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कलाकार और कला को अलग करना कितना सही? बहस आज भी जारी
Priyanka Mathur
मशहूर रचनाओं के पीछे विवादित कलाकार हों तो दर्शक क्या करे, कला की खूबसूरती देखे या कलाकार के आचरण को भी ध्यान में रखे
किसी फिल्म का कोई सीन दिल छू जाता है, कोई गाना सालों बाद भी वही एहसास जगा देता है और किसी लेखक की किताब जिंदगी को देखने का नजरिया बदल देती है। लेकिन जब पता चलता है कि उस कला को बनाने वाला व्यक्ति निजी जिंदगी में बेहद विवादित, शोषणकारी या अनैतिक व्यवहार के आरोपों से घिरा रहा है, तो मामला थोड़ा उलझ जाता है। सवाल सिर्फ इतना नहीं रह जाता कि कला अच्छी है या खराब। सवाल यह भी उठता है कि क्या कलाकार के निजी आचरण को उसकी रचना से अलग करके देखा जा सकता है। यही बहस लंबे समय से संगीत, सिनेमा, साहित्य और दूसरी कलाओं में चलती रही है। एक तरफ वे लोग हैं जो मानते हैं कि रचना अपने कलाकार से आगे निकल जाती है। उनका तर्क है कि किसी गीत, फिल्म, पेंटिंग या किताब की अपनी स्वतंत्र पहचान बन सकती है और उसे समझने के लिए कलाकार की निजी जिंदगी को हर बार सामने रखना जरूरी नहीं।
दूसरी तरफ यह सवाल भी उतना ही मजबूत है कि अगर किसी कलाकार ने गंभीर गलत काम किए हैं और हम उसकी रचना को लगातार स्ट्रीम, खरीद या प्रचार करते हैं, तो क्या इससे उसके प्रभाव और कमाई को बढ़ावा नहीं मिलता? यहां पसंद और नैतिकता के बीच की रेखा काफी धुंधली हो जाती है। कई बार दर्शक किसी कलाकार के काम से भावनात्मक रूप से इतना जुड़ा होता है कि उसके खिलाफ सामने आई जानकारी स्वीकार करना भी मुश्किल लगता है। कुछ लोग कहते हैं कि वे कलाकार को नहीं, सिर्फ उसकी कला को पसंद करते हैं। लेकिन डिजिटल दौर में यह अंतर हमेशा आसान नहीं है। किसी गाने को स्ट्रीम करना, फिल्म देखना या किसी किताब की बिक्री बढ़ाना सीधे तौर पर उस कलाकार या उससे जुड़े अधिकारधारकों को आर्थिक फायदा भी पहुंचा सकता है।
‘आर्ट को आर्टिस्ट से अलग करो’ वाली सोच का एक आधार यह है कि रचना तैयार होने के बाद उसका अर्थ केवल कलाकार के नियंत्रण में नहीं रहता। किसी कविता को लिखने वाले की मंशा कुछ और हो सकती है, लेकिन पाठक उससे बिल्कुल अलग अर्थ निकाल सकता है। किसी फिल्म का निर्देशक जिस संदेश के साथ कहानी बनाता है, दर्शक उसे अपने अनुभव के आधार पर अलग तरह से देख सकता है। इसी तरह एक गीत किसी व्यक्ति के लिए प्रेम की याद हो सकता है और किसी दूसरे के लिए मुश्किल समय में सहारा। इस नजरिए से देखा जाए तो कलाकार का चरित्र खराब होने से जरूरी नहीं कि उसकी बनाई हर चीज की कलात्मक गुणवत्ता खत्म हो जाए। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब कला और कलाकार की पहचान पूरी तरह एक-दूसरे में घुली हुई हो।
अगर किसी कलाकार की पूरी सार्वजनिक छवि ही उसकी निजी जिंदगी और विचारधारा पर टिकी है, तो उसके काम को उससे अलग करना मुश्किल हो सकता है। खासकर तब जब विवाद महज निजी आदतों तक सीमित न होकर शोषण, हिंसा, यौन उत्पीड़न, नस्लवाद या दूसरे गंभीर मामलों से जुड़े हों। ऐसे मामलों में दर्शक के लिए यह तय करना आसान नहीं रहता कि वह सिर्फ रचना का आनंद ले रहा है या अनजाने में उस व्यक्ति की प्रतिष्ठा को मजबूत कर रहा है। यही वजह है कि कई बार लोग किसी कलाकार के पुराने काम को पूरी तरह छोड़ देते हैं, जबकि कुछ लोग कलाकार की आलोचना करते हुए भी उसकी रचनाओं को देखते या सुनते रहते हैं। दोनों स्थितियों में एक बात साफ है—यह फैसला व्यक्तिगत भी है और सामाजिक भी। हर मामले के लिए एक ही नियम लागू करना मुश्किल है।
