायण, अलका याज्ञनिक, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार या जगजीत सिंह की आवाज़ सुनाई देती है, तो मन अपने आप शांत हो जाता है।

आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में लोगों के पास तनाव पहले से कहीं ज्यादा है। नौकरी का दबाव, पढ़ाई की प्रतिस्पर्धा, सोशल मीडिया की तुलना और भविष्य की चिंता हर उम्र के लोगों को प्रभावित कर रही है। ऐसे माहौल में पुराने गाने और कव्वालियां मानसिक शांति देने का काम करते हैं। इनमें शोर कम और सुकून ज्यादा होता है। शायद यही वजह है कि युवा भी अब इन्हें सुनने लगे हैं, जबकि उन्होंने वह दौर देखा भी नहीं।

कव्वालियों की लोकप्रियता बढ़ने के पीछे भी यही कारण है। सूफी संगीत और कव्वालियां केवल धार्मिक संगीत नहीं हैं, बल्कि इनमें इंसानियत, मोहब्बत, आत्मिक शांति और जीवन के गहरे अर्थ छिपे होते हैं। जब कोई व्यक्ति नुसरत फ़तेह अली खान, साबरी ब्रदर्स या अज़ीज़ मियां की कव्वाली सुनता है, तो वह केवल संगीत नहीं सुन रहा होता, बल्कि भावनाओं के एक अलग संसार में प्रवेश कर जाता है। यही अनुभव आज की पीढ़ी को आकर्षित कर रहा है।

सोशल मीडिया ने भी इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभाई है। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और फेसबुक वीडियो पर पुराने गानों के नए संस्करण, रीमिक्स और स्लो-रीवर्ब वर्जन खूब वायरल हो रहे हैं। कई युवा पहले इन गानों को किसी वीडियो के बैकग्राउंड में सुनते हैं और फिर पूरा गाना खोजकर अपनी प्लेलिस्ट में जोड़ लेते हैं। यानी डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पुरानी धुनों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम किया है।

मेरे अनुसार एक और बड़ा कारण यह है कि आज के कई गानों में तकनीक का इस्तेमाल तो बहुत होता है, लेकिन भावनात्मक गहराई कम महसूस होती है। बीट्स तेज़ हैं, म्यूजिक आधुनिक है, लेकिन ऐसे गाने कम हैं जो वर्षों तक लोगों की यादों में बने रहें। इसके विपरीत 90 के दशक के गाने आज भी शादी, यात्रा, त्योहार और पारिवारिक आयोजनों में उसी उत्साह के साथ बजते हैं, जैसे पहली बार रिलीज़ हुए हों।

पुराने गाने लोगों को उनकी यादों से भी जोड़ते हैं। किसी को अपना बचपन याद आता है, किसी को स्कूल के दिन, किसी को कॉलेज का प्यार और किसी को परिवार के साथ बिताए पल। संगीत केवल कानों तक नहीं पहुंचता, बल्कि यादों को भी जगा देता है। यही वजह है कि पुराने गीतों का असर आज भी वैसा ही बना हुआ है।

हाल के वर्षों में लाइव कव्वाली नाइट्स और रेट्रो म्यूजिक कॉन्सर्ट्स में भी युवाओं की भीड़ बढ़ी है। पहले माना जाता था कि ऐसे कार्यक्रम केवल बड़ी उम्र के लोग पसंद करते हैं, लेकिन अब कॉलेज के छात्र और युवा प्रोफेशनल्स भी बड़ी संख्या में इनमें शामिल हो रहे हैं। इससे साफ होता है कि अच्छी धुन और अर्थपूर्ण गीत कभी पुराने नहीं होते।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि आज का संगीत अच्छा नहीं है। आज भी कई कलाकार बेहतरीन और अर्थपूर्ण गाने बना रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पुराने दौर में ऐसे गानों की संख्या अधिक थी, जबकि आज तेज़ी से बदलते ट्रेंड के कारण कई गाने कुछ महीनों बाद ही लोगों की यादों से गायब हो जाते हैं।

मेरी नजर में यह बदलाव सकारात्मक है। अगर नई पीढ़ी पुराने संगीत, कव्वालियों और क्लासिक गीतों की ओर लौट रही है, तो यह केवल एक ट्रेंड नहीं बल्कि अच्छी कला की पहचान है। अच्छा संगीत समय की सीमा में नहीं बंधता। वह पीढ़ियां बदलने के बाद भी लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाए रखता है।

आखिर में मैं यही कहना चाहूंगा कि संगीत का कोई युग नहीं होता। जो धुन दिल को छू जाए, वही सबसे अच्छी होती है। अगर आज का युवा 90 के दशक के गाने और कव्वालियां सुनकर सुकून महसूस करता है, तो यह इस बात का प्रमाण है कि सच्चा संगीत कभी पुराना नहीं होता। बदलते दौर में भी भावनाएं वही रहती हैं और शायद इसी वजह से पुराने गीत आज भी नई पीढ़ी के दिलों पर राज कर रहे हैं।

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09 Jul 2026 By Vaishnavi.J

आखिर क्यों आज की युवा पीढ़ी को 90 के दशक के गाने और कव्वालियां ज्यादा पसंद आ रही हैं?

