संकष्टी चतुर्थी 4 जून को, भगवान गणेश की पूजा से दूर होती हैं बाधाएं

धर्म डेस्क

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4 जून 2026 को मनाई जाएगी संकष्टी चतुर्थी, चंद्र दर्शन के बाद खुलेगा व्रत, गणपति उपासना का विशेष महत्व

हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनके स्मरण के बिना अधूरी मानी जाती है। ऐसे में संकष्टी चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश के भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। जून माह की संकष्टी चतुर्थी 4 जून 2026, गुरुवार को मनाई जाएगी। देशभर में श्रद्धालु इस दिन भगवान गणपति की पूजा-अर्चना करेंगे और सुख, समृद्धि तथा जीवन की बाधाओं को दूर करने की कामना से व्रत रखेंगे।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संकष्टी चतुर्थी हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आती है। 'संकष्टी' शब्द का अर्थ है संकटों से मुक्ति, जबकि 'चतुर्थी' भगवान गणेश को समर्पित तिथि मानी जाती है। यही कारण है कि इस दिन की गई पूजा को जीवन की परेशानियों और बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और उत्तर भारत के कई हिस्सों में यह पर्व बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

पंचांग के अनुसार जून 2026 की संकष्टी चतुर्थी तिथि 3 जून की रात 9 बजकर 21 मिनट से शुरू होगी और 4 जून की रात 11 बजकर 30 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर व्रत और पूजा 4 जून को की जाएगी। श्रद्धालु पूरे दिन उपवास रखेंगे और चंद्र दर्शन के बाद भगवान गणेश की पूजा कर व्रत का पारण करेंगे।

संकष्टी चतुर्थी का व्रत कठिन लेकिन अत्यंत फलदायी माना जाता है। कई श्रद्धालु निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। व्रत के दौरान अनाज और सामान्य भोजन का सेवन नहीं किया जाता। साबूदाना खिचड़ी, मूंगफली, फल, दूध और सूखे मेवे जैसे खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता है। माना जाता है कि संयम और श्रद्धा के साथ रखा गया यह व्रत भगवान गणेश की विशेष कृपा दिलाता है।

व्रत के दिन सुबह स्नान के बाद भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाकर पूजा की जाती है। शाम के समय विशेष पूजा का आयोजन होता है। गणपति को दूर्वा घास, लाल फूल, सिंदूर और मोदक अर्पित किए जाते हैं। मोदक भगवान गणेश का प्रिय भोग माना जाता है और अधिकांश घरों में विशेष रूप से तैयार किया जाता है। पूजा के दौरान गणेश मंत्रों का जाप और आरती की जाती है।

धार्मिक परंपरा के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन के बिना पूर्ण नहीं माना जाता। शाम को चंद्रमा निकलने के बाद श्रद्धालु चंद्र देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं। जल, अक्षत, चंदन और फूल चढ़ाकर चंद्रमा की पूजा की जाती है। इसके बाद भगवान गणेश की आरती कर व्रत खोला जाता है। मान्यता है कि इस विधि से पूजा करने पर जीवन के संकट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी कई धार्मिक कथाएं भी प्रचलित हैं। इनमें बताया गया है कि भगवान गणेश अपने भक्तों के कष्ट हरते हैं और उन्हें सफलता का मार्ग दिखाते हैं। इसलिए विद्यार्थी, नौकरीपेशा लोग, व्यापारी और परिवार की खुशहाली की कामना करने वाले श्रद्धालु इस व्रत को विशेष श्रद्धा से करते हैं। कई निःसंतान दंपति भी संतान प्राप्ति की इच्छा से यह व्रत रखते हैं।

धर्माचार्यों के अनुसार इस दिन गणेश अष्टोत्तर शतनाम, संकट नाशन स्तोत्र और "वक्रतुंड महाकाय" मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। गणेश पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों के पाठ का भी विशेष महत्व बताया गया है। कई मंदिरों में सामूहिक पूजा, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।

महाराष्ट्र में संकष्टी चतुर्थी का उत्साह सबसे अधिक देखने को मिलता है। मुंबई, पुणे, नागपुर और अन्य शहरों के प्रमुख गणेश मंदिरों में भक्तों की लंबी कतारें लगती हैं। दक्षिण भारत में इसे संकटहारा चतुर्थी के नाम से जाना जाता है और वहां भी गणपति मंदिरों में विशेष पूजा होती है। हालांकि अब देशभर में इस पर्व की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।

धार्मिक मान्यता है कि नियमित रूप से संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने वाले व्यक्ति के जीवन में आने वाली परेशानियां कम होती हैं और उसे मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मसंयम, धैर्य और सकारात्मक सोच का संदेश भी देता है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में यह दिन लोगों को आध्यात्मिक रूप से खुद से जुड़ने का अवसर देता है।

4 जून को आने वाली संकष्टी चतुर्थी को लेकर मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर तैयारियां शुरू हो गई हैं। श्रद्धालु भगवान गणेश की पूजा कर परिवार के सुख, समृद्धि और सफलता की कामना करेंगे। माना जाता है कि सच्चे मन से किए गए गणेश पूजन से जीवन के बड़े से बड़े संकट भी दूर हो सकते हैं और व्यक्ति को नई ऊर्जा तथा आत्मविश्वास प्राप्त होता है।

