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35 साल तक पैदल पहुंचीं 545 गांव, समाज सेवा के लिए मिली पद्मश्री
Digital Desk
बस्तर की डॉ. बुधरी ताती ने महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए समर्पित किया जीवन, राष्ट्रपति ने किया सम्मानित
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल से निकलकर देशभर में अपनी पहचान बनाने वाली समाज सेविका डॉ. बुधरी ताती को पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया है। राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया। बस्तर के दूरस्थ और दुर्गम इलाकों में 35 वर्षों तक लगातार समाज सेवा करने वाली बुधरी ताती का यह सफर संघर्ष, समर्पण और सेवा की मिसाल माना जा रहा है। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय आदिवासी समाज के उत्थान, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित किया। यही कारण है कि आज बस्तर के सैकड़ों गांवों में लोग उन्हें अपने परिवार के सदस्य की तरह मानते हैं और प्यार से 'बुआ' तथा 'बड़ी दीदी' कहकर बुलाते हैं। राष्ट्रपति भवन में जब डॉ. बुधरी ताती ने पद्मश्री सम्मान ग्रहण किया तो उनकी सादगी और पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। आधुनिक परिधानों की जगह उन्होंने अपनी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाला पारंपरिक पहनावा चुना। यह केवल एक वेशभूषा नहीं थी, बल्कि अपनी जड़ों, पहचान और आदिवासी संस्कृति के प्रति सम्मान का संदेश भी था। समारोह के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डॉ. बुधरी ताती ने एक-दूसरे का अभिवादन किया। यह क्षण उनके लिए ही नहीं बल्कि पूरे बस्तर क्षेत्र के लिए गर्व का विषय बन गया।
डॉ. बुधरी ताती की समाज सेवा की यात्रा कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था। करीब 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने तय कर लिया था कि उनका जीवन समाज के लिए समर्पित होगा। वर्ष 1984-85 के दौरान गुरमगुंडा आश्रम के लखमू बाबा से प्रेरित होकर उन्होंने सेवा का मार्ग चुना। इसके बाद उन्होंने नागपुर स्थित अखिल भारतीय राष्ट्रीय सेवा समिति में प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद वे रायपुर होते हुए वापस बस्तर लौटीं और समाज सेवा की शुरुआत की। उस दौर में आदिवासी इलाकों में महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी आसान नहीं था। सामाजिक बंदिशें, अशिक्षा और अंधविश्वास गहराई तक फैले हुए थे। ऐसे माहौल में एक युवा महिला का गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करना किसी चुनौती से कम नहीं था। बीते 35 वर्षों में डॉ. बुधरी ताती ने 545 से अधिक गांवों तक पैदल पहुंचकर लोगों की समस्याओं को समझा और समाधान की दिशा में काम किया। कई ऐसे गांव भी थे जहां सड़क, बिजली और संचार जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं थीं। कठिन रास्तों, जंगलों और पहाड़ी इलाकों को पार करते हुए उन्होंने लोगों तक पहुंच बनाई। उन्होंने विशेष रूप से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया। सिलाई, कढ़ाई, हस्तशिल्प और छोटे स्वरोजगार से जुड़ी गतिविधियों के माध्यम से 500 से अधिक महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में योगदान दिया। उनका मानना रहा कि जब महिलाएं आत्मनिर्भर बनेंगी, तभी परिवार और समाज दोनों मजबूत होंगे।
महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। उन्होंने दूरस्थ गांवों में जाकर लोगों को स्वच्छता, पोषण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तथा बीमारियों से बचाव के बारे में जागरूक किया। कई गांवों में उन्होंने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए परिवारों को प्रेरित किया। शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए लगातार अभियान चलाए गए। इसके अलावा उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को भी अपने मिशन का हिस्सा बनाया। गांवों में पौधरोपण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को लेकर लोगों को जागरूक किया गया। समाज में व्याप्त नशाखोरी के खिलाफ भी डॉ. बुधरी ताती ने लंबे समय तक अभियान चलाया। उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को शराब और अन्य नशे के दुष्प्रभावों के बारे में समझाया। उनके प्रयासों का असर कई इलाकों में देखने को मिला, जहां लोगों ने नशे की आदत छोड़कर नया जीवन शुरू किया। समाज सुधार के इस कार्य में उन्हें कई बार विरोध का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे।
