भोपाल मेट्रो के सिग्नलिंग सिस्टम की बड़ी परीक्षा, पहली बार आमने-सामने आईं दो ट्रेनें

भोपाल,(म.प्र.)

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CMRS टीम ने ट्रैक पर उतरकर किया निरीक्षण, नए सिस्टम के बाद बढ़ेगी रफ्तार और कम होगा इंतजार

राजधानी भोपाल में मेट्रो परियोजना के लिए बुधवार का दिन काफी अहम रहा। मेट्रो के सिग्नलिंग सिस्टम की सुरक्षा और कार्यक्षमता को परखने के लिए कमिश्नर ऑफ मेट्रो रेल सेफ्टी (CMRS) की टीम ने विस्तृत निरीक्षण किया। इस दौरान पहली बार ऐसा मौका आया जब दो मेट्रो ट्रेनें एक ही ट्रैक पर आमने-सामने लाई गईं। रानी कमलापति स्टेशन और एमपी नगर स्टेशन के बीच करीब आधे घंटे तक विभिन्न तकनीकी परीक्षण किए गए। यह पूरा अभ्यास सिग्नलिंग सिस्टम की क्षमता, सुरक्षा मानकों और इमरजेंसी स्थिति में उसकी प्रतिक्रिया को जांचने के लिए किया गया। निरीक्षण के दौरान दो अलग-अलग टीमें अलग-अलग मेट्रो ट्रेनों में सवार होकर ट्रैक पर उतरीं। अधिकारियों के अनुसार यह परीक्षण पूरी तरह योजनाबद्ध था और इसका उद्देश्य यह देखना था कि यदि किसी कारणवश दो ट्रेनें एक-दूसरे के सामने आ जाएं तो सिस्टम किस प्रकार प्रतिक्रिया देगा। इस दौरान ट्रेनों की गति, ब्रेकिंग सिस्टम, सुरक्षित दूरी, संचार व्यवस्था और नियंत्रण तंत्र जैसे कई महत्वपूर्ण बिंदुओं की जांच की गई। तकनीकी विशेषज्ञों ने अलग-अलग परिस्थितियां बनाकर यह भी देखा कि अचानक ब्रेक लगाने या गति बदलने की स्थिति में सिस्टम कितना प्रभावी रहता है।

मेट्रो प्रबंधन का कहना है कि यह निरीक्षण भोपाल मेट्रो के लिए एक महत्वपूर्ण चरण है। यदि CMRS की टीम अपनी अंतिम रिपोर्ट में सिग्नलिंग सिस्टम को सुरक्षित और मानकों के अनुरूप पाती है तो इसके संचालन को मंजूरी मिल जाएगी। इसके बाद मेट्रो सेवाओं के लिए नया टाइम टेबल जारी किया जाएगा और यात्रियों को अधिक सुविधाजनक सेवाएं मिल सकेंगी। अधिकारियों का कहना है कि जुलाई से सिग्नलिंग सिस्टम पूरी तरह सक्रिय होने की संभावना है, जिसके बाद ट्रेनों की संख्या और फ्रीक्वेंसी दोनों में बढ़ोतरी होगी। भोपाल में सुभाष नगर से एम्स तक करीब सात किलोमीटर लंबे प्रायोरिटी कॉरिडोर पर मेट्रो का संचालन किया जा रहा है। हालांकि वर्तमान व्यवस्था में ट्रेनों की रफ्तार और फ्रीक्वेंसी सीमित है। यात्रियों को एक ट्रेन के बाद दूसरी ट्रेन के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। वर्तमान में ट्रेनों के बीच लगभग 75 मिनट का अंतर रखा गया है, जिससे कई यात्रियों को असुविधा का सामना करना पड़ता है। यही वजह है कि मेट्रो की उपयोगिता को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं।

भोपाल और इंदौर मेट्रो परियोजनाओं में अभी तक पूर्ण सिग्नलिंग सिस्टम लागू नहीं हुआ था। इस कारण मेट्रो संचालन केवल एक ही ट्रैक पर किया जा रहा है। ट्रेन जिस ट्रैक से अपने गंतव्य तक जाती है, उसी ट्रैक से वापस भी लौटती है। यानी अप और डाउन दोनों दिशाओं का संचालन एक ही लाइन पर किया जा रहा है। तकनीकी दृष्टि से यह व्यवस्था सुरक्षित तो है, लेकिन इससे संचालन क्षमता काफी सीमित हो जाती है। नए सिग्नलिंग सिस्टम के लागू होने के बाद दोनों ट्रैक का उपयोग शुरू हो सकेगा। मेट्रो परियोजना से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक लगभग 30 किलोमीटर लंबे नेटवर्क के लिए करीब 800 करोड़ रुपए की लागत से सिग्नलिंग और दूरसंचार प्रणाली विकसित की जा रही है। सुभाष नगर से एम्स के बीच इसका पहला चरण पूरा हो चुका है। यही कारण है कि अब इसकी सुरक्षा जांच और परीक्षण अंतिम दौर में पहुंच गए हैं। परीक्षण सफल रहने के बाद यात्रियों को इसका सीधा लाभ मिलेगा।

