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अयोध्या में आध्यात्मिक ऊर्जा का महाआयोजन: ‘राम रक्षा यंत्र’ प्राण प्रतिष्ठा में अम्मा का संदेश—संस्कारों से ही बचेगा भविष्य
अयोध्या
मर्यादा, अध्यात्म और सनातन चेतना की पावन धरती अयोध्या एक बार फिर ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बनी, जब माता अमृतानंदमयी देवी (अम्मा) ने श्री राम जन्मभूमि मंदिर परिसर में ‘राम रक्षा यंत्र’ की प्राण प्रतिष्ठा में भाग लेकर पूरे आयोजन को दिव्य आभा से भर दिया।
चैत्र नवरात्रि और हिंदू नववर्ष के शुभ संगम पर आयोजित इस विशेष अनुष्ठान में आध्यात्मिक ऊर्जा और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिला। देशभर से आए संत, संन्यासी, विद्वान और करीब 1,200 से अधिक श्रद्धालु इस दिव्य अवसर के साक्षी बने।
“राम मंदिर: केवल निर्माण नहीं, सनातन चेतना का पुनर्जागरण”
अम्मा ने अपने उद्बोधन में राम जन्मभूमि मंदिर को “सनातन धर्म के लिए एक नए युग का उदय” बताया। उन्होंने कहा कि यह मंदिर केवल पत्थरों से बना ढांचा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, त्याग और सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है।
उनके अनुसार, ‘राम रक्षा यंत्र’ की प्राण प्रतिष्ठा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के भीतर छिपी शक्ति, संतुलन और स्पष्टता को जागृत करने का एक आध्यात्मिक माध्यम है।
युवाओं में मूल्य संकट पर चिंता
अपने संबोधन में अम्मा ने वर्तमान समाज, विशेषकर युवाओं में बढ़ते मूल्य संकट पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज की भौतिकवादी दौड़ में इंसान बाहरी सफलता तो पा रहा है, लेकिन आंतरिक शांति और नैतिकता से दूर होता जा रहा है।
अम्मा ने स्पष्ट किया कि “संस्कार ही वह आधार हैं, जो किसी भी समाज को मजबूत बनाते हैं।” उन्होंने परिवार और शिक्षण संस्थानों की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि बच्चों में करुणा, संयम, सहनशीलता और विवेक जैसे गुण विकसित करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
रामायण: जीवन का शाश्वत मार्गदर्शक
अम्मा ने भगवान श्रीराम के जीवन को आदर्श मानवता का सर्वोच्च उदाहरण बताते हुए कहा कि आज जब समाज नैतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है, तब रामायण हमें दिशा, धैर्य और जीवन का उद्देश्य सिखाती है।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम का जीवन केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि अनुकरण का आदर्श है—जहां कर्तव्य, त्याग और सत्य सर्वोपरि हैं।
‘राम रक्षा यंत्र’: सुरक्षा से आगे, चेतना का विस्तार
इस भव्य आयोजन में स्थापित ‘राम रक्षा यंत्र’ को केवल नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना के जागरण और आत्मिक उन्नति का माध्यम बताया गया।
अम्मा के अनुसार, यह यंत्र व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है, जिससे वह जीवन की चुनौतियों का सामना संतुलित और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ कर सके।
आस्था, अध्यात्म और भविष्य की दिशा
अयोध्या में आयोजित यह समारोह केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज को मूल्यों, संस्कृति और आध्यात्मिकता की ओर लौटने का एक सशक्त संदेश बनकर उभरा।
अम्मा का यह संदेश स्पष्ट था—
“जब तक हम अपने भीतर के मूल्यों को नहीं जगाएंगे, तब तक बाहरी विकास अधूरा ही रहेगा।”
इस ऐतिहासिक आयोजन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि भारत की आत्मा उसकी आध्यात्मिक परंपराओं और संस्कारों में ही बसती है।