उनकी संघर्षगाथा केवल सामाजिक चुनौतियों तक सीमित नहीं रही। डॉ. बुधरी ताती ने बताया कि एक बार अबूझमाड़ क्षेत्र के एक गांव में काम के दौरान उनकी जान पर बन आई थी। ग्रामीणों के विरोध के बीच उन्हें धारदार हथियारों के साथ दौड़ाया गया। हालात बेहद गंभीर थे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उनका कहना है कि यदि वे उस समय डरकर पीछे हट जातीं तो शायद कई गांव आज भी विकास और जागरूकता से दूर होते। यही साहस और दृढ़ता उन्हें अन्य समाज सेवकों से अलग पहचान दिलाती है। समाज सेवा को उन्होंने केवल एक कार्य नहीं बल्कि जीवन का उद्देश्य माना। इसी कारण उन्होंने विवाह नहीं करने का निर्णय लिया और अपना पूरा जीवन समाज के नाम कर दिया। आज भी वे बेसहारा बुजुर्गों, गरीब परिवारों और अनाथ बच्चों के लिए काम कर रही हैं। दंतेवाड़ा के हिरानार में उन्होंने एक वृद्धाश्रम की स्थापना की है, जहां जरूरतमंद बुजुर्गों को आश्रय और सम्मान मिल रहा है। साथ ही वे आदिवासी बच्चों की शिक्षा और भविष्य निर्माण की जिम्मेदारी भी संभाल रही हैं। पद्मश्री सम्मान उनके जीवन का 23वां सम्मान है। इससे पहले उन्हें 22 पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें तीन राष्ट्रीय स्तर के सम्मान भी शामिल हैं। हालांकि उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान लोगों का विश्वास और प्यार है। बस्तर के गांवों में आज भी लोग उन्हें अपने परिवार की तरह मानते हैं। पद्मश्री सम्मान ने न केवल उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है, बल्कि यह संदेश भी दिया है कि समर्पण, सेवा और समाज के प्रति सच्ची निष्ठा किसी भी व्यक्ति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है।
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35 साल तक पैदल पहुंचीं 545 गांव, समाज सेवा के लिए मिली पद्मश्री
Digital Desk
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल से निकलकर देशभर में अपनी पहचान बनाने वाली समाज सेविका डॉ. बुधरी ताती को पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया है। राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया। बस्तर के दूरस्थ और दुर्गम इलाकों में 35 वर्षों तक लगातार समाज सेवा करने वाली बुधरी ताती का यह सफर संघर्ष, समर्पण और सेवा की मिसाल माना जा रहा है। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय आदिवासी समाज के उत्थान, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित किया। यही कारण है कि आज बस्तर के सैकड़ों गांवों में लोग उन्हें अपने परिवार के सदस्य की तरह मानते हैं और प्यार से 'बुआ' तथा 'बड़ी दीदी' कहकर बुलाते हैं। राष्ट्रपति भवन में जब डॉ. बुधरी ताती ने पद्मश्री सम्मान ग्रहण किया तो उनकी सादगी और पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। आधुनिक परिधानों की जगह उन्होंने अपनी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाला पारंपरिक पहनावा चुना। यह केवल एक वेशभूषा नहीं थी, बल्कि अपनी जड़ों, पहचान और आदिवासी संस्कृति के प्रति सम्मान का संदेश भी था। समारोह के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डॉ. बुधरी ताती ने एक-दूसरे का अभिवादन किया। यह क्षण उनके लिए ही नहीं बल्कि पूरे बस्तर क्षेत्र के लिए गर्व का विषय बन गया।