इस बहस का एक दूसरा पहलू भी है, जो अक्सर चर्चा में पीछे रह जाता है। कई कलाकृतियां सिर्फ कलाकार की नहीं होतीं। किसी फिल्म में अभिनेता, लेखक, संगीतकार, तकनीशियन और सैकड़ों दूसरे लोग काम करते हैं। किसी एल्बम में गीतकार, संगीतकार, निर्माता और रिकॉर्डिंग टीम शामिल होती है। किसी किताब के पीछे संपादक, प्रकाशक और डिजाइनर तक की भूमिका होती है। ऐसे में किसी विवादित कलाकार के काम का बहिष्कार करने का फैसला कई दूसरे लोगों को भी प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर, पीड़ितों और उनके अनुभवों को नजरअंदाज करके केवल कला की तारीफ करते रहना भी संवेदनशील सवाल खड़े करता है। इसलिए कुछ लोग बीच का रास्ता अपनाते हैं। वे रचना को स्वीकार करते हैं, लेकिन कलाकार का महिमामंडन नहीं करते। वे कला की आलोचनात्मक तरीके से चर्चा करते हैं और साथ में उस कलाकार के विवादों या आरोपों को भी छिपाते नहीं। सोशल मीडिया के दौर में यह तरीका और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि आज किसी कलाकार को समर्थन देना सिर्फ निजी पसंद नहीं रह गया। पोस्ट शेयर करना, स्ट्रीमिंग नंबर बढ़ाना, पुराने काम को ट्रेंड कराना या किसी कलाकार को पुरस्कारों में लगातार जगह दिलाना उसकी सार्वजनिक छवि पर असर डालता है।
ऐसे में दर्शक के पास भी पहले से ज्यादा जानकारी है और वह तय कर सकता है कि किस हद तक किसी कलाकार के काम के साथ जुड़ना है। कुछ लोग पूरी तरह बहिष्कार को सही मानते हैं, तो कुछ यह कहते हैं कि किसी रचना को केवल इसलिए खारिज कर देना कि उसके निर्माता का चरित्र खराब था, कला की स्वतंत्रता को सीमित करना होगा। इसी बीच एक व्यावहारिक सवाल भी है—क्या दशकों पुरानी हर रचना को उसके निर्माता के पूरे जीवन और हर विवाद की रोशनी में दोबारा परखा जाना चाहिए, या समय के साथ कला की अपनी अलग जगह बन जाने देनी चाहिए। इसका जवाब हर दर्शक के लिए अलग हो सकता है। असल मुश्किल शायद यही है कि कला को कलाकार से पूरी तरह अलग करना संभव भी हो, तो हर स्थिति में उचित हो, ऐसा जरूरी नहीं।
कलाकार और कला को अलग करना कितना सही? बहस आज भी जारी
Priyanka Mathur
किसी फिल्म का कोई सीन दिल छू जाता है, कोई गाना सालों बाद भी वही एहसास जगा देता है और किसी लेखक की किताब जिंदगी को देखने का नजरिया बदल देती है। लेकिन जब पता चलता है कि उस कला को बनाने वाला व्यक्ति निजी जिंदगी में बेहद विवादित, शोषणकारी या अनैतिक व्यवहार के आरोपों से घिरा रहा है, तो मामला थोड़ा उलझ जाता है। सवाल सिर्फ इतना नहीं रह जाता कि कला अच्छी है या खराब। सवाल यह भी उठता है कि क्या कलाकार के निजी आचरण को उसकी रचना से अलग करके देखा जा सकता है। यही बहस लंबे समय से संगीत, सिनेमा, साहित्य और दूसरी कलाओं में चलती रही है। एक तरफ वे लोग हैं जो मानते हैं कि रचना अपने कलाकार से आगे निकल जाती है। उनका तर्क है कि किसी गीत, फिल्म, पेंटिंग या किताब की अपनी स्वतंत्र पहचान बन सकती है और उसे समझने के लिए कलाकार की निजी जिंदगी को हर बार सामने रखना जरूरी नहीं।
दूसरी तरफ यह सवाल भी उतना ही मजबूत है कि अगर किसी कलाकार ने गंभीर गलत काम किए हैं और हम उसकी रचना को लगातार स्ट्रीम, खरीद या प्रचार करते हैं, तो क्या इससे उसके प्रभाव और कमाई को बढ़ावा नहीं मिलता? यहां पसंद और नैतिकता के बीच की रेखा काफी धुंधली हो जाती है। कई बार दर्शक किसी कलाकार के काम से भावनात्मक रूप से इतना जुड़ा होता है कि उसके खिलाफ सामने आई जानकारी स्वीकार करना भी मुश्किल लगता है। कुछ लोग कहते हैं कि वे कलाकार को नहीं, सिर्फ उसकी कला को पसंद करते हैं। लेकिन डिजिटल दौर में यह अंतर हमेशा आसान नहीं है। किसी गाने को स्ट्रीम करना, फिल्म देखना या किसी किताब की बिक्री बढ़ाना सीधे तौर पर उस कलाकार या उससे जुड़े अधिकारधारकों को आर्थिक फायदा भी पहुंचा सकता है।
