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भोपाल के अवैध निर्माण और कमर्शियल उपयोग पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, व्यापारियों और रहवासियों की निगाहें फैसले पर
भोपाल,(म.प्र.)
रेसीडेंशियल इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर लंबे समय से जारी विवाद पर आज अहम सुनवाई, नगर निगम की कार्रवाई, व्यापारियों की राहत और रहवासियों की आपत्तियों पर कोर्ट करेगा विचार
भोपाल में आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों और अवैध निर्माण को लेकर चल रहा विवाद अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच गया है। बुधवार को इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई होगी, जिसमें रेसीडेंशियल भूखंडों के कमर्शियल उपयोग, नगर निगम की कार्रवाई, रहवासियों की आपत्तियों और व्यापारियों की मांगों पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। इस सुनवाई को लेकर राजधानी के हजारों व्यापारी, रहवासी और प्रशासनिक अधिकारी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इसका असर आने वाले समय में शहर की शहरी व्यवस्था और विकास नीति पर पड़ सकता है।
इससे पहले मंगलवार को भी इस प्रकरण पर सुनवाई प्रस्तावित थी, लेकिन भोपाल से संबंधित याचिका पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका। याचिकाकर्ता विवेक त्रिपाठी ने बताया कि मंगलवार की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देश के विभिन्न राज्यों की राजधानियों में अवैध निर्माण और उनके विरुद्ध कार्रवाई की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कई राज्यों के नगर निगम अधिकारियों को तलब कर जवाब मांगा और कार्रवाई में लापरवाही बरतने पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की।
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए कि शहरी क्षेत्रों में अवैध निर्माण और नियमों के विपरीत भूमि उपयोग को लेकर प्रशासनिक उदासीनता स्वीकार नहीं की जाएगी। कोर्ट ने राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड और मिजोरम जैसे राज्यों को भी चेतावनी देते हुए प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। बुधवार को भोपाल से जुड़ी याचिका पर विशेष रूप से सुनवाई होने की संभावना है।
भोपाल में यह विवाद उस समय और अधिक चर्चा में आया, जब सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद नगर निगम ने आवासीय क्षेत्रों में संचालित कई व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। निगम ने कई दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को सील किया, जबकि कई व्यापारियों ने कार्रवाई की आशंका के चलते स्वयं अपने प्रतिष्ठान बंद कर दिए थे। इससे शहर के अनेक बाजारों और कॉलोनियों में असमंजस की स्थिति बन गई थी।
हालांकि बाद में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद व्यापारियों को अस्थायी राहत दी गई। बैठक में मंत्रियों, विधायकों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने पूरे मामले की समीक्षा की। बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि पूरे विवाद का अध्ययन करने के लिए राज्य स्तर पर एक उच्चस्तरीय समिति गठित की जाए। यह समिति सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का परीक्षण कर अपनी रिपोर्ट शासन को सौंपेगी। तब तक व्यापारियों को घबराने की आवश्यकता नहीं है।
मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद अधिकांश सील किए गए प्रतिष्ठानों के संचालन को लेकर स्थिति सामान्य होने लगी और कई दुकानों ने दोबारा कामकाज शुरू कर दिया। हालांकि इस फैसले का विरोध करने वाले रहवासियों का कहना है कि इससे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की भावना प्रभावित हुई है।
याचिकाकर्ता विवेक त्रिपाठी का कहना है कि नगर निगम ने जिन प्रतिष्ठानों के खिलाफ नोटिस जारी किए थे, उनके विरुद्ध अपेक्षित कार्रवाई पूरी नहीं की गई। उनका आरोप है कि प्रशासन ने दबाव में आकर कार्रवाई को धीमा कर दिया और कई प्रतिष्ठान फिर से संचालित होने लगे। उनका मानना है कि यदि नियमों का समान रूप से पालन नहीं होगा तो शहर में अव्यवस्थित विकास और बढ़ेगा।
इस मुद्दे को लेकर राजधानी के कई आवासीय क्षेत्रों के लोग भी लगातार विरोध दर्ज करा रहे हैं। अरेरा कॉलोनी, रोहित नगर, बावड़ियाकलां सहित कई क्षेत्रों के रहवासियों ने संयुक्त रहवासी संघर्ष समिति के बैनर तले पैदल मार्च निकालकर आवासीय कॉलोनियों में बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों का विरोध किया था। उनका कहना है कि कॉलोनियों में व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की संख्या बढ़ने से ट्रैफिक, पार्किंग, शोर-शराबा और सुरक्षा संबंधी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं।
दूसरी ओर, भोपाल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज व्यापारियों के पक्ष में खुलकर सामने आया है। संगठन का कहना है कि वर्तमान स्थिति के लिए व्यापारी पूरी तरह जिम्मेदार नहीं हैं। चैंबर के पदाधिकारियों का कहना है कि भोपाल का नया मास्टर प्लान वर्षों से लंबित है। वर्ष 2005 के बाद शहर के विकास के अनुरूप नई योजना लागू नहीं हो सकी, जिसके कारण व्यापारियों को पर्याप्त व्यावसायिक भूखंड उपलब्ध नहीं हुए। चैंबर ने सरकार से मिक्स लैंड यूज व्यवस्था लागू करने की मांग की है। उनका तर्क है कि बदलते शहरी स्वरूप को देखते हुए कई आवासीय क्षेत्रों में सीमित व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति दी जानी चाहिए, ताकि व्यापारियों और आम नागरिकों दोनों की जरूरतों का संतुलन बनाया जा सके।
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भोपाल के अवैध निर्माण और कमर्शियल उपयोग पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, व्यापारियों और रहवासियों की निगाहें फैसले पर
भोपाल,(म.प्र.)
