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बिजली कटौती पर हाईकोर्ट की सख्ती, कहा- सिर्फ योजना नहीं, जनता को जमीन पर राहत दिखनी चाहिए
बिलासपुर,(छ.ग.)
बार-बार बिजली गुल होने पर शासन ने पेश किया एक्शन प्लान, हाईकोर्ट ने प्रगति रिपोर्ट मांगी; अगली सुनवाई 30 जुलाई को होगी।
बारिश और आंधी-तूफान के दौरान बिलासपुर में लगातार हो रही बिजली कटौती को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और बिजली विभाग के रवैये पर सख्त टिप्पणी की है। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए विस्तृत एक्शन प्लान तैयार किया गया है और कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि हाईकोर्ट ने इस जवाब से पूरी तरह संतुष्ट होने के बजाय स्पष्ट कहा कि केवल कागजों पर योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। जब तक उनका असर जमीन पर दिखाई नहीं देगा और आम लोगों को वास्तविक राहत नहीं मिलेगी, तब तक ऐसे दावों का कोई खास महत्व नहीं रहेगा। कोर्ट ने प्रशासन को योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान देने और प्रगति रिपोर्ट शपथ पत्र के साथ पेश करने के निर्देश दिए हैं।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से ऊर्जा सचिव और छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के प्रबंध निदेशक ने अपना जवाब अदालत में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि बिलासपुर शहर की बिजली व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए राज्य स्तर पर बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें नौ महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। इन फैसलों के तहत बिजली आपूर्ति व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, आधुनिक और भरोसेमंद बनाने की योजना तैयार की गई है।
दरअसल यह पूरा मामला बिलासपुर में कुछ दिनों पहले हुई भारी बारिश और तेज आंधी के बाद सामने आया था। शहर के कई हिस्सों में पूरी रात बिजली आपूर्ति बाधित रही। हालात ऐसे थे कि वीवीआईपी क्षेत्र माने जाने वाले कलेक्ट्रेट और सिविल लाइन जैसे इलाकों में भी लंबे समय तक बिजली नहीं रही। इससे आम लोगों के साथ-साथ प्रशासनिक कार्य भी प्रभावित हुए। स्थानीय लोगों ने लगातार बिजली गुल रहने, बार-बार फॉल्ट आने और विभाग की धीमी कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी जताई थी। इस घटना के बाद मीडिया में प्रकाशित खबरों का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने स्वतः जनहित याचिका के रूप में मामले की सुनवाई शुरू की थी।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि बिजली व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई बड़े सुधार प्रस्तावित हैं। शहर में अब पुराने और क्षतिग्रस्त सीमेंट के बिजली खंभों की जगह लोहे के पोल लगाए जाएंगे, ताकि तेज हवा या अन्य कारणों से बार-बार खंभे गिरने की समस्या कम हो सके। इसके अलावा जहां नए बिजली पोल लगाए जाएंगे, वहां भी स्टील के खंभों का ही उपयोग किया जाएगा। विभाग का मानना है कि इससे बिजली आपूर्ति अधिक सुरक्षित और स्थायी होगी।
बिजली उपभोक्ताओं की शिकायतों का तेजी से समाधान करने और बढ़ते लोड को नियंत्रित करने के लिए शहर में दो नए सप्लाई जोन बनाने की योजना भी तैयार की गई है। मंगला और कोनी क्षेत्रों को नए सप्लाई जोन के रूप में विकसित किया जाएगा। इसके अलावा मुख्यमंत्री शहरी विद्युतीकरण एवं सामान्य विकास योजना के तहत करीब 10 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इस राशि से ऐसे क्षेत्रों में खुले बिजली तार हटाकर कवर्ड केबल बिछाई जाएगी, जहां बार-बार फॉल्ट की समस्या सामने आती रही है।
सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि शहर में बिजली की बढ़ती मांग को देखते हुए नए सब-स्टेशन स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। एक मुख्य सब-स्टेशन और दो 33/11 केवी क्षमता वाले नए सब-स्टेशन बनाने के लिए जिला प्रशासन से भूमि उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया है। वहीं पेड़ों की शाखाओं से बिजली लाइनों को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए अतिरिक्त स्काईलिफ्ट वाहन तैनात किए जाएंगे। विभाग में तकनीकी कर्मचारियों की कमी को दूर करने के लिए नई भर्तियों की प्रक्रिया भी शुरू करने की जानकारी अदालत को दी गई।