‘आर्ट को आर्टिस्ट से अलग करो’ वाली सोच का एक आधार यह है कि रचना तैयार होने के बाद उसका अर्थ केवल कलाकार के नियंत्रण में नहीं रहता। किसी कविता को लिखने वाले की मंशा कुछ और हो सकती है, लेकिन पाठक उससे बिल्कुल अलग अर्थ निकाल सकता है। किसी फिल्म का निर्देशक जिस संदेश के साथ कहानी बनाता है, दर्शक उसे अपने अनुभव के आधार पर अलग तरह से देख सकता है। इसी तरह एक गीत किसी व्यक्ति के लिए प्रेम की याद हो सकता है और किसी दूसरे के लिए मुश्किल समय में सहारा। इस नजरिए से देखा जाए तो कलाकार का चरित्र खराब होने से जरूरी नहीं कि उसकी बनाई हर चीज की कलात्मक गुणवत्ता खत्म हो जाए। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब कला और कलाकार की पहचान पूरी तरह एक-दूसरे में घुली हुई हो।
अगर किसी कलाकार की पूरी सार्वजनिक छवि ही उसकी निजी जिंदगी और विचारधारा पर टिकी है, तो उसके काम को उससे अलग करना मुश्किल हो सकता है। खासकर तब जब विवाद महज निजी आदतों तक सीमित न होकर शोषण, हिंसा, यौन उत्पीड़न, नस्लवाद या दूसरे गंभीर मामलों से जुड़े हों। ऐसे मामलों में दर्शक के लिए यह तय करना आसान नहीं रहता कि वह सिर्फ रचना का आनंद ले रहा है या अनजाने में उस व्यक्ति की प्रतिष्ठा को मजबूत कर रहा है। यही वजह है कि कई बार लोग किसी कलाकार के पुराने काम को पूरी तरह छोड़ देते हैं, जबकि कुछ लोग कलाकार की आलोचना करते हुए भी उसकी रचनाओं को देखते या सुनते रहते हैं। दोनों स्थितियों में एक बात साफ है—यह फैसला व्यक्तिगत भी है और सामाजिक भी। हर मामले के लिए एक ही नियम लागू करना मुश्किल है।
इस बहस का एक दूसरा पहलू भी है, जो अक्सर चर्चा में पीछे रह जाता है। कई कलाकृतियां सिर्फ कलाकार की नहीं होतीं। किसी फिल्म में अभिनेता, लेखक, संगीतकार, तकनीशियन और सैकड़ों दूसरे लोग काम करते हैं। किसी एल्बम में गीतकार, संगीतकार, निर्माता और रिकॉर्डिंग टीम शामिल होती है। किसी किताब के पीछे संपादक, प्रकाशक और डिजाइनर तक की भूमिका होती है। ऐसे में किसी विवादित कलाकार के काम का बहिष्कार करने का फैसला कई दूसरे लोगों को भी प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर, पीड़ितों और उनके अनुभवों को नजरअंदाज करके केवल कला की तारीफ करते रहना भी संवेदनशील सवाल खड़े करता है। इसलिए कुछ लोग बीच का रास्ता अपनाते हैं। वे रचना को स्वीकार करते हैं, लेकिन कलाकार का महिमामंडन नहीं करते। वे कला की आलोचनात्मक तरीके से चर्चा करते हैं और साथ में उस कलाकार के विवादों या आरोपों को भी छिपाते नहीं। सोशल मीडिया के दौर में यह तरीका और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि आज किसी कलाकार को समर्थन देना सिर्फ निजी पसंद नहीं रह गया। पोस्ट शेयर करना, स्ट्रीमिंग नंबर बढ़ाना, पुराने काम को ट्रेंड कराना या किसी कलाकार को पुरस्कारों में लगातार जगह दिलाना उसकी सार्वजनिक छवि पर असर डालता है।
ऐसे में दर्शक के पास भी पहले से ज्यादा जानकारी है और वह तय कर सकता है कि किस हद तक किसी कलाकार के काम के साथ जुड़ना है। कुछ लोग पूरी तरह बहिष्कार को सही मानते हैं, तो कुछ यह कहते हैं कि किसी रचना को केवल इसलिए खारिज कर देना कि उसके निर्माता का चरित्र खराब था, कला की स्वतंत्रता को सीमित करना होगा। इसी बीच एक व्यावहारिक सवाल भी है—क्या दशकों पुरानी हर रचना को उसके निर्माता के पूरे जीवन और हर विवाद की रोशनी में दोबारा परखा जाना चाहिए, या समय के साथ कला की अपनी अलग जगह बन जाने देनी चाहिए। इसका जवाब हर दर्शक के लिए अलग हो सकता है। असल मुश्किल शायद यही है कि कला को कलाकार से पूरी तरह अलग करना संभव भी हो, तो हर स्थिति में उचित हो, ऐसा जरूरी नहीं।
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