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स्क्रीन के दौर में कितना काम सही, कब रुकना है यह समझना भी जरूरी
Vaishnavi Joshi
लंबे समय तक लैपटॉप और मोबाइल के सामने बिताया गया समय केवल आंखों ही नहीं, शरीर और दिमाग पर भी असर डाल सकता है
आज की दुनिया पहले से काफी अलग हो चुकी है। काम करने के तरीके बदल गए हैं और अब बड़ी संख्या में लोग दिन का अधिकांश समय कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल स्क्रीन के सामने बिताते हैं। दफ्तरों से लेकर घरों तक, पढ़ाई से लेकर व्यापार तक, लगभग हर काम किसी न किसी स्क्रीन से जुड़ गया है। ऐसे में एक सवाल बार-बार सामने आता है कि आखिर एक व्यक्ति को दिन में कितने घंटे काम करना चाहिए और लगातार स्क्रीन देखने से होने वाले असर से खुद को कैसे बचाया जा सकता है। मेरी नजर में काम के घंटों का कोई ऐसा फॉर्मूला नहीं है जो हर व्यक्ति पर लागू हो सके। किसी का काम शारीरिक होता है तो किसी का मानसिक। कोई कम समय में बेहतर परिणाम दे देता है तो कोई ज्यादा समय लगाता है। फिर भी यदि सामान्य स्थिति की बात करें तो 7 से 9 घंटे का कार्य समय संतुलित माना जा सकता है। इससे व्यक्ति को अपने परिवार, स्वास्थ्य, आराम और व्यक्तिगत जीवन के लिए भी पर्याप्त समय मिल जाता है। असल समस्या तब पैदा होती है जब काम केवल समय का खेल बन जाता है। आज कई लोग 10 से 12 घंटे तक लगातार स्क्रीन के सामने बैठे रहते हैं। शुरुआत में यह सामान्य लगता है, लेकिन धीरे-धीरे इसका असर दिखाई देने लगता है। आंखों में थकान, सिर भारी लगना, गर्दन में जकड़न, पीठ दर्द और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं। कई बार व्यक्ति को लगता है कि वह ज्यादा समय देकर ज्यादा काम कर रहा है, लेकिन वास्तविकता यह होती है कि लंबे समय तक लगातार काम करने से एकाग्रता कम होने लगती है।
मेरा मानना है कि काम की गुणवत्ता हमेशा काम के घंटों से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। यदि कोई व्यक्ति आठ घंटे में अपना काम अच्छे ढंग से पूरा कर सकता है तो उसे केवल दिखावे के लिए देर रात तक स्क्रीन के सामने बैठे रहने की जरूरत नहीं है। उत्पादकता का मतलब केवल अधिक समय तक काम करना नहीं, बल्कि बेहतर परिणाम देना भी है। स्क्रीन आधारित काम करने वालों के लिए सबसे जरूरी बात आंखों का ध्यान रखना है। लगातार स्क्रीन देखने से आंखों पर दबाव पड़ता है। इसलिए हर कुछ समय बाद नजरें स्क्रीन से हटानी चाहिए। कई लोग घंटों तक बिना रुके काम करते रहते हैं, जिससे आंखों में सूखापन और जलन की समस्या बढ़ सकती है। थोड़ी देर के लिए दूर देखना या कुछ मिनट का ब्रेक लेना आंखों को आराम देता है।
इसके साथ ही स्क्रीन की रोशनी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कई लोग बहुत तेज ब्राइटनेस पर काम करते हैं, जबकि कुछ लोग बहुत कम रोशनी में स्क्रीन देखते हैं। दोनों ही स्थितियां आंखों को प्रभावित कर सकती हैं। कमरे की रोशनी और स्क्रीन की ब्राइटनेस में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। शाम और रात के समय मोबाइल या लैपटॉप का इस्तेमाल करते समय स्क्रीन की चमक कम रखना बेहतर माना जाता है। एक और बड़ी समस्या लंबे समय तक बैठे रहना है। आधुनिक जीवनशैली में लोगों की शारीरिक गतिविधियां लगातार कम हो रही हैं। सुबह कुर्सी पर बैठकर काम शुरू होता है और कई बार देर शाम तक वही स्थिति बनी रहती है। इससे शरीर की मांसपेशियां अकड़ने लगती हैं और कमर, कंधे तथा गर्दन में दर्द की शिकायत बढ़ जाती है। इसलिए हर घंटे कुछ मिनट के लिए उठना, चलना और शरीर को स्ट्रेच करना जरूरी है। बैठने की सही मुद्रा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि कंप्यूटर स्क्रीन आंखों के स्तर से बहुत नीचे या ऊपर हो तो गर्दन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसी तरह गलत ऊंचाई वाली कुर्सी और टेबल भी परेशानी बढ़ा सकती है। आज कम उम्र के युवाओं में भी पीठ और गर्दन से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, जिसका एक कारण लगातार गलत मुद्रा में काम करना है।
