चैत्र नवरात्रि द्वितीय दिवस: तप, संयम और साधना की अधिष्ठात्री मां ब्रह्मचारिणी की आराधना आज

धर्म डेस्क

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शुभ मुहूर्त, पूजन-विधि और मंत्रों से करें मां की कृपा प्राप्ति

चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व का आज द्वितीय दिवस श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। इस दिन आदिशक्ति जगदम्बा के द्वितीय स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की उपासना का विशेष महत्व बताया गया है। सनातन परंपरा के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी तप, त्याग, संयम और साधना की साक्षात् मूर्ति हैं, जिनकी आराधना से साधक को आत्मबल, धैर्य और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

शास्त्रों में वर्णित है कि ‘ब्रह्मचारिणी’ वह शक्ति हैं जो कठोर तपस्या का आचरण करती हैं। उनके करकमलों में जपमाला और कमंडल विराजमान हैं, जो साधना, एकाग्रता और वैराग्य के प्रतीक हैं। भक्तजन इस दिन व्रत, जप और ध्यान के माध्यम से मां को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं।

पूजन के शुभ मुहूर्त

धर्माचार्यों के अनुसार इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में साधना सर्वाधिक फलदायी मानी गई है। इसके अतिरिक्त अभिजीत मुहूर्त, सायंकालीन संध्या तथा रात्रि का निशिता काल भी पूजन के लिए उत्तम है। इन शुभ समयों में मां की आराधना करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

पूजन-विधि: श्रद्धा ही सर्वोपरि

प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर पूजा स्थल को पवित्र किया जाता है। इसके उपरांत मां ब्रह्मचारिणी की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित कर विधिवत कलश पूजन किया जाता है। गंगाजल से स्नान, चंदन, अक्षत, पुष्प अर्पण कर धूप-दीप प्रज्वलित किए जाते हैं। श्रद्धालु मां को मिश्री, फल एवं पंचामृत का भोग अर्पित करते हैं तथा अंत में आरती कर प्रसाद वितरित करते हैं।

मंत्र-जाप का महत्व

इस दिन निम्न मंत्र का जप अत्यंत फलदायी माना गया है—
“या देवी सर्वभूतेषु ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”

इस मंत्र के जप से साधक के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मन एकाग्र होता है।

प्रिय भोग और आध्यात्मिक अर्थ

मां ब्रह्मचारिणी को मिश्री, पंचामृत एवं श्वेत वर्ण के प्रसाद अर्पित करना शुभ माना गया है। यह भोग शुद्धता, सरलता और सात्विकता का प्रतीक है, जो साधक के जीवन में संतुलन और शांति का संचार करता है।

आध्यात्मिक महत्व और साधना का संदेश

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी की उपासना से साधक को कठिन तपस्या के समान फल प्राप्त होता है। यह दिन आत्मसंयम, धैर्य और साधना के मार्ग पर अग्रसर होने का प्रेरक है। विशेषकर विद्यार्थियों और साधकों के लिए यह दिन अत्यंत कल्याणकारी माना गया है, क्योंकि मां की कृपा से ज्ञान, एकाग्रता और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।नवरात्रि के इस पावन अवसर पर देशभर में श्रद्धालु भक्ति में लीन हैं और मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना के माध्यम से आत्मिक उन्नति की कामना कर रहे हैं।

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20 Mar 2026 By ANKITA

चैत्र नवरात्रि द्वितीय दिवस: तप, संयम और साधना की अधिष्ठात्री मां ब्रह्मचारिणी की आराधना आज

धर्म डेस्क

चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व का आज द्वितीय दिवस श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। इस दिन आदिशक्ति जगदम्बा के द्वितीय स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की उपासना का विशेष महत्व बताया गया है। सनातन परंपरा के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी तप, त्याग, संयम और साधना की साक्षात् मूर्ति हैं, जिनकी आराधना से साधक को आत्मबल, धैर्य और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

शास्त्रों में वर्णित है कि ‘ब्रह्मचारिणी’ वह शक्ति हैं जो कठोर तपस्या का आचरण करती हैं। उनके करकमलों में जपमाला और कमंडल विराजमान हैं, जो साधना, एकाग्रता और वैराग्य के प्रतीक हैं। भक्तजन इस दिन व्रत, जप और ध्यान के माध्यम से मां को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं।

पूजन के शुभ मुहूर्त

धर्माचार्यों के अनुसार इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में साधना सर्वाधिक फलदायी मानी गई है। इसके अतिरिक्त अभिजीत मुहूर्त, सायंकालीन संध्या तथा रात्रि का निशिता काल भी पूजन के लिए उत्तम है। इन शुभ समयों में मां की आराधना करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

पूजन-विधि: श्रद्धा ही सर्वोपरि

प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर पूजा स्थल को पवित्र किया जाता है। इसके उपरांत मां ब्रह्मचारिणी की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित कर विधिवत कलश पूजन किया जाता है। गंगाजल से स्नान, चंदन, अक्षत, पुष्प अर्पण कर धूप-दीप प्रज्वलित किए जाते हैं। श्रद्धालु मां को मिश्री, फल एवं पंचामृत का भोग अर्पित करते हैं तथा अंत में आरती कर प्रसाद वितरित करते हैं।

मंत्र-जाप का महत्व

इस दिन निम्न मंत्र का जप अत्यंत फलदायी माना गया है—
“या देवी सर्वभूतेषु ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”

इस मंत्र के जप से साधक के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मन एकाग्र होता है।

प्रिय भोग और आध्यात्मिक अर्थ

मां ब्रह्मचारिणी को मिश्री, पंचामृत एवं श्वेत वर्ण के प्रसाद अर्पित करना शुभ माना गया है। यह भोग शुद्धता, सरलता और सात्विकता का प्रतीक है, जो साधक के जीवन में संतुलन और शांति का संचार करता है।

आध्यात्मिक महत्व और साधना का संदेश

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी की उपासना से साधक को कठिन तपस्या के समान फल प्राप्त होता है। यह दिन आत्मसंयम, धैर्य और साधना के मार्ग पर अग्रसर होने का प्रेरक है। विशेषकर विद्यार्थियों और साधकों के लिए यह दिन अत्यंत कल्याणकारी माना गया है, क्योंकि मां की कृपा से ज्ञान, एकाग्रता और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।नवरात्रि के इस पावन अवसर पर देशभर में श्रद्धालु भक्ति में लीन हैं और मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना के माध्यम से आत्मिक उन्नति की कामना कर रहे हैं।

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https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/chaitra-navratri-second-day-worship-of-mother-brahmacharini-the-presiding/article-48540

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