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सत्यकथा : पाप का नशा....... प्यार में डूबकर प्रेमी से करवाई सुहाग की हत्या
खंडवा : सत्यकथा
इश्क की आग
सुनीता रूप से सुंदर थी, पर जिंदगी उससे खुशियाँ छीन ले गई थी। पति रमेश दिन-रात बेलदारी के काम में पिसता और घर लौटकर इतना थका होता कि पत्नी की तरफ नज़र उठाकर देखना भी उसके लिए भारी पड़ता। सुनीता जवान थी, अरमानों से भरी थी। भीतर एक सूनापन था, जो धीरे-धीरे उसे तड़पाने लगा।
इसी बीच गांव का एक युवक—सुनील—उसकी जिंदगी में आया। बरसात की एक दोपहर, जब सुनीता भीगते हुए खेत से लौट रही थी और कपड़े उसके शरीर से चिपक गए थे, तभी पहली बार सुनील की आंखों में उसके लिए वह नशा भरी चमक उभरी।
पेड़ की ओट में खड़ा सुनील उसे घूर रहा था।
“रमेश तो किस्मत वाला है…”—उसने धीमे स्वर में कहा।
सुनीता लजाकर चुप रह गई।
बस, उसी क्षण दोनों के बीच वह मौन रिश्ता जुड़ गया जिसने आगे चलकर पूरे गांव को हिला डाला।

गुपचुप मुलाकातें
कुछ ही दिनों में सुनील और सुनीता एक-दूसरे के करीब आ गए।
पहले खेतों की मेड़ पर, फिर झाड़ियों की ओट में और आखिरकार रमेश की दोस्ती का बहाना बनाकर सुनील का घर में आना-जाना शुरू हो गया।
दोनों का संबंध अब केवल चोरी-छिपे की मुलाकात नहीं था, बल्कि पाप की ऐसी डोर थी जिसमें दोनों बंध चुके थे।
लेकिन गांव की नजरें बहुत पैनी होती हैं।
एक दिन जब दोनों खेत में रंगे हाथों पकड़े गए तो बात जंगल में आग की तरह फैल गई।
रमेश के कानों तक भी यह खबर पहुंच गई।
पति का क्रोध
रमेश सीधा-साधा इंसान था, पर पत्नी की बेवफाई ने उसे तोड़ दिया।
उसने सुनीता की खूब पिटाई की और घर से बाहर निकलने पर सख्त पाबंदी लगा दी।
सुनील के आने-जाने पर रोक लग गई।
लेकिन जिस प्यार का नशा दोनों की रगों में उतर चुका था, उसे बंद दरवाजे और डांट-फटकार कैसे रोक सकती थी?
सुनील और सुनीता अब और ज्यादा बेकाबू हो गए।
खून का फैसला
जुलाई के महीने में एक दिन, दोनों की चोरी-छिपे मुलाकात हुई।
सुनील ने सुनीता से कहा—
“जब तक रमेश जिंदा है, हम कभी साथ नहीं रह पाएंगे।”
सुनीता की आंखों में एक ठंडी चमक आई। उसने धीरे से फुसफुसाया—
“अगर सचमुच मुझे चाहते हो तो रमेश को रास्ते से हटा दो।”
बस, यही वह क्षण था जिसने हत्या का बीज बो दिया।
हत्या की रात
26 जुलाई की रात रमेश रोज की तरह काम से लौट रहा था।
सलाई गांव के रास्ते में, पेड़ के पीछे छुपा सुनील उसका इंतजार कर रहा था। कुल्हाड़ी पहले से वहां रखी थी।
रमेश गुजरा तो सुनील ने उसे आवाज दी।
रमेश रुका। कुछ देर दोनों के बीच बातें हुईं।
फिर जैसे ही रमेश ने बाइक स्टार्ट की, सुनील ने पीछे से कुल्हाड़ी उठाई और उसकी गर्दन पर वार कर दिया।
दूसरा वार भी उतना ही तेज था। रमेश वहीं गिर पड़ा।
खून से सनी मिट्टी, रात का सन्नाटा और कुल्हाड़ी पकड़े खड़ा सुनील—उसकी सांसें तेज चल रही थीं।
पर दिल में एक अजीब सुकून था—“अब कोई बाधा नहीं।”
लाश छुपाने की जद्दोजहद
हत्या के तुरंत बाद वह सुनीता के पास भागा।
सुनीता ने सुनते ही प्रेमी से लिपटकर कहा—
“अब मैं सिर्फ तुम्हारी हूं।”
उसने घर से टाट, रस्सी और चादर दी।
सुनील ने शव को ढका और मोटरसाइकिल पर लादकर पास के नाले के झाड़ियों में छुपा दिया।
बाइक को लावारिस हालत में छोड़ दिया।
दो दिन बाद, फिर रात के अंधेरे में वह लौटा और शव को आधा किलोमीटर दूर सलाई नाले में फेंक आया।
प्रेमी की उतावली और खेल बिगड़ना
हत्या के बाद सुनील चाहता था कि जल्दी से जल्दी शव मिले, अंतिम संस्कार हो और सुनीता उसके साथ आ सके।
पर चार दिन बीत गए, शव किसी को नजर नहीं आया।