मामले की सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से भी शपथ पत्र पेश किया गया। निगम आयुक्त ने बताया कि मानसून के दौरान जलभराव की समस्या से निपटने के लिए विकास भवन में बाढ़ नियंत्रण कक्ष बनाया गया है। यहां अधिकारियों की शिफ्टवार ड्यूटी लगाई गई है ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके। निगम ने यह भी बताया कि अप्रैल 2026 से ही शहर के सभी आठ जोनों में नालियों की सफाई और गाद निकालने का अभियान चलाया जा रहा है। इस कार्य की जियो-टैग्ड तस्वीरें भी अदालत में प्रस्तुत की गई हैं। जलभराव की स्थिति से निपटने के लिए 14 विशेष वाहनों का बेड़ा भी चौबीसों घंटे तैयार रखा गया है।
हालांकि इन सभी दावों के बावजूद हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर बनाई गई योजनाओं का वास्तविक लाभ आम जनता तक पहुंचना चाहिए। यदि बारिश के दौरान फिर बिजली गुल होती है या सड़कों पर जलभराव की स्थिति बनती है, तो इसका अर्थ होगा कि योजनाओं का सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हुआ। अदालत ने निर्देश दिया कि मानसून के पूरे दौर में बिजली आपूर्ति यथासंभव निर्बाध रखी जाए और किसी भी शिकायत का तत्काल समाधान किया जाए। डिवीजन बेंच ने नगर निगम आयुक्त और ऊर्जा सचिव को निर्देश दिया है कि वे शपथ पत्र के साथ विस्तृत प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करें। रिपोर्ट में यह स्पष्ट होना चाहिए कि अब तक घोषित योजनाओं पर कितना काम हुआ है और जनता को उसका क्या लाभ मिला है। अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल योजनाएं बनाकर फाइलों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उनका असर शहर की व्यवस्था में साफ दिखाई देना चाहिए।
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बिजली कटौती पर हाईकोर्ट की सख्ती, कहा- सिर्फ योजना नहीं, जनता को जमीन पर राहत दिखनी चाहिए
बिलासपुर,(छ.ग.)
बारिश और आंधी-तूफान के दौरान बिलासपुर में लगातार हो रही बिजली कटौती को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और बिजली विभाग के रवैये पर सख्त टिप्पणी की है। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए विस्तृत एक्शन प्लान तैयार किया गया है और कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि हाईकोर्ट ने इस जवाब से पूरी तरह संतुष्ट होने के बजाय स्पष्ट कहा कि केवल कागजों पर योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। जब तक उनका असर जमीन पर दिखाई नहीं देगा और आम लोगों को वास्तविक राहत नहीं मिलेगी, तब तक ऐसे दावों का कोई खास महत्व नहीं रहेगा। कोर्ट ने प्रशासन को योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान देने और प्रगति रिपोर्ट शपथ पत्र के साथ पेश करने के निर्देश दिए हैं।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से ऊर्जा सचिव और छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के प्रबंध निदेशक ने अपना जवाब अदालत में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि बिलासपुर शहर की बिजली व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए राज्य स्तर पर बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें नौ महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। इन फैसलों के तहत बिजली आपूर्ति व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, आधुनिक और भरोसेमंद बनाने की योजना तैयार की गई है।