सिग्नलिंग सिस्टम किसी भी मेट्रो नेटवर्क की रीढ़ होता है। यही तकनीक तय करती है कि दो ट्रेनों के बीच कितनी दूरी रहेगी, उनकी अधिकतम और न्यूनतम गति क्या होगी तथा किसी आपात स्थिति में ट्रेनों को कैसे नियंत्रित किया जाएगा। आधुनिक सिग्नलिंग सिस्टम के बिना किसी भी मेट्रो नेटवर्क की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि दुनिया भर की आधुनिक मेट्रो सेवाओं में अत्याधुनिक सिग्नलिंग तकनीक को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। भोपाल मेट्रो में जिस तकनीक को लागू किया जा रहा है, वह काफी हद तक दिल्ली मेट्रो में उपयोग होने वाली आधुनिक प्रणाली के समान है। इस तकनीक की मदद से ट्रेनों के बीच का अंतर कम किया जा सकेगा और कम समय में अधिक ट्रेनें चलाई जा सकेंगी। इससे यात्रियों को लंबे इंतजार से राहत मिलेगी और मेट्रो दैनिक परिवहन का अधिक प्रभावी साधन बन सकेगी। नए सिस्टम के लागू होने के बाद सबसे बड़ा बदलाव ट्रेनों की फ्रीक्वेंसी में देखने को मिलेगा। अभी जहां यात्रियों को एक ट्रेन के लिए काफी समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है, वहीं भविष्य में यह अंतर काफी कम हो जाएगा। इसके अलावा सुबह और शाम के व्यस्त समय में अतिरिक्त सेवाएं भी शुरू की जा सकेंगी। मेट्रो दोनों दिशाओं में नियमित रूप से संचालित होगी, जिससे यात्रा अधिक तेज, सुरक्षित और सुविधाजनक बनेगी। 

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25 Jun 2026 By Vaishnavi.J

भोपाल मेट्रो के सिग्नलिंग सिस्टम की बड़ी परीक्षा, पहली बार आमने-सामने आईं दो ट्रेनें

भोपाल,(म.प्र.)

राजधानी भोपाल में मेट्रो परियोजना के लिए बुधवार का दिन काफी अहम रहा। मेट्रो के सिग्नलिंग सिस्टम की सुरक्षा और कार्यक्षमता को परखने के लिए कमिश्नर ऑफ मेट्रो रेल सेफ्टी (CMRS) की टीम ने विस्तृत निरीक्षण किया। इस दौरान पहली बार ऐसा मौका आया जब दो मेट्रो ट्रेनें एक ही ट्रैक पर आमने-सामने लाई गईं। रानी कमलापति स्टेशन और एमपी नगर स्टेशन के बीच करीब आधे घंटे तक विभिन्न तकनीकी परीक्षण किए गए। यह पूरा अभ्यास सिग्नलिंग सिस्टम की क्षमता, सुरक्षा मानकों और इमरजेंसी स्थिति में उसकी प्रतिक्रिया को जांचने के लिए किया गया। निरीक्षण के दौरान दो अलग-अलग टीमें अलग-अलग मेट्रो ट्रेनों में सवार होकर ट्रैक पर उतरीं। अधिकारियों के अनुसार यह परीक्षण पूरी तरह योजनाबद्ध था और इसका उद्देश्य यह देखना था कि यदि किसी कारणवश दो ट्रेनें एक-दूसरे के सामने आ जाएं तो सिस्टम किस प्रकार प्रतिक्रिया देगा। इस दौरान ट्रेनों की गति, ब्रेकिंग सिस्टम, सुरक्षित दूरी, संचार व्यवस्था और नियंत्रण तंत्र जैसे कई महत्वपूर्ण बिंदुओं की जांच की गई। तकनीकी विशेषज्ञों ने अलग-अलग परिस्थितियां बनाकर यह भी देखा कि अचानक ब्रेक लगाने या गति बदलने की स्थिति में सिस्टम कितना प्रभावी रहता है।