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31 May 2026 By Vaishnavi.J

संकष्टी चतुर्थी 4 जून को, भगवान गणेश की पूजा से दूर होती हैं बाधाएं

धर्म डेस्क

हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनके स्मरण के बिना अधूरी मानी जाती है। ऐसे में संकष्टी चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश के भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। जून माह की संकष्टी चतुर्थी 4 जून 2026, गुरुवार को मनाई जाएगी। देशभर में श्रद्धालु इस दिन भगवान गणपति की पूजा-अर्चना करेंगे और सुख, समृद्धि तथा जीवन की बाधाओं को दूर करने की कामना से व्रत रखेंगे।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संकष्टी चतुर्थी हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आती है। 'संकष्टी' शब्द का अर्थ है संकटों से मुक्ति, जबकि 'चतुर्थी' भगवान गणेश को समर्पित तिथि मानी जाती है। यही कारण है कि इस दिन की गई पूजा को जीवन की परेशानियों और बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और उत्तर भारत के कई हिस्सों में यह पर्व बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

पंचांग के अनुसार जून 2026 की संकष्टी चतुर्थी तिथि 3 जून की रात 9 बजकर 21 मिनट से शुरू होगी और 4 जून की रात 11 बजकर 30 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर व्रत और पूजा 4 जून को की जाएगी। श्रद्धालु पूरे दिन उपवास रखेंगे और चंद्र दर्शन के बाद भगवान गणेश की पूजा कर व्रत का पारण करेंगे।

संकष्टी चतुर्थी का व्रत कठिन लेकिन अत्यंत फलदायी माना जाता है। कई श्रद्धालु निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। व्रत के दौरान अनाज और सामान्य भोजन का सेवन नहीं किया जाता। साबूदाना खिचड़ी, मूंगफली, फल, दूध और सूखे मेवे जैसे खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता है। माना जाता है कि संयम और श्रद्धा के साथ रखा गया यह व्रत भगवान गणेश की विशेष कृपा दिलाता है।

व्रत के दिन सुबह स्नान के बाद भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाकर पूजा की जाती है। शाम के समय विशेष पूजा का आयोजन होता है। गणपति को दूर्वा घास, लाल फूल, सिंदूर और मोदक अर्पित किए जाते हैं। मोदक भगवान गणेश का प्रिय भोग माना जाता है और अधिकांश घरों में विशेष रूप से तैयार किया जाता है। पूजा के दौरान गणेश मंत्रों का जाप और आरती की जाती है।

धार्मिक परंपरा के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन के बिना पूर्ण नहीं माना जाता। शाम को चंद्रमा निकलने के बाद श्रद्धालु चंद्र देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं। जल, अक्षत, चंदन और फूल चढ़ाकर चंद्रमा की पूजा की जाती है। इसके बाद भगवान गणेश की आरती कर व्रत खोला जाता है। मान्यता है कि इस विधि से पूजा करने पर जीवन के संकट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी कई धार्मिक कथाएं भी प्रचलित हैं। इनमें बताया गया है कि भगवान गणेश अपने भक्तों के कष्ट हरते हैं और उन्हें सफलता का मार्ग दिखाते हैं। इसलिए विद्यार्थी, नौकरीपेशा लोग, व्यापारी और परिवार की खुशहाली की कामना करने वाले श्रद्धालु इस व्रत को विशेष श्रद्धा से करते हैं। कई निःसंतान दंपति भी संतान प्राप्ति की इच्छा से यह व्रत रखते हैं।

धर्माचार्यों के अनुसार इस दिन गणेश अष्टोत्तर शतनाम, संकट नाशन स्तोत्र और "वक्रतुंड महाकाय" मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। गणेश पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों के पाठ का भी विशेष महत्व बताया गया है। कई मंदिरों में सामूहिक पूजा, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।

महाराष्ट्र में संकष्टी चतुर्थी का उत्साह सबसे अधिक देखने को मिलता है। मुंबई, पुणे, नागपुर और अन्य शहरों के प्रमुख गणेश मंदिरों में भक्तों की लंबी कतारें लगती हैं। दक्षिण भारत में इसे संकटहारा चतुर्थी के नाम से जाना जाता है और वहां भी गणपति मंदिरों में विशेष पूजा होती है। हालांकि अब देशभर में इस पर्व की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।

धार्मिक मान्यता है कि नियमित रूप से संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने वाले व्यक्ति के जीवन में आने वाली परेशानियां कम होती हैं और उसे मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मसंयम, धैर्य और सकारात्मक सोच का संदेश भी देता है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में यह दिन लोगों को आध्यात्मिक रूप से खुद से जुड़ने का अवसर देता है।

4 जून को आने वाली संकष्टी चतुर्थी को लेकर मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर तैयारियां शुरू हो गई हैं। श्रद्धालु भगवान गणेश की पूजा कर परिवार के सुख, समृद्धि और सफलता की कामना करेंगे। माना जाता है कि सच्चे मन से किए गए गणेश पूजन से जीवन के बड़े से बड़े संकट भी दूर हो सकते हैं और व्यक्ति को नई ऊर्जा तथा आत्मविश्वास प्राप्त होता है।

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