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आखिर क्यों विदाई में दुल्हन सिर के पीछे से फेंकती है चावल ? जानें,परंपरा के पीछे छिपा है गहरा सांस्कृतिक और धार्मिक अर्थ
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हिंदू विवाह के प्रमुख संस्कारों में शामिल यह रस्म समृद्धि, कृतज्ञता और परिवार के आशीर्वाद का प्रतीक मानी जाती है
हिंदू विवाह में निभाई जाने वाली प्रत्येक रस्म का अपना सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व होता है। इनमें से एक है विदाई के समय दुल्हन द्वारा अपने सिर के पीछे से चावल फेंकने की रस्म, जिसे पूरे भारतीय समाज में आस्था, भावनाओं और परंपरा का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। आज की ताज़ा ख़बरों और सांस्कृतिक चर्चाओं में यह विषय एक प्रमुख पब्लिक इंटरेस्ट स्टोरी के रूप में सामने आया है।
दुल्हन जब विवाह के बाद माता-पिता के घर से विदा होती है, तो वह दोनों हाथों से चावल लेकर अपने सिर के पीछे से घर की ओर उछालती है। यह क्रिया महज़ एक प्रथा नहीं, बल्कि अन्न, समृद्धि और खुशहाली के आशीर्वाद का संदेश लिए होती है। घरेलू परिवेश में अन्न को देवी अन्नपूर्णा का स्वरूप माना जाता है, इसलिए चावल फेंकना मायके की निरंतर संपन्नता की कामना का प्रतीक है।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार चावल शुभता, धन और स्थिरता का द्योतक है। दुल्हन जब इसे पीछे फेंकती है, तो वह अपने मायके में अन्न और सौभाग्य की भरपूरता बनी रहने की प्रार्थना करती है। यह रस्म माता-पिता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का संवेदनशील तरीका भी है, क्योंकि उसी घर ने दुल्हन का पालन-पोषण किया है और उसे जीवन के नए अध्याय के लिए तैयार किया है।
सांस्कृतिक दृष्टि से इस रस्म को परिवारिक बंधनों को सुदृढ़ करने से भी जोड़ा जाता है। चावल फेंकना एक तरह का आशीर्वाद लौटाना है—दुल्हन अपने परिवार के सुख-समृद्धि के लिए शुभकामना देती हुई नए गृहस्थ जीवन की ओर कदम बढ़ाती है। कई समुदायों में इसे घर से बुरे प्रभावों को दूर करने का प्रतीकात्मक उपाय भी माना जाता है, ताकि दुल्हन के प्रस्थान के साथ घर का वातावरण सकारात्मक बना रहे।
भावनात्मक पहलू भी इस रस्म से गहराई से जुड़ा है। विदाई का क्षण स्वयं में अत्यंत संवेदनशील होता है, और चावल फेंकने की यह परंपरा उस भावनात्मक बदलाव—मायके से ससुराल की ओर संक्रमण—को दर्शाती है। यह संकेत देता है कि दुल्हन अपने मायके से स्नेह और आभार लेकर जा रही है तथा अपने पीछे शुभाकांक्षाओं और समृद्धि का प्रतीक छोड़ रही है।
चावल फेंकने की यह परंपरा सदियों पुरानी है और भारतीय समाज में निरंतर निभाई जाती रही है। आज भी विवाह समारोहों में यह रस्म समान श्रद्धा के साथ पूरी की जाती है और भारतीय संस्कृति, परिवारिक मूल्यों तथा धार्मिक विश्वासों का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।
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