मेट्रो प्रबंधन का कहना है कि यह निरीक्षण भोपाल मेट्रो के लिए एक महत्वपूर्ण चरण है। यदि CMRS की टीम अपनी अंतिम रिपोर्ट में सिग्नलिंग सिस्टम को सुरक्षित और मानकों के अनुरूप पाती है तो इसके संचालन को मंजूरी मिल जाएगी। इसके बाद मेट्रो सेवाओं के लिए नया टाइम टेबल जारी किया जाएगा और यात्रियों को अधिक सुविधाजनक सेवाएं मिल सकेंगी। अधिकारियों का कहना है कि जुलाई से सिग्नलिंग सिस्टम पूरी तरह सक्रिय होने की संभावना है, जिसके बाद ट्रेनों की संख्या और फ्रीक्वेंसी दोनों में बढ़ोतरी होगी। भोपाल में सुभाष नगर से एम्स तक करीब सात किलोमीटर लंबे प्रायोरिटी कॉरिडोर पर मेट्रो का संचालन किया जा रहा है। हालांकि वर्तमान व्यवस्था में ट्रेनों की रफ्तार और फ्रीक्वेंसी सीमित है। यात्रियों को एक ट्रेन के बाद दूसरी ट्रेन के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। वर्तमान में ट्रेनों के बीच लगभग 75 मिनट का अंतर रखा गया है, जिससे कई यात्रियों को असुविधा का सामना करना पड़ता है। यही वजह है कि मेट्रो की उपयोगिता को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं।

भोपाल और इंदौर मेट्रो परियोजनाओं में अभी तक पूर्ण सिग्नलिंग सिस्टम लागू नहीं हुआ था। इस कारण मेट्रो संचालन केवल एक ही ट्रैक पर किया जा रहा है। ट्रेन जिस ट्रैक से अपने गंतव्य तक जाती है, उसी ट्रैक से वापस भी लौटती है। यानी अप और डाउन दोनों दिशाओं का संचालन एक ही लाइन पर किया जा रहा है। तकनीकी दृष्टि से यह व्यवस्था सुरक्षित तो है, लेकिन इससे संचालन क्षमता काफी सीमित हो जाती है। नए सिग्नलिंग सिस्टम के लागू होने के बाद दोनों ट्रैक का उपयोग शुरू हो सकेगा। मेट्रो परियोजना से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक लगभग 30 किलोमीटर लंबे नेटवर्क के लिए करीब 800 करोड़ रुपए की लागत से सिग्नलिंग और दूरसंचार प्रणाली विकसित की जा रही है। सुभाष नगर से एम्स के बीच इसका पहला चरण पूरा हो चुका है। यही कारण है कि अब इसकी सुरक्षा जांच और परीक्षण अंतिम दौर में पहुंच गए हैं। परीक्षण सफल रहने के बाद यात्रियों को इसका सीधा लाभ मिलेगा।

सिग्नलिंग सिस्टम किसी भी मेट्रो नेटवर्क की रीढ़ होता है। यही तकनीक तय करती है कि दो ट्रेनों के बीच कितनी दूरी रहेगी, उनकी अधिकतम और न्यूनतम गति क्या होगी तथा किसी आपात स्थिति में ट्रेनों को कैसे नियंत्रित किया जाएगा। आधुनिक सिग्नलिंग सिस्टम के बिना किसी भी मेट्रो नेटवर्क की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि दुनिया भर की आधुनिक मेट्रो सेवाओं में अत्याधुनिक सिग्नलिंग तकनीक को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। भोपाल मेट्रो में जिस तकनीक को लागू किया जा रहा है, वह काफी हद तक दिल्ली मेट्रो में उपयोग होने वाली आधुनिक प्रणाली के समान है। इस तकनीक की मदद से ट्रेनों के बीच का अंतर कम किया जा सकेगा और कम समय में अधिक ट्रेनें चलाई जा सकेंगी। इससे यात्रियों को लंबे इंतजार से राहत मिलेगी और मेट्रो दैनिक परिवहन का अधिक प्रभावी साधन बन सकेगी। नए सिस्टम के लागू होने के बाद सबसे बड़ा बदलाव ट्रेनों की फ्रीक्वेंसी में देखने को मिलेगा। अभी जहां यात्रियों को एक ट्रेन के लिए काफी समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है, वहीं भविष्य में यह अंतर काफी कम हो जाएगा। इसके अलावा सुबह और शाम के व्यस्त समय में अतिरिक्त सेवाएं भी शुरू की जा सकेंगी। मेट्रो दोनों दिशाओं में नियमित रूप से संचालित होगी, जिससे यात्रा अधिक तेज, सुरक्षित और सुविधाजनक बनेगी। 

https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/a-big-test-for-the-signaling-system-of-bhopal-metro/article-56909

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