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23 साल बाद फिर चर्चा में 2003 CGPSC भर्ती, जांच और कोर्ट केस से बढ़ी हलचल
रायपुर (छ.ग.)
147 चयनित अफसरों वाली भर्ती में स्केलिंग और मूल्यांकन पर उठे थे सवाल, हाईकोर्ट ने प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ियां मानकर दोबारा मेरिट बनाने के निर्देश दिए थे
रायपुर में छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग की साल 2003 की भर्ती एक बार फिर चर्चा में है। करीब दो दशक से ज्यादा पुराना यह मामला परीक्षा में अंकों के मूल्यांकन, स्केलिंग और चयन प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों से जुड़ा है। इस भर्ती में डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी समेत अलग-अलग पदों के लिए चयन हुआ था और 147 अभ्यर्थियों के चयन पर बाद में सवाल खड़े हुए। मामला पहले हाईकोर्ट पहुंचा, फिर सुप्रीम कोर्ट तक गया और अब जांच एजेंसी की कार्रवाई के कारण पुरानी फाइल फिर सुर्खियों में है। उपलब्ध अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक, आयोग ने खुद 2003 की परीक्षा में वैकल्पिक विषयों की स्केलिंग में गंभीर गलतियां होने की बात स्वीकार की थी।
इस विवाद की शुरुआत परीक्षा के नतीजों के बाद हुई थी। अभ्यर्थियों ने मूल्यांकन और मेरिट को लेकर सवाल उठाए और जानकारी हासिल करने के लिए RTI का सहारा लिया। इसके बाद मामला अदालत तक पहुंचा। 26 अगस्त 2016 के छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले में परीक्षा प्रक्रिया से जुड़ी कई अनियमितताओं पर विस्तार से चर्चा हुई। कोर्ट के सामने आयोग की ओर से दिए गए रिकॉर्ड में यह भी दर्ज था कि वैकल्पिक विषयों की स्केलिंग में गलतियां हुईं और इसका असर मुख्य परीक्षा के परिणाम तथा इंटरव्यू के लिए तैयार सूची पर पड़ा। अदालत ने इसी आधार पर चयन प्रक्रिया को सुधारने के लिए दोबारा स्केलिंग और संबंधित उत्तर पुस्तिकाओं की जांच जैसे निर्देश दिए थे।
सबसे ज्यादा चर्चा जिस मुद्दे की होती रही, वह अंकों में असामान्य अंतर का है। इस मामले में अलग-अलग उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन को लेकर ऐसे उदाहरण सामने आए जिन पर अभ्यर्थियों ने आपत्ति जताई थी। हालांकि एक पेज लिखने वाले अभ्यर्थी को 55 अंक और पूरी कॉपी लिखने वाले को 10 अंक मिलने वाली बात को लेकर उपलब्ध अदालत के मूल रिकॉर्ड में मुझे स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिली, इसलिए इसे आरोप या शिकायत के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। कोर्ट के रिकॉर्ड में जरूर यह दर्ज है कि एंथ्रोपोलॉजी जैसे विषय में समान कच्चे अंकों वाले अभ्यर्थियों के स्केलिंग के बाद अंकों में बहुत बड़ा अंतर आ गया था। कुछ मामलों में 200 रॉ मार्क्स के बाद स्केल किए गए अंक 170 से 239 के बीच तक पहुंचने का उल्लेख है।
स्केलिंग को लेकर विवाद का तकनीकी पहलू भी इस मामले में अहम है। आयोग ने अलग-अलग वैकल्पिक विषयों के अंकों को एक समान स्तर पर लाने के लिए स्केलिंग व्यवस्था अपनाई थी। लेकिन हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में बताया गया कि एक ही विषय को पहले या दूसरे वैकल्पिक विषय के तौर पर चुनने वाले अभ्यर्थियों के अंकों पर अलग असर पड़ रहा था। गणना में इस्तेमाल किए गए फॉर्मूले और अलग-अलग मानों को लेकर भी गंभीर सवाल दर्ज किए गए। अदालत के सामने आयोग ने माना था कि कंप्यूटर एजेंसी द्वारा की गई स्केलिंग में गंभीर गलतियां थीं और इसका असर पूरी चयन प्रक्रिया पर पड़ा।
हाईकोर्ट के फैसले में सिर्फ स्केलिंग की बात नहीं थी। रिकॉर्ड में पोस्ट आवंटन और मेरिट तैयार करने के दौरान भी गड़बड़ियों का उल्लेख है। आयोग की जांच में यह बात सामने आने का जिक्र है कि कुछ ऐसे उम्मीदवारों का चयन हुआ जिन्हें संबंधित पद के लिए नहीं चुना जाना चाहिए था, जबकि अधिक अंक पाने वाले कुछ अभ्यर्थी चयन से बाहर रह गए। अदालत के रिकॉर्ड में एक याचिकाकर्ता के मामले का भी उल्लेख है, जिसमें एंथ्रोपोलॉजी में दिए गए अंकों में अंतर सामने आया था और सही गणना होने पर उसके डीएसपी पद के लिए पात्र होने की बात आयोग ने स्वीकार की थी।
2003 की इस भर्ती में कुल 147 उम्मीदवारों को नियुक्ति के लिए अनुशंसित किए जाने का रिकॉर्ड अदालत के फैसले में मिलता है। हाईकोर्ट ने चयनित उम्मीदवारों को नोटिस जारी करने और विवादित चयन प्रक्रिया के बारे में उनका पक्ष लेने की बात भी कही थी। बाद में इस फैसले का असर उन अधिकारियों की नियुक्तियों और पदों पर पड़ने की स्थिति बनी। मामले से जुड़े चयनित अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। 2026 में भी यह विवाद कानूनी स्तर पर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और चयनित अधिकारियों के भविष्य को लेकर मामला लंबे समय से अदालतों में बना हुआ है।
इस पूरे मामले में जांच एजेंसियों की भूमिका भी अलग चरण में सामने आई। हाल के महीनों में CGPSC से जुड़े पुराने मामले को लेकर EOW की गतिविधियां फिर चर्चा में आई हैं। जून 2026 में जांच एजेंसी की ओर से मामले से जुड़े ठिकानों पर कार्रवाई किए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई थी। हालांकि जांच के मौजूदा चरण में किन लोगों के खिलाफ कौन-कौन से आरोप तय होंगे और अदालत में अभियोग पत्र किस रूप में पेश किया जाएगा, इसकी अंतिम तस्वीर संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही स्पष्ट होगी।
यह मामला इसलिए भी अहम माना जाता है क्योंकि भर्ती परीक्षा के नतीजे को लेकर उठे सवाल केवल एक-दो अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहे। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में आयोग की ओर से चयन प्रक्रिया में हुई गलतियों को स्वीकार किए जाने का उल्लेख है। अदालत ने भी स्केलिंग में खामियों और उसके असर को गंभीर माना था। वहीं दूसरी तरफ चयनित अधिकारियों की नियुक्तियां कई साल पुरानी हैं और वे लंबे समय से सरकारी सेवा में हैं। इसी वजह से किसी भी नए फैसले का असर केवल पुरानी मेरिट सूची पर नहीं, बल्कि वर्षों से सेवा कर रहे अधिकारियों की स्थिति पर भी पड़ सकता है।
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