UGC के नए नियम: समानता की पहल या कैंपस में नए विभाजन की जमीन?

अनन्या श्रीवास्तव

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जातीय भेदभाव रोकने के उद्देश्य से लाए गए UGC रेगुलेशन 2026 पर बढ़ता विरोध बताता है कि सवाल सिर्फ नीति का नहीं, भरोसे और संतुलन का भी है।

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा जनवरी 2026 में अधिसूचित किए गए प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशन्स ने देश के उच्च शिक्षा परिसरों में नई बहस छेड़ दी है। सरकार और आयोग इसे समानता, निष्पक्षता और जवाबदेही की दिशा में बड़ा कदम बता रहे हैं, जबकि जनरल कैटेगरी के छात्रों और संगठनों का एक वर्ग इसे भेदभावपूर्ण और एकतरफा मान रहा है। सवाल साफ है—क्या ये नियम वास्तव में समानता लाएंगे या शिक्षा व्यवस्था में नया विभाजन पैदा करेंगे?

इन नियमों की पृष्ठभूमि अनदेखी नहीं की जा सकती। रोहित वेमुला और पायल तडवी जैसे मामलों ने यह दिखाया कि जातीय उत्पीड़न केवल सामाजिक नहीं, संस्थागत समस्या भी है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद UGC ने शिकायत निवारण को अनिवार्य, संरचित और निगरानी योग्य बनाने का फैसला किया। नई व्यवस्था में विशेष समितियां, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग मैकेनिज्म बनाए गए हैं, ताकि SC, ST और OBC छात्रों को त्वरित न्याय मिल सके।

यहीं से असहमति शुरू होती है। आलोचकों का तर्क है कि नियमों की भाषा और ढांचा एक खास वर्ग को “संभावित दोषी” की तरह पेश करता है। झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर दंड का प्रावधान हटाए जाने को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। जनरल कैटेगरी के छात्र मानते हैं कि इससे कैंपस में डर का माहौल बन सकता है और अकादमिक संवाद प्रभावित हो सकता है। कुछ लोग इसे मेरिट बनाम पहचान की बहस के रूप में भी देख रहे हैं।

दूसरी ओर, समर्थकों का कहना है कि भारत जैसे समाज में “तटस्थ नियम” अक्सर व्यावहारिक रूप से असमान परिणाम देते हैं। उनके अनुसार, ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों के लिए अलग सुरक्षा तंत्र बनाना भेदभाव नहीं, बल्कि वास्तविक समानता की शर्त है। वे यह भी याद दिलाते हैं कि शिकायत दर्ज होने का अर्थ दोष सिद्ध होना नहीं है; जांच प्रक्रिया अभी भी संस्थानों के पास ही रहेगी।

असल समस्या शायद नियमों से ज्यादा उनके क्रियान्वयन और संवाद की कमी में है। UGC ने नियम तो जारी कर दिए, लेकिन व्यापक अकादमिक विमर्श, फैकल्टी और छात्रों को विश्वास में लेने की प्रक्रिया कमजोर रही। नतीजा यह हुआ कि सुधार की मंशा पर भी संदेह गहराने लगा। उच्च शिक्षा का वातावरण भरोसे, बहस और स्वतंत्र सोच पर टिका होता है—अगर नियम डर या ध्रुवीकरण को जन्म दें, तो उद्देश्य भटक सकता है।

आगे की राह संतुलन में है। भेदभाव के खिलाफ सख्त तंत्र जरूरी है, लेकिन उसके साथ पारदर्शिता, जवाबदेही और सभी वर्गों के लिए समान सुरक्षा भी उतनी ही अहम है। UGC को चाहिए कि वह नियमों की समीक्षा, स्पष्ट दिशानिर्देश और दुरुपयोग रोकने के उपायों पर खुलकर बात करे।

समानता कानून से नहीं, भरोसे से आती है। अगर नए नियम इस भरोसे को मजबूत कर पाए, तो वे उच्च शिक्षा के लिए मील का पत्थर बन सकते हैं। यदि नहीं, तो यह सुधार अनचाहे विभाजन की कहानी भी लिख सकता है।

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