आखिर 31 जुलाई को खुद सुनील ने गांव वालों में खबर फैलाई कि “सलाई नाले में लाश पड़ी है।”
और फिर मौके पर पहुंचकर उसने सबसे पहले शिनाख्त भी कर दी—
“यह रमेश ही है।”
यहीं से उसका खेल बिगड़ गया।
पुलिस की तफ्तीश
जावर थाना प्रभारी गंगाप्रसाद वर्मा पहले से ही रमेश की गुमशुदगी को लेकर चौकन्ने थे।
जब सड़ी-गली लाश मिली तो गांववाले हिचकिचा रहे थे, लेकिन सुनील पूरे यकीन से कह रहा था—“यह रमेश ही है।”
पुलिस को शक हुआ।
उसके मोबाइल की कॉल डिटेल निकलवाई गई।
और रहस्य का दरवाजा वहीं खुल गया—
पिछले एक महीने में सुनील और सुनीता ने 400 बार फोन पर बातें की थीं।
अब सबकुछ साफ हो गया।
कबूलनामा
पुलिस ने सुनील को कड़ी पूछताछ के लिए उठाया।
थोड़ी देर तक तो वह बहाने बनाता रहा, लेकिन सख्ती बढ़ी तो रो पड़ा।
उसने पूरा राज खोल दिया—
कैसे सुनीता ने उसे बहकाया, कैसे उसने हत्या की और शव ठिकाने लगाया।
जल्द ही सुनीता को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
पांच मासूमों का भविष्य
इस पाप की कीमत सिर्फ रमेश की जान से नहीं चुकाई गई।
रमेश के दो बच्चे अब अनाथ हो गए।
सुनील के तीन बच्चे भी पिता के जेल जाने और मां के अकेले रह जाने के बाद दादा-दादी के सहारे हैं।
एक औरत की न बुझी तृष्णा और एक युवक का पागलपन—दोनों ने मिलकर पांच मासूमों का भविष्य अंधकार में धकेल दिया।
सबक
यह सिर्फ हत्या की कहानी नहीं, बल्कि पाप के नशे की वह दास्तान है जो धीरे-धीरे इंसान को अंधा बना देती है।
सुनीता और सुनील के लिए इश्क पहले मोहब्बत था, फिर जुनून बना और आखिरकार खून की प्यास बन गया।
लेकिन नतीजा?
एक जिंदगी खत्म, दो लोग जेल में और पांच मासूमों का भविष्य तबाह।
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सत्यकथा : पाप का नशा....... प्यार में डूबकर प्रेमी से करवाई सुहाग की हत्या
खंडवा : सत्यकथा
इश्क की आग
सुनीता रूप से सुंदर थी, पर जिंदगी उससे खुशियाँ छीन ले गई थी। पति रमेश दिन-रात बेलदारी के काम में पिसता और घर लौटकर इतना थका होता कि पत्नी की तरफ नज़र उठाकर देखना भी उसके लिए भारी पड़ता। सुनीता जवान थी, अरमानों से भरी थी। भीतर एक सूनापन था, जो धीरे-धीरे उसे तड़पाने लगा।
इसी बीच गांव का एक युवक—सुनील—उसकी जिंदगी में आया। बरसात की एक दोपहर, जब सुनीता भीगते हुए खेत से लौट रही थी और कपड़े उसके शरीर से चिपक गए थे, तभी पहली बार सुनील की आंखों में उसके लिए वह नशा भरी चमक उभरी।
पेड़ की ओट में खड़ा सुनील उसे घूर रहा था।
“रमेश तो किस्मत वाला है…”—उसने धीमे स्वर में कहा।
सुनीता लजाकर चुप रह गई।
बस, उसी क्षण दोनों के बीच वह मौन रिश्ता जुड़ गया जिसने आगे चलकर पूरे गांव को हिला डाला।

गुपचुप मुलाकातें
कुछ ही दिनों में सुनील और सुनीता एक-दूसरे के करीब आ गए।
पहले खेतों की मेड़ पर, फिर झाड़ियों की ओट में और आखिरकार रमेश की दोस्ती का बहाना बनाकर सुनील का घर में आना-जाना शुरू हो गया।
दोनों का संबंध अब केवल चोरी-छिपे की मुलाकात नहीं था, बल्कि पाप की ऐसी डोर थी जिसमें दोनों बंध चुके थे।
लेकिन गांव की नजरें बहुत पैनी होती हैं।
एक दिन जब दोनों खेत में रंगे हाथों पकड़े गए तो बात जंगल में आग की तरह फैल गई।
रमेश के कानों तक भी यह खबर पहुंच गई।
पति का क्रोध
रमेश सीधा-साधा इंसान था, पर पत्नी की बेवफाई ने उसे तोड़ दिया।
उसने सुनीता की खूब पिटाई की और घर से बाहर निकलने पर सख्त पाबंदी लगा दी।
सुनील के आने-जाने पर रोक लग गई।
लेकिन जिस प्यार का नशा दोनों की रगों में उतर चुका था, उसे बंद दरवाजे और डांट-फटकार कैसे रोक सकती थी?