दरअसल यह पूरा मामला बिलासपुर में कुछ दिनों पहले हुई भारी बारिश और तेज आंधी के बाद सामने आया था। शहर के कई हिस्सों में पूरी रात बिजली आपूर्ति बाधित रही। हालात ऐसे थे कि वीवीआईपी क्षेत्र माने जाने वाले कलेक्ट्रेट और सिविल लाइन जैसे इलाकों में भी लंबे समय तक बिजली नहीं रही। इससे आम लोगों के साथ-साथ प्रशासनिक कार्य भी प्रभावित हुए। स्थानीय लोगों ने लगातार बिजली गुल रहने, बार-बार फॉल्ट आने और विभाग की धीमी कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी जताई थी। इस घटना के बाद मीडिया में प्रकाशित खबरों का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने स्वतः जनहित याचिका के रूप में मामले की सुनवाई शुरू की थी।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि बिजली व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई बड़े सुधार प्रस्तावित हैं। शहर में अब पुराने और क्षतिग्रस्त सीमेंट के बिजली खंभों की जगह लोहे के पोल लगाए जाएंगे, ताकि तेज हवा या अन्य कारणों से बार-बार खंभे गिरने की समस्या कम हो सके। इसके अलावा जहां नए बिजली पोल लगाए जाएंगे, वहां भी स्टील के खंभों का ही उपयोग किया जाएगा। विभाग का मानना है कि इससे बिजली आपूर्ति अधिक सुरक्षित और स्थायी होगी।
बिजली उपभोक्ताओं की शिकायतों का तेजी से समाधान करने और बढ़ते लोड को नियंत्रित करने के लिए शहर में दो नए सप्लाई जोन बनाने की योजना भी तैयार की गई है। मंगला और कोनी क्षेत्रों को नए सप्लाई जोन के रूप में विकसित किया जाएगा। इसके अलावा मुख्यमंत्री शहरी विद्युतीकरण एवं सामान्य विकास योजना के तहत करीब 10 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इस राशि से ऐसे क्षेत्रों में खुले बिजली तार हटाकर कवर्ड केबल बिछाई जाएगी, जहां बार-बार फॉल्ट की समस्या सामने आती रही है।
सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि शहर में बिजली की बढ़ती मांग को देखते हुए नए सब-स्टेशन स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। एक मुख्य सब-स्टेशन और दो 33/11 केवी क्षमता वाले नए सब-स्टेशन बनाने के लिए जिला प्रशासन से भूमि उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया है। वहीं पेड़ों की शाखाओं से बिजली लाइनों को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए अतिरिक्त स्काईलिफ्ट वाहन तैनात किए जाएंगे। विभाग में तकनीकी कर्मचारियों की कमी को दूर करने के लिए नई भर्तियों की प्रक्रिया भी शुरू करने की जानकारी अदालत को दी गई।
मामले की सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से भी शपथ पत्र पेश किया गया। निगम आयुक्त ने बताया कि मानसून के दौरान जलभराव की समस्या से निपटने के लिए विकास भवन में बाढ़ नियंत्रण कक्ष बनाया गया है। यहां अधिकारियों की शिफ्टवार ड्यूटी लगाई गई है ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके। निगम ने यह भी बताया कि अप्रैल 2026 से ही शहर के सभी आठ जोनों में नालियों की सफाई और गाद निकालने का अभियान चलाया जा रहा है। इस कार्य की जियो-टैग्ड तस्वीरें भी अदालत में प्रस्तुत की गई हैं। जलभराव की स्थिति से निपटने के लिए 14 विशेष वाहनों का बेड़ा भी चौबीसों घंटे तैयार रखा गया है।
हालांकि इन सभी दावों के बावजूद हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर बनाई गई योजनाओं का वास्तविक लाभ आम जनता तक पहुंचना चाहिए। यदि बारिश के दौरान फिर बिजली गुल होती है या सड़कों पर जलभराव की स्थिति बनती है, तो इसका अर्थ होगा कि योजनाओं का सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हुआ। अदालत ने निर्देश दिया कि मानसून के पूरे दौर में बिजली आपूर्ति यथासंभव निर्बाध रखी जाए और किसी भी शिकायत का तत्काल समाधान किया जाए। डिवीजन बेंच ने नगर निगम आयुक्त और ऊर्जा सचिव को निर्देश दिया है कि वे शपथ पत्र के साथ विस्तृत प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करें। रिपोर्ट में यह स्पष्ट होना चाहिए कि अब तक घोषित योजनाओं पर कितना काम हुआ है और जनता को उसका क्या लाभ मिला है। अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल योजनाएं बनाकर फाइलों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उनका असर शहर की व्यवस्था में साफ दिखाई देना चाहिए।
