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सत्य को प्रमाण की नहीं, प्रणाम की आवश्यकता है – प्रहलाद पटेल
opinion by Prahlad Singh Patel
गुरु पूर्णिमा केवल एक परंपरा नहीं, यह उस निष्ठा और समर्पण की पुनः स्मृति है जो गुरु-शिष्य परंपरा की आत्मा है। यह अवसर केवल पुष्प अर्पण या चरण-वंदन का नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और पुनः समर्पण का है।
आज जब हम गुरु पूर्णिमा मना रहे हैं, तो परम पूज्य श्रीश्री बाबाश्री जी की वाणी विशेष रूप से स्मरणीय है – "सत्य को प्रमाण की नहीं, प्रणाम की आवश्यकता है।"
गुरु जब ‘सत्य’ का रूप हो जाता है, तब वह केवल पथ-प्रदर्शक नहीं रहता, बल्कि वह स्वयं ‘पथ’ बन जाता है। बाबाश्री जी कहते थे – "सत्य अभिनय नहीं करता, सत्य निर्णय करता है।" यह निर्णय उसी क्षण होता है, जब शिष्य का अंतर्मन शुद्ध हो और उसका समर्पण पूर्ण।
सत्य – जो बदलता नहीं, जो बदल देता है
सत्य, वह जिसे प्रमाणित करने की नहीं, केवल अनुभव करने की आवश्यकता है। जब कोई साधक सत्य को पकड़ने की कोशिश करता है, तो वह अस्थायी हो सकता है, लेकिन जब सत्य किसी को पकड़ लेता है, तो उसका पूरा जीवन परिवर्तित हो जाता है।
बाबाश्री जी कहते थे – "ध्यान रखो, मनन करो – तुमने सत्य को पकड़ा है या सत्य ने तुम्हें पकड़ा?" यदि तुमने पकड़ा है, तो छूटने का भय बना रहेगा, पर यदि सत्य ने तुम्हें पकड़ा है, तो फिर मोक्ष निश्चित है।
गुरु – तत्व भी, अनुभव भी
गुरु केवल उपदेशक नहीं, बल्कि तत्व है। वह काल से परे, मंत्रणा का स्त्रोत है। जैसा कि पूज्य दादा गुरुजी नर्मदा के जल पर साधना करते हुए कहते हैं – "गुरु जब सत्य के रूप में है, तो जीव जगत का आधार है, और जब वह तत्व के रूप में है, तो हमारा अस्तित्व है।"
गुरु वही है जो हमें केवल भौतिक जीवन नहीं, काल की सीमाओं से परे जीने की कला सिखाता है। जो हर युग में शिष्य को उसके ‘मैं’ से मुक्त कर परमसत्ता की अनुभूति कराता है।
श्रद्धा और पात्रता का संतुलन
सत्य की कृपा पात्रता पर निर्भर करती है। और यह पात्रता न धन से मिलती है, न पद से – यह आती है केवल अंतर्मन की शुद्धि, निष्ठा, और सत्य के पक्ष में खड़े रहने के साहस से। पूज्य बाबाश्री जी कहते थे – "सत्य प्रस्तुति के लिए है, स्तुति के लिए नहीं।"
यह भी स्मरण रहे कि विश्वास होता नहीं है, किया जाता है। श्रद्धा अभिनय से नहीं उपजती, वह तप से, साधना से और समर्पण से प्रकट होती है।
गुरु – शिष्य का आईना
बाबाश्री जी कहते थे – "निर्विकार पथ कोई पंथ नहीं, यह जीवंत पथ है। इससे बेहतर पथ मिले तो चले जाना, लेकिन जब तक इस पर हो, निर्विकार होकर चलो, तब ही शांति मिलेगी।"
इसलिए आज गुरु पूर्णिमा पर हमें स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए – क्या हम गुरु को केवल पूजते हैं या उनके बताए पथ पर चलते भी हैं?