सुनील और सुनीता अब और ज्यादा बेकाबू हो गए।
खून का फैसला
जुलाई के महीने में एक दिन, दोनों की चोरी-छिपे मुलाकात हुई।
सुनील ने सुनीता से कहा—
“जब तक रमेश जिंदा है, हम कभी साथ नहीं रह पाएंगे।”
सुनीता की आंखों में एक ठंडी चमक आई। उसने धीरे से फुसफुसाया—
“अगर सचमुच मुझे चाहते हो तो रमेश को रास्ते से हटा दो।”
बस, यही वह क्षण था जिसने हत्या का बीज बो दिया।
हत्या की रात
26 जुलाई की रात रमेश रोज की तरह काम से लौट रहा था।
सलाई गांव के रास्ते में, पेड़ के पीछे छुपा सुनील उसका इंतजार कर रहा था। कुल्हाड़ी पहले से वहां रखी थी।
रमेश गुजरा तो सुनील ने उसे आवाज दी।
रमेश रुका। कुछ देर दोनों के बीच बातें हुईं।
फिर जैसे ही रमेश ने बाइक स्टार्ट की, सुनील ने पीछे से कुल्हाड़ी उठाई और उसकी गर्दन पर वार कर दिया।
दूसरा वार भी उतना ही तेज था। रमेश वहीं गिर पड़ा।
खून से सनी मिट्टी, रात का सन्नाटा और कुल्हाड़ी पकड़े खड़ा सुनील—उसकी सांसें तेज चल रही थीं।
पर दिल में एक अजीब सुकून था—“अब कोई बाधा नहीं।”
लाश छुपाने की जद्दोजहद
हत्या के तुरंत बाद वह सुनीता के पास भागा।
सुनीता ने सुनते ही प्रेमी से लिपटकर कहा—
“अब मैं सिर्फ तुम्हारी हूं।”
उसने घर से टाट, रस्सी और चादर दी।
सुनील ने शव को ढका और मोटरसाइकिल पर लादकर पास के नाले के झाड़ियों में छुपा दिया।
बाइक को लावारिस हालत में छोड़ दिया।
दो दिन बाद, फिर रात के अंधेरे में वह लौटा और शव को आधा किलोमीटर दूर सलाई नाले में फेंक आया।
प्रेमी की उतावली और खेल बिगड़ना
हत्या के बाद सुनील चाहता था कि जल्दी से जल्दी शव मिले, अंतिम संस्कार हो और सुनीता उसके साथ आ सके।
पर चार दिन बीत गए, शव किसी को नजर नहीं आया।
आखिर 31 जुलाई को खुद सुनील ने गांव वालों में खबर फैलाई कि “सलाई नाले में लाश पड़ी है।”
और फिर मौके पर पहुंचकर उसने सबसे पहले शिनाख्त भी कर दी—
“यह रमेश ही है।”
यहीं से उसका खेल बिगड़ गया।
पुलिस की तफ्तीश
जावर थाना प्रभारी गंगाप्रसाद वर्मा पहले से ही रमेश की गुमशुदगी को लेकर चौकन्ने थे।
जब सड़ी-गली लाश मिली तो गांववाले हिचकिचा रहे थे, लेकिन सुनील पूरे यकीन से कह रहा था—“यह रमेश ही है।”
पुलिस को शक हुआ।
उसके मोबाइल की कॉल डिटेल निकलवाई गई।
और रहस्य का दरवाजा वहीं खुल गया—
पिछले एक महीने में सुनील और सुनीता ने 400 बार फोन पर बातें की थीं।
अब सबकुछ साफ हो गया।
कबूलनामा
पुलिस ने सुनील को कड़ी पूछताछ के लिए उठाया।
थोड़ी देर तक तो वह बहाने बनाता रहा, लेकिन सख्ती बढ़ी तो रो पड़ा।
उसने पूरा राज खोल दिया—
कैसे सुनीता ने उसे बहकाया, कैसे उसने हत्या की और शव ठिकाने लगाया।
जल्द ही सुनीता को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
पांच मासूमों का भविष्य
इस पाप की कीमत सिर्फ रमेश की जान से नहीं चुकाई गई।
रमेश के दो बच्चे अब अनाथ हो गए।
सुनील के तीन बच्चे भी पिता के जेल जाने और मां के अकेले रह जाने के बाद दादा-दादी के सहारे हैं।
एक औरत की न बुझी तृष्णा और एक युवक का पागलपन—दोनों ने मिलकर पांच मासूमों का भविष्य अंधकार में धकेल दिया।
सबक
यह सिर्फ हत्या की कहानी नहीं, बल्कि पाप के नशे की वह दास्तान है जो धीरे-धीरे इंसान को अंधा बना देती है।
सुनीता और सुनील के लिए इश्क पहले मोहब्बत था, फिर जुनून बना और आखिरकार खून की प्यास बन गया।
लेकिन नतीजा?
एक जिंदगी खत्म, दो लोग जेल में और पांच मासूमों का भविष्य तबाह।