डॉ. बुधरी ताती की समाज सेवा की यात्रा कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था। करीब 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने तय कर लिया था कि उनका जीवन समाज के लिए समर्पित होगा। वर्ष 1984-85 के दौरान गुरमगुंडा आश्रम के लखमू बाबा से प्रेरित होकर उन्होंने सेवा का मार्ग चुना। इसके बाद उन्होंने नागपुर स्थित अखिल भारतीय राष्ट्रीय सेवा समिति में प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद वे रायपुर होते हुए वापस बस्तर लौटीं और समाज सेवा की शुरुआत की। उस दौर में आदिवासी इलाकों में महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी आसान नहीं था। सामाजिक बंदिशें, अशिक्षा और अंधविश्वास गहराई तक फैले हुए थे। ऐसे माहौल में एक युवा महिला का गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करना किसी चुनौती से कम नहीं था। बीते 35 वर्षों में डॉ. बुधरी ताती ने 545 से अधिक गांवों तक पैदल पहुंचकर लोगों की समस्याओं को समझा और समाधान की दिशा में काम किया। कई ऐसे गांव भी थे जहां सड़क, बिजली और संचार जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं थीं। कठिन रास्तों, जंगलों और पहाड़ी इलाकों को पार करते हुए उन्होंने लोगों तक पहुंच बनाई। उन्होंने विशेष रूप से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया। सिलाई, कढ़ाई, हस्तशिल्प और छोटे स्वरोजगार से जुड़ी गतिविधियों के माध्यम से 500 से अधिक महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में योगदान दिया। उनका मानना रहा कि जब महिलाएं आत्मनिर्भर बनेंगी, तभी परिवार और समाज दोनों मजबूत होंगे।
महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। उन्होंने दूरस्थ गांवों में जाकर लोगों को स्वच्छता, पोषण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तथा बीमारियों से बचाव के बारे में जागरूक किया। कई गांवों में उन्होंने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए परिवारों को प्रेरित किया। शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए लगातार अभियान चलाए गए। इसके अलावा उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को भी अपने मिशन का हिस्सा बनाया। गांवों में पौधरोपण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को लेकर लोगों को जागरूक किया गया। समाज में व्याप्त नशाखोरी के खिलाफ भी डॉ. बुधरी ताती ने लंबे समय तक अभियान चलाया। उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को शराब और अन्य नशे के दुष्प्रभावों के बारे में समझाया। उनके प्रयासों का असर कई इलाकों में देखने को मिला, जहां लोगों ने नशे की आदत छोड़कर नया जीवन शुरू किया। समाज सुधार के इस कार्य में उन्हें कई बार विरोध का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे।
उनकी संघर्षगाथा केवल सामाजिक चुनौतियों तक सीमित नहीं रही। डॉ. बुधरी ताती ने बताया कि एक बार अबूझमाड़ क्षेत्र के एक गांव में काम के दौरान उनकी जान पर बन आई थी। ग्रामीणों के विरोध के बीच उन्हें धारदार हथियारों के साथ दौड़ाया गया। हालात बेहद गंभीर थे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उनका कहना है कि यदि वे उस समय डरकर पीछे हट जातीं तो शायद कई गांव आज भी विकास और जागरूकता से दूर होते। यही साहस और दृढ़ता उन्हें अन्य समाज सेवकों से अलग पहचान दिलाती है। समाज सेवा को उन्होंने केवल एक कार्य नहीं बल्कि जीवन का उद्देश्य माना। इसी कारण उन्होंने विवाह नहीं करने का निर्णय लिया और अपना पूरा जीवन समाज के नाम कर दिया। आज भी वे बेसहारा बुजुर्गों, गरीब परिवारों और अनाथ बच्चों के लिए काम कर रही हैं। दंतेवाड़ा के हिरानार में उन्होंने एक वृद्धाश्रम की स्थापना की है, जहां जरूरतमंद बुजुर्गों को आश्रय और सम्मान मिल रहा है। साथ ही वे आदिवासी बच्चों की शिक्षा और भविष्य निर्माण की जिम्मेदारी भी संभाल रही हैं। पद्मश्री सम्मान उनके जीवन का 23वां सम्मान है। इससे पहले उन्हें 22 पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें तीन राष्ट्रीय स्तर के सम्मान भी शामिल हैं। हालांकि उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान लोगों का विश्वास और प्यार है। बस्तर के गांवों में आज भी लोग उन्हें अपने परिवार की तरह मानते हैं। पद्मश्री सम्मान ने न केवल उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है, बल्कि यह संदेश भी दिया है कि समर्पण, सेवा और समाज के प्रति सच्ची निष्ठा किसी भी व्यक्ति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है।