गुरु पूर्णिमा पर मेरी ओर से यही संदेश है:
"बादल गुरु घन ज्ञान का लिए झूमता जाये।
है सुपात्रता शिष्य की, खींचे, पिये, अघाये॥"गुरु केवल बरसते हैं, लेकिन चखना शिष्य को ही होता है।
आज के दिन हम सभी यह संकल्प लें कि सत्य का केवल सत्कार नहीं, उसका स्वीकार करें। और यह स्वीकार तभी संभव है जब हम अपने अहं, स्वार्थ और संशय को त्यागकर, गुरुचरणों में पूर्ण समर्पण करें।
गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाओं सहित,
– प्रहलाद सिंह पटेल
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सत्य को प्रमाण की नहीं, प्रणाम की आवश्यकता है – प्रहलाद पटेल
opinion by Prahlad Singh Patel
आज जब हम गुरु पूर्णिमा मना रहे हैं, तो परम पूज्य श्रीश्री बाबाश्री जी की वाणी विशेष रूप से स्मरणीय है – "सत्य को प्रमाण की नहीं, प्रणाम की आवश्यकता है।"
गुरु जब ‘सत्य’ का रूप हो जाता है, तब वह केवल पथ-प्रदर्शक नहीं रहता, बल्कि वह स्वयं ‘पथ’ बन जाता है। बाबाश्री जी कहते थे – "सत्य अभिनय नहीं करता, सत्य निर्णय करता है।" यह निर्णय उसी क्षण होता है, जब शिष्य का अंतर्मन शुद्ध हो और उसका समर्पण पूर्ण।
सत्य – जो बदलता नहीं, जो बदल देता है
सत्य, वह जिसे प्रमाणित करने की नहीं, केवल अनुभव करने की आवश्यकता है। जब कोई साधक सत्य को पकड़ने की कोशिश करता है, तो वह अस्थायी हो सकता है, लेकिन जब सत्य किसी को पकड़ लेता है, तो उसका पूरा जीवन परिवर्तित हो जाता है।
बाबाश्री जी कहते थे – "ध्यान रखो, मनन करो – तुमने सत्य को पकड़ा है या सत्य ने तुम्हें पकड़ा?" यदि तुमने पकड़ा है, तो छूटने का भय बना रहेगा, पर यदि सत्य ने तुम्हें पकड़ा है, तो फिर मोक्ष निश्चित है।
गुरु – तत्व भी, अनुभव भी
गुरु केवल उपदेशक नहीं, बल्कि तत्व है। वह काल से परे, मंत्रणा का स्त्रोत है। जैसा कि पूज्य दादा गुरुजी नर्मदा के जल पर साधना करते हुए कहते हैं – "गुरु जब सत्य के रूप में है, तो जीव जगत का आधार है, और जब वह तत्व के रूप में है, तो हमारा अस्तित्व है।"
गुरु वही है जो हमें केवल भौतिक जीवन नहीं, काल की सीमाओं से परे जीने की कला सिखाता है। जो हर युग में शिष्य को उसके ‘मैं’ से मुक्त कर परमसत्ता की अनुभूति कराता है।
श्रद्धा और पात्रता का संतुलन
सत्य की कृपा पात्रता पर निर्भर करती है। और यह पात्रता न धन से मिलती है, न पद से – यह आती है केवल अंतर्मन की शुद्धि, निष्ठा, और सत्य के पक्ष में खड़े रहने के साहस से। पूज्य बाबाश्री जी कहते थे – "सत्य प्रस्तुति के लिए है, स्तुति के लिए नहीं।"
यह भी स्मरण रहे कि विश्वास होता नहीं है, किया जाता है। श्रद्धा अभिनय से नहीं उपजती, वह तप से, साधना से और समर्पण से प्रकट होती है।
गुरु – शिष्य का आईना
बाबाश्री जी कहते थे – "निर्विकार पथ कोई पंथ नहीं, यह जीवंत पथ है। इससे बेहतर पथ मिले तो चले जाना, लेकिन जब तक इस पर हो, निर्विकार होकर चलो, तब ही शांति मिलेगी।"
इसलिए आज गुरु पूर्णिमा पर हमें स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए – क्या हम गुरु को केवल पूजते हैं या उनके बताए पथ पर चलते भी हैं?
गुरु पूर्णिमा पर मेरी ओर से यही संदेश है:
"बादल गुरु घन ज्ञान का लिए झूमता जाये।
है सुपात्रता शिष्य की, खींचे, पिये, अघाये॥"गुरु केवल बरसते हैं, लेकिन चखना शिष्य को ही होता है।
आज के दिन हम सभी यह संकल्प लें कि सत्य का केवल सत्कार नहीं, उसका स्वीकार करें। और यह स्वीकार तभी संभव है जब हम अपने अहं, स्वार्थ और संशय को त्यागकर, गुरुचरणों में पूर्ण समर्पण करें।
गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाओं सहित,
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