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ज्येष्ठ पूर्णिमा कल: वट पूर्णिमा व्रत, कबीर जयंती और विशेष पूजा का शुभ संयोग
धर्म डेस्क
31 मई को मनाई जाएगी ज्येष्ठ पूर्णिमा, देशभर में श्रद्धालु करेंगे व्रत, दान-पुण्य और भगवान विष्णु की आराधना
हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि को बेहद शुभ और पुण्यदायी माना जाता है। इस वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा 31 मई 2026, रविवार को पड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत, पूजा-पाठ, दान और आध्यात्मिक साधना का विशेष महत्व होता है। ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को कई महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों और पर्वों के साथ जोड़ा जाता है। इस बार ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर वट पूर्णिमा व्रत, कबीर जयंती और देव स्नान पूर्णिमा भी मनाई जाएगी। ऐसे में यह दिन धार्मिक दृष्टि से और भी खास माना जा रहा है।
पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि 30 मई को सुबह 11 बजकर 58 मिनट से शुरू होगी और 31 मई को दोपहर 2 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर 31 मई को पूर्णिमा व्रत और पूजा का विधान किया जाएगा। देशभर के मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस दिन उपवास रखकर भगवान विष्णु, भगवान सत्यनारायण और चंद्र देव की पूजा करेंगे।
ज्येष्ठ पूर्णिमा को आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का दिन माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किए गए दान-पुण्य और पूजा-पाठ का कई गुना फल प्राप्त होता है। विशेष रूप से भगवान सत्यनारायण की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कई घरों में इस अवसर पर सत्यनारायण कथा का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें परिवार और आसपास के लोग शामिल होकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
इस दिन वट पूर्णिमा व्रत का भी विशेष महत्व है। खासकर विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से वट वृक्ष की पूजा करती हैं। महिलाएं बरगद के पेड़ के चारों ओर धागा बांधकर पूजा-अर्चना करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और आज भी देश के कई राज्यों में बड़े श्रद्धाभाव के साथ निभाई जाती है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर संत कबीरदास की जयंती भी मनाई जाती है। कबीरदास भारतीय संत परंपरा के प्रमुख कवि और समाज सुधारक माने जाते हैं। उनके दोहे और विचार आज भी समाज को सादगी, समानता और मानवता का संदेश देते हैं। इस अवसर पर देशभर में कबीर पंथ से जुड़े आश्रमों और संस्थानों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उनके जीवन और शिक्षाओं को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी जाती है।
इसी दिन देव स्नान पूर्णिमा का पर्व भी मनाया जाएगा। यह पर्व विशेष रूप से ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर में महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का विशेष स्नान कराया जाता है। इसके बाद भगवान कुछ दिनों के लिए दर्शन नहीं देते और फिर रथ यात्रा के दौरान भक्तों को दर्शन होते हैं। इस परंपरा को देखने के लिए हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं।
पूर्णिमा का संबंध चंद्रमा से भी माना जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार चंद्रमा मन और भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए पूर्णिमा की रात चंद्र दर्शन और चंद्र देव को अर्घ्य देने की परंपरा है। माना जाता है कि इससे मानसिक शांति, सकारात्मक सोच और जीवन में संतुलन बना रहता है। कई श्रद्धालु शाम के समय चंद्रमा को जल अर्पित कर विशेष प्रार्थना करते हैं।
धार्मिक ग्रंथों में पूर्णिमा के दिन दान का विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र, अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। कई लोग इस दिन गौ सेवा, गरीबों को भोजन वितरण और धार्मिक संस्थाओं में सहयोग भी करते हैं। मान्यता है कि ऐसे कार्यों से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है और नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं।
व्रत रखने वाले श्रद्धालु आमतौर पर फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन मांसाहार, तामसिक भोजन और नकारात्मक विचारों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। कई लोग दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को पूजा और चंद्र दर्शन के पश्चात व्रत खोलते हैं। साथ ही विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता और अन्य धार्मिक ग्रंथों का पाठ भी किया जाता है।
धार्मिक जानकारों का कहना है कि पूर्णिमा का समय ध्यान और साधना के लिए भी अनुकूल माना जाता है। पूर्ण चंद्रमा की ऊर्जा मन को स्थिर करने और आत्मचिंतन में सहायता करती है। यही वजह है कि कई साधक और आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले लोग इस दिन विशेष ध्यान और जप करते हैं।
ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026 केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि श्रद्धा, सेवा, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक जागरूकता का अवसर भी है। वट पूर्णिमा, कबीर जयंती और देव स्नान पूर्णिमा जैसे महत्वपूर्ण पर्वों के एक साथ पड़ने से इस दिन का महत्व और बढ़ गया है। ऐसे में देशभर के श्रद्धालु पूरे उत्साह और आस्था के साथ इस शुभ अवसर को मनाने की तैयारी कर रहे हैं।