मोबाइल फोन ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। दिनभर लैपटॉप पर काम करने के बाद भी कई लोग घंटों सोशल मीडिया, वीडियो या गेम में समय बिताते हैं। इससे कुल स्क्रीन टाइम काफी बढ़ जाता है। ऐसे में कोशिश करनी चाहिए कि काम के बाद कुछ समय स्क्रीन से दूरी बनाई जाए। परिवार के साथ बातचीत, किताब पढ़ना, टहलना या किसी शौक को समय देना मानसिक रूप से भी राहत देता है। नींद पर भी स्क्रीन का सीधा असर पड़ता है। रात में सोने से ठीक पहले मोबाइल इस्तेमाल करने की आदत अब आम हो चुकी है। कई लोग बिस्तर पर जाने के बाद भी लंबे समय तक स्क्रीन देखते रहते हैं। इसका असर नींद की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। यदि सोने से कुछ समय पहले स्क्रीन का उपयोग कम कर दिया जाए तो दिमाग को आराम मिलने में मदद मिलती है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में काम जरूरी है और सफलता हासिल करने के लिए मेहनत भी जरूरी है। लेकिन यह भी सच है कि स्वास्थ्य से बड़ा कोई निवेश नहीं होता। यदि काम के कारण शरीर और मन लगातार थकान महसूस करने लगें तो लंबे समय में इसका असर जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ सकता है। इसलिए काम और आराम के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। मेरे विचार से सफलता का मतलब केवल ज्यादा घंटे काम करना नहीं है। असली सफलता वही है जिसमें करियर आगे बढ़े, लेकिन स्वास्थ्य पीछे न छूटे। नियमित ब्रेक, पर्याप्त नींद, थोड़ी शारीरिक गतिविधि और सीमित स्क्रीन टाइम जैसी छोटी आदतें लंबे समय तक बेहतर जीवन जीने में मदद कर सकती हैं। काम कीजिए, लक्ष्य हासिल कीजिए, लेकिन अपने शरीर और आंखों को नजरअंदाज किए बिना। यही आधुनिक दौर में स्वस्थ और संतुलित जीवन की सबसे बड़ी जरूरत है।
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स्क्रीन के दौर में कितना काम सही, कब रुकना है यह समझना भी जरूरी
Vaishnavi Joshi
आज की दुनिया पहले से काफी अलग हो चुकी है। काम करने के तरीके बदल गए हैं और अब बड़ी संख्या में लोग दिन का अधिकांश समय कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल स्क्रीन के सामने बिताते हैं। दफ्तरों से लेकर घरों तक, पढ़ाई से लेकर व्यापार तक, लगभग हर काम किसी न किसी स्क्रीन से जुड़ गया है। ऐसे में एक सवाल बार-बार सामने आता है कि आखिर एक व्यक्ति को दिन में कितने घंटे काम करना चाहिए और लगातार स्क्रीन देखने से होने वाले असर से खुद को कैसे बचाया जा सकता है। मेरी नजर में काम के घंटों का कोई ऐसा फॉर्मूला नहीं है जो हर व्यक्ति पर लागू हो सके। किसी का काम शारीरिक होता है तो किसी का मानसिक। कोई कम समय में बेहतर परिणाम दे देता है तो कोई ज्यादा समय लगाता है। फिर भी यदि सामान्य स्थिति की बात करें तो 7 से 9 घंटे का कार्य समय संतुलित माना जा सकता है। इससे व्यक्ति को अपने परिवार, स्वास्थ्य, आराम और व्यक्तिगत जीवन के लिए भी पर्याप्त समय मिल जाता है। असल समस्या तब पैदा होती है जब काम केवल समय का खेल बन जाता है। आज कई लोग 10 से 12 घंटे तक लगातार स्क्रीन के सामने बैठे रहते हैं। शुरुआत में यह सामान्य लगता है, लेकिन धीरे-धीरे इसका असर दिखाई देने लगता है। आंखों में थकान, सिर भारी लगना, गर्दन में जकड़न, पीठ दर्द और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं। कई बार व्यक्ति को लगता है कि वह ज्यादा समय देकर ज्यादा काम कर रहा है, लेकिन वास्तविकता यह होती है कि लंबे समय तक लगातार काम करने से एकाग्रता कम होने लगती है।