Vaishnavi Joshi

आज अगर आप सोशल मीडिया खोलें या किसी लंबी ड्राइव पर निकलें, तो एक दिलचस्प बदलाव आसानी से दिखाई देता है। पहले जहां नई रिलीज़ होने वाली फिल्मों के गाने लोगों की प्लेलिस्ट पर छाए रहते थे, वहीं अब बड़ी संख्या में लोग 90 के दशक के गाने, पुराने रोमांटिक गीत, सूफी संगीत और कव्वालियां सुनना पसंद कर रहे हैं। चाहे कार में सफर हो, रात का सन्नाटा हो या फिर काम के बीच कुछ पल सुकून के चाहिए हों, लोग बार-बार उन्हीं पुराने गीतों की ओर लौट रहे हैं।

मेरी राय में इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि पुराने गानों में भावनाएं ज्यादा और दिखावा कम होता था। उस दौर का संगीत केवल मनोरंजन के लिए नहीं बनाया जाता था, बल्कि हर गीत के पीछे एक कहानी, एक एहसास और एक संदेश होता था। गीतों के बोल इतने सरल और गहरे होते थे कि सुनने वाला खुद को उनसे जोड़ लेता था। आज भी जब कुमार सानू, उदित नारायण, अलका याज्ञनिक, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार या जगजीत सिंह की आवाज़ सुनाई देती है, तो मन अपने आप शांत हो जाता है।

आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में लोगों के पास तनाव पहले से कहीं ज्यादा है। नौकरी का दबाव, पढ़ाई की प्रतिस्पर्धा, सोशल मीडिया की तुलना और भविष्य की चिंता हर उम्र के लोगों को प्रभावित कर रही है। ऐसे माहौल में पुराने गाने और कव्वालियां मानसिक शांति देने का काम करते हैं। इनमें शोर कम और सुकून ज्यादा होता है। शायद यही वजह है कि युवा भी अब इन्हें सुनने लगे हैं, जबकि उन्होंने वह दौर देखा भी नहीं।

कव्वालियों की लोकप्रियता बढ़ने के पीछे भी यही कारण है। सूफी संगीत और कव्वालियां केवल धार्मिक संगीत नहीं हैं, बल्कि इनमें इंसानियत, मोहब्बत, आत्मिक शांति और जीवन के गहरे अर्थ छिपे होते हैं। जब कोई व्यक्ति नुसरत फ़तेह अली खान, साबरी ब्रदर्स या अज़ीज़ मियां की कव्वाली सुनता है, तो वह केवल संगीत नहीं सुन रहा होता, बल्कि भावनाओं के एक अलग संसार में प्रवेश कर जाता है। यही अनुभव आज की पीढ़ी को आकर्षित कर रहा है।

सोशल मीडिया ने भी इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभाई है। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और फेसबुक वीडियो पर पुराने गानों के नए संस्करण, रीमिक्स और स्लो-रीवर्ब वर्जन खूब वायरल हो रहे हैं। कई युवा पहले इन गानों को किसी वीडियो के बैकग्राउंड में सुनते हैं और फिर पूरा गाना खोजकर अपनी प्लेलिस्ट में जोड़ लेते हैं। यानी डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पुरानी धुनों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम किया है।

मेरे अनुसार एक और बड़ा कारण यह है कि आज के कई गानों में तकनीक का इस्तेमाल तो बहुत होता है, लेकिन भावनात्मक गहराई कम महसूस होती है। बीट्स तेज़ हैं, म्यूजिक आधुनिक है, लेकिन ऐसे गाने कम हैं जो वर्षों तक लोगों की यादों में बने रहें। इसके विपरीत 90 के दशक के गाने आज भी शादी, यात्रा, त्योहार और पारिवारिक आयोजनों में उसी उत्साह के साथ बजते हैं, जैसे पहली बार रिलीज़ हुए हों।

पुराने गाने लोगों को उनकी यादों से भी जोड़ते हैं। किसी को अपना बचपन याद आता है, किसी को स्कूल के दिन, किसी को कॉलेज का प्यार और किसी को परिवार के साथ बिताए पल। संगीत केवल कानों तक नहीं पहुंचता, बल्कि यादों को भी जगा देता है। यही वजह है कि पुराने गीतों का असर आज भी वैसा ही बना हुआ है।

हाल के वर्षों में लाइव कव्वाली नाइट्स और रेट्रो म्यूजिक कॉन्सर्ट्स में भी युवाओं की भीड़ बढ़ी है। पहले माना जाता था कि ऐसे कार्यक्रम केवल बड़ी उम्र के लोग पसंद करते हैं, लेकिन अब कॉलेज के छात्र और युवा प्रोफेशनल्स भी बड़ी संख्या में इनमें शामिल हो रहे हैं। इससे साफ होता है कि अच्छी धुन और अर्थपूर्ण गीत कभी पुराने नहीं होते।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि आज का संगीत अच्छा नहीं है। आज भी कई कलाकार बेहतरीन और अर्थपूर्ण गाने बना रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पुराने दौर में ऐसे गानों की संख्या अधिक थी, जबकि आज तेज़ी से बदलते ट्रेंड के कारण कई गाने कुछ महीनों बाद ही लोगों की यादों से गायब हो जाते हैं।

मेरी नजर में यह बदलाव सकारात्मक है। अगर नई पीढ़ी पुराने संगीत, कव्वालियों और क्लासिक गीतों की ओर लौट रही है, तो यह केवल एक ट्रेंड नहीं बल्कि अच्छी कला की पहचान है। अच्छा संगीत समय की सीमा में नहीं बंधता। वह पीढ़ियां बदलने के बाद भी लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाए रखता है।

आखिर में मैं यही कहना चाहूंगा कि संगीत का कोई युग नहीं होता। जो धुन दिल को छू जाए, वही सबसे अच्छी होती है। अगर आज का युवा 90 के दशक के गाने और कव्वालियां सुनकर सुकून महसूस करता है, तो यह इस बात का प्रमाण है कि सच्चा संगीत कभी पुराना नहीं होता। बदलते दौर में भी भावनाएं वही रहती हैं और शायद इसी वजह से पुराने गीत आज भी नई पीढ़ी के दिलों पर राज कर रहे हैं।

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