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ज्येष्ठ पूर्णिमा कल: वट पूर्णिमा व्रत, कबीर जयंती और विशेष पूजा का शुभ संयोग
धर्म डेस्क
हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि को बेहद शुभ और पुण्यदायी माना जाता है। इस वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा 31 मई 2026, रविवार को पड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत, पूजा-पाठ, दान और आध्यात्मिक साधना का विशेष महत्व होता है। ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को कई महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों और पर्वों के साथ जोड़ा जाता है। इस बार ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर वट पूर्णिमा व्रत, कबीर जयंती और देव स्नान पूर्णिमा भी मनाई जाएगी। ऐसे में यह दिन धार्मिक दृष्टि से और भी खास माना जा रहा है।
पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि 30 मई को सुबह 11 बजकर 58 मिनट से शुरू होगी और 31 मई को दोपहर 2 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर 31 मई को पूर्णिमा व्रत और पूजा का विधान किया जाएगा। देशभर के मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस दिन उपवास रखकर भगवान विष्णु, भगवान सत्यनारायण और चंद्र देव की पूजा करेंगे।
ज्येष्ठ पूर्णिमा को आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का दिन माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किए गए दान-पुण्य और पूजा-पाठ का कई गुना फल प्राप्त होता है। विशेष रूप से भगवान सत्यनारायण की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कई घरों में इस अवसर पर सत्यनारायण कथा का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें परिवार और आसपास के लोग शामिल होकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
इस दिन वट पूर्णिमा व्रत का भी विशेष महत्व है। खासकर विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से वट वृक्ष की पूजा करती हैं। महिलाएं बरगद के पेड़ के चारों ओर धागा बांधकर पूजा-अर्चना करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और आज भी देश के कई राज्यों में बड़े श्रद्धाभाव के साथ निभाई जाती है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर संत कबीरदास की जयंती भी मनाई जाती है। कबीरदास भारतीय संत परंपरा के प्रमुख कवि और समाज सुधारक माने जाते हैं। उनके दोहे और विचार आज भी समाज को सादगी, समानता और मानवता का संदेश देते हैं। इस अवसर पर देशभर में कबीर पंथ से जुड़े आश्रमों और संस्थानों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उनके जीवन और शिक्षाओं को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी जाती है।
इसी दिन देव स्नान पूर्णिमा का पर्व भी मनाया जाएगा। यह पर्व विशेष रूप से ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर में महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का विशेष स्नान कराया जाता है। इसके बाद भगवान कुछ दिनों के लिए दर्शन नहीं देते और फिर रथ यात्रा के दौरान भक्तों को दर्शन होते हैं। इस परंपरा को देखने के लिए हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं।
पूर्णिमा का संबंध चंद्रमा से भी माना जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार चंद्रमा मन और भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए पूर्णिमा की रात चंद्र दर्शन और चंद्र देव को अर्घ्य देने की परंपरा है। माना जाता है कि इससे मानसिक शांति, सकारात्मक सोच और जीवन में संतुलन बना रहता है। कई श्रद्धालु शाम के समय चंद्रमा को जल अर्पित कर विशेष प्रार्थना करते हैं।
धार्मिक ग्रंथों में पूर्णिमा के दिन दान का विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र, अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। कई लोग इस दिन गौ सेवा, गरीबों को भोजन वितरण और धार्मिक संस्थाओं में सहयोग भी करते हैं। मान्यता है कि ऐसे कार्यों से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है और नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं।
व्रत रखने वाले श्रद्धालु आमतौर पर फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन मांसाहार, तामसिक भोजन और नकारात्मक विचारों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। कई लोग दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को पूजा और चंद्र दर्शन के पश्चात व्रत खोलते हैं। साथ ही विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता और अन्य धार्मिक ग्रंथों का पाठ भी किया जाता है।
धार्मिक जानकारों का कहना है कि पूर्णिमा का समय ध्यान और साधना के लिए भी अनुकूल माना जाता है। पूर्ण चंद्रमा की ऊर्जा मन को स्थिर करने और आत्मचिंतन में सहायता करती है। यही वजह है कि कई साधक और आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले लोग इस दिन विशेष ध्यान और जप करते हैं।
ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026 केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि श्रद्धा, सेवा, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक जागरूकता का अवसर भी है। वट पूर्णिमा, कबीर जयंती और देव स्नान पूर्णिमा जैसे महत्वपूर्ण पर्वों के एक साथ पड़ने से इस दिन का महत्व और बढ़ गया है। ऐसे में देशभर के श्रद्धालु पूरे उत्साह और आस्था के साथ इस शुभ अवसर को मनाने की तैयारी कर रहे हैं।
