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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला: कर्मचारियों का प्रमोशन कोई मौलिक अधिकार नहीं, CMO और RI का रास्ता साफ
बिलासपुर (छ.ग.)
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के प्रमोशन को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रमोशन किसी कर्मचारी का मौलिक अधिकार नहीं है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के प्रमोशन को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है, जो नगरीय प्रशासन विभाग के लिए दिशानिर्देश स्वरूप है। जस्टिस संजय अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने कहा कि किसी कर्मचारी के लिए पदोन्नति हासिल करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है। इस फैसले के साथ ही 2017 के भर्ती नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दी गई हैं।
राजस्व निरीक्षक को मुख्य नगर पालिका अधिकारी पद की दौड़ में शामिल करना संवैधानिक
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व निरीक्षकों को मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) क्लास-बी के पद पर पदोन्नति के लिए पात्र मानना पूरी तरह से संवैधानिक है। यह किसी भी कर्मचारी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि सिविल पदों पर कार्यरत अधिकारी और नगरपालिका सेवक के बीच समानता का हनन हो रहा है, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
पदोन्नति नीतिगत निर्णय के अंतर्गत आता है
कोर्ट ने कहा कि पदोन्नति के लिए फीडर कैडर तय करना और अलग-अलग पदों की समकक्षता निर्धारित करना पूरी तरह से कार्यपालिका और सरकार के नीतिगत निर्णय के दायरे में आता है। कर्मचारियों को केवल यह अधिकार है कि नियमों के अनुसार उन्हें पदोन्नति के लिए विचार किया जाए, प्रमोशन हासिल करना उनका निहित अधिकार नहीं है।
अनुभव में छूट देना अवैध नहीं
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को भी सही ठहराया, जिसमें राजस्व निरीक्षकों के लिए अनुभव की अनिवार्य अवधि 6 साल से घटाकर 5 साल की गई थी। यह एक वन टाइम रियायत थी, जिसे अधिकारियों की कमी और जनहित को देखते हुए लागू किया गया था। कोर्ट ने कहा कि इसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
याचिकाएं खारिज, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नई सुनवाई
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने यह साबित नहीं किया कि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या नियम असंवैधानिक हैं। इसलिए सभी याचिकाएं निराधार पाई गईं और खारिज कर दी गईं। यह मामला पहले भी हाईकोर्ट में सुना गया था और तब प्रावधानों को अवैध घोषित किया गया था। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर 2025 को आदेश दिया कि मामला नए सिरे से सुनवाई के लिए हाईकोर्ट में लौटाया जाए। अब डिवीजन बेंच का नया निर्णय आया है।
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला: कर्मचारियों का प्रमोशन कोई मौलिक अधिकार नहीं, CMO और RI का रास्ता साफ
बिलासपुर (छ.ग.)
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के प्रमोशन को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है, जो नगरीय प्रशासन विभाग के लिए दिशानिर्देश स्वरूप है। जस्टिस संजय अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने कहा कि किसी कर्मचारी के लिए पदोन्नति हासिल करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है। इस फैसले के साथ ही 2017 के भर्ती नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दी गई हैं।
राजस्व निरीक्षक को मुख्य नगर पालिका अधिकारी पद की दौड़ में शामिल करना संवैधानिक
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व निरीक्षकों को मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) क्लास-बी के पद पर पदोन्नति के लिए पात्र मानना पूरी तरह से संवैधानिक है। यह किसी भी कर्मचारी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि सिविल पदों पर कार्यरत अधिकारी और नगरपालिका सेवक के बीच समानता का हनन हो रहा है, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
पदोन्नति नीतिगत निर्णय के अंतर्गत आता है
कोर्ट ने कहा कि पदोन्नति के लिए फीडर कैडर तय करना और अलग-अलग पदों की समकक्षता निर्धारित करना पूरी तरह से कार्यपालिका और सरकार के नीतिगत निर्णय के दायरे में आता है। कर्मचारियों को केवल यह अधिकार है कि नियमों के अनुसार उन्हें पदोन्नति के लिए विचार किया जाए, प्रमोशन हासिल करना उनका निहित अधिकार नहीं है।
अनुभव में छूट देना अवैध नहीं
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को भी सही ठहराया, जिसमें राजस्व निरीक्षकों के लिए अनुभव की अनिवार्य अवधि 6 साल से घटाकर 5 साल की गई थी। यह एक वन टाइम रियायत थी, जिसे अधिकारियों की कमी और जनहित को देखते हुए लागू किया गया था। कोर्ट ने कहा कि इसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
याचिकाएं खारिज, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नई सुनवाई
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने यह साबित नहीं किया कि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या नियम असंवैधानिक हैं। इसलिए सभी याचिकाएं निराधार पाई गईं और खारिज कर दी गईं। यह मामला पहले भी हाईकोर्ट में सुना गया था और तब प्रावधानों को अवैध घोषित किया गया था। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर 2025 को आदेश दिया कि मामला नए सिरे से सुनवाई के लिए हाईकोर्ट में लौटाया जाए। अब डिवीजन बेंच का नया निर्णय आया है।