मेरा मानना है कि काम की गुणवत्ता हमेशा काम के घंटों से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। यदि कोई व्यक्ति आठ घंटे में अपना काम अच्छे ढंग से पूरा कर सकता है तो उसे केवल दिखावे के लिए देर रात तक स्क्रीन के सामने बैठे रहने की जरूरत नहीं है। उत्पादकता का मतलब केवल अधिक समय तक काम करना नहीं, बल्कि बेहतर परिणाम देना भी है। स्क्रीन आधारित काम करने वालों के लिए सबसे जरूरी बात आंखों का ध्यान रखना है। लगातार स्क्रीन देखने से आंखों पर दबाव पड़ता है। इसलिए हर कुछ समय बाद नजरें स्क्रीन से हटानी चाहिए। कई लोग घंटों तक बिना रुके काम करते रहते हैं, जिससे आंखों में सूखापन और जलन की समस्या बढ़ सकती है। थोड़ी देर के लिए दूर देखना या कुछ मिनट का ब्रेक लेना आंखों को आराम देता है।
इसके साथ ही स्क्रीन की रोशनी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कई लोग बहुत तेज ब्राइटनेस पर काम करते हैं, जबकि कुछ लोग बहुत कम रोशनी में स्क्रीन देखते हैं। दोनों ही स्थितियां आंखों को प्रभावित कर सकती हैं। कमरे की रोशनी और स्क्रीन की ब्राइटनेस में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। शाम और रात के समय मोबाइल या लैपटॉप का इस्तेमाल करते समय स्क्रीन की चमक कम रखना बेहतर माना जाता है। एक और बड़ी समस्या लंबे समय तक बैठे रहना है। आधुनिक जीवनशैली में लोगों की शारीरिक गतिविधियां लगातार कम हो रही हैं। सुबह कुर्सी पर बैठकर काम शुरू होता है और कई बार देर शाम तक वही स्थिति बनी रहती है। इससे शरीर की मांसपेशियां अकड़ने लगती हैं और कमर, कंधे तथा गर्दन में दर्द की शिकायत बढ़ जाती है। इसलिए हर घंटे कुछ मिनट के लिए उठना, चलना और शरीर को स्ट्रेच करना जरूरी है। बैठने की सही मुद्रा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि कंप्यूटर स्क्रीन आंखों के स्तर से बहुत नीचे या ऊपर हो तो गर्दन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसी तरह गलत ऊंचाई वाली कुर्सी और टेबल भी परेशानी बढ़ा सकती है। आज कम उम्र के युवाओं में भी पीठ और गर्दन से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, जिसका एक कारण लगातार गलत मुद्रा में काम करना है।
मोबाइल फोन ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। दिनभर लैपटॉप पर काम करने के बाद भी कई लोग घंटों सोशल मीडिया, वीडियो या गेम में समय बिताते हैं। इससे कुल स्क्रीन टाइम काफी बढ़ जाता है। ऐसे में कोशिश करनी चाहिए कि काम के बाद कुछ समय स्क्रीन से दूरी बनाई जाए। परिवार के साथ बातचीत, किताब पढ़ना, टहलना या किसी शौक को समय देना मानसिक रूप से भी राहत देता है। नींद पर भी स्क्रीन का सीधा असर पड़ता है। रात में सोने से ठीक पहले मोबाइल इस्तेमाल करने की आदत अब आम हो चुकी है। कई लोग बिस्तर पर जाने के बाद भी लंबे समय तक स्क्रीन देखते रहते हैं। इसका असर नींद की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। यदि सोने से कुछ समय पहले स्क्रीन का उपयोग कम कर दिया जाए तो दिमाग को आराम मिलने में मदद मिलती है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में काम जरूरी है और सफलता हासिल करने के लिए मेहनत भी जरूरी है। लेकिन यह भी सच है कि स्वास्थ्य से बड़ा कोई निवेश नहीं होता। यदि काम के कारण शरीर और मन लगातार थकान महसूस करने लगें तो लंबे समय में इसका असर जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ सकता है। इसलिए काम और आराम के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। मेरे विचार से सफलता का मतलब केवल ज्यादा घंटे काम करना नहीं है। असली सफलता वही है जिसमें करियर आगे बढ़े, लेकिन स्वास्थ्य पीछे न छूटे। नियमित ब्रेक, पर्याप्त नींद, थोड़ी शारीरिक गतिविधि और सीमित स्क्रीन टाइम जैसी छोटी आदतें लंबे समय तक बेहतर जीवन जीने में मदद कर सकती हैं। काम कीजिए, लक्ष्य हासिल कीजिए, लेकिन अपने शरीर और आंखों को नजरअंदाज किए बिना। यही आधुनिक दौर में स्वस्थ और संतुलित जीवन की सबसे बड़ी जरूरत है।