भोपाल में आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों और अवैध निर्माण को लेकर चल रहा विवाद अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच गया है। बुधवार को इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई होगी, जिसमें रेसीडेंशियल भूखंडों के कमर्शियल उपयोग, नगर निगम की कार्रवाई, रहवासियों की आपत्तियों और व्यापारियों की मांगों पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। इस सुनवाई को लेकर राजधानी के हजारों व्यापारी, रहवासी और प्रशासनिक अधिकारी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इसका असर आने वाले समय में शहर की शहरी व्यवस्था और विकास नीति पर पड़ सकता है।
इससे पहले मंगलवार को भी इस प्रकरण पर सुनवाई प्रस्तावित थी, लेकिन भोपाल से संबंधित याचिका पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका। याचिकाकर्ता विवेक त्रिपाठी ने बताया कि मंगलवार की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देश के विभिन्न राज्यों की राजधानियों में अवैध निर्माण और उनके विरुद्ध कार्रवाई की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कई राज्यों के नगर निगम अधिकारियों को तलब कर जवाब मांगा और कार्रवाई में लापरवाही बरतने पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की।
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए कि शहरी क्षेत्रों में अवैध निर्माण और नियमों के विपरीत भूमि उपयोग को लेकर प्रशासनिक उदासीनता स्वीकार नहीं की जाएगी। कोर्ट ने राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड और मिजोरम जैसे राज्यों को भी चेतावनी देते हुए प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। बुधवार को भोपाल से जुड़ी याचिका पर विशेष रूप से सुनवाई होने की संभावना है।
भोपाल में यह विवाद उस समय और अधिक चर्चा में आया, जब सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद नगर निगम ने आवासीय क्षेत्रों में संचालित कई व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। निगम ने कई दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को सील किया, जबकि कई व्यापारियों ने कार्रवाई की आशंका के चलते स्वयं अपने प्रतिष्ठान बंद कर दिए थे। इससे शहर के अनेक बाजारों और कॉलोनियों में असमंजस की स्थिति बन गई थी।
हालांकि बाद में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद व्यापारियों को अस्थायी राहत दी गई। बैठक में मंत्रियों, विधायकों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने पूरे मामले की समीक्षा की। बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि पूरे विवाद का अध्ययन करने के लिए राज्य स्तर पर एक उच्चस्तरीय समिति गठित की जाए। यह समिति सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का परीक्षण कर अपनी रिपोर्ट शासन को सौंपेगी। तब तक व्यापारियों को घबराने की आवश्यकता नहीं है।
मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद अधिकांश सील किए गए प्रतिष्ठानों के संचालन को लेकर स्थिति सामान्य होने लगी और कई दुकानों ने दोबारा कामकाज शुरू कर दिया। हालांकि इस फैसले का विरोध करने वाले रहवासियों का कहना है कि इससे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की भावना प्रभावित हुई है।
याचिकाकर्ता विवेक त्रिपाठी का कहना है कि नगर निगम ने जिन प्रतिष्ठानों के खिलाफ नोटिस जारी किए थे, उनके विरुद्ध अपेक्षित कार्रवाई पूरी नहीं की गई। उनका आरोप है कि प्रशासन ने दबाव में आकर कार्रवाई को धीमा कर दिया और कई प्रतिष्ठान फिर से संचालित होने लगे। उनका मानना है कि यदि नियमों का समान रूप से पालन नहीं होगा तो शहर में अव्यवस्थित विकास और बढ़ेगा।
इस मुद्दे को लेकर राजधानी के कई आवासीय क्षेत्रों के लोग भी लगातार विरोध दर्ज करा रहे हैं। अरेरा कॉलोनी, रोहित नगर, बावड़ियाकलां सहित कई क्षेत्रों के रहवासियों ने संयुक्त रहवासी संघर्ष समिति के बैनर तले पैदल मार्च निकालकर आवासीय कॉलोनियों में बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों का विरोध किया था। उनका कहना है कि कॉलोनियों में व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की संख्या बढ़ने से ट्रैफिक, पार्किंग, शोर-शराबा और सुरक्षा संबंधी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं।
दूसरी ओर, भोपाल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज व्यापारियों के पक्ष में खुलकर सामने आया है। संगठन का कहना है कि वर्तमान स्थिति के लिए व्यापारी पूरी तरह जिम्मेदार नहीं हैं। चैंबर के पदाधिकारियों का कहना है कि भोपाल का नया मास्टर प्लान वर्षों से लंबित है। वर्ष 2005 के बाद शहर के विकास के अनुरूप नई योजना लागू नहीं हो सकी, जिसके कारण व्यापारियों को पर्याप्त व्यावसायिक भूखंड उपलब्ध नहीं हुए। चैंबर ने सरकार से मिक्स लैंड यूज व्यवस्था लागू करने की मांग की है। उनका तर्क है कि बदलते शहरी स्वरूप को देखते हुए कई आवासीय क्षेत्रों में सीमित व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति दी जानी चाहिए, ताकि व्यापारियों और आम नागरिकों दोनों की जरूरतों का संतुलन बनाया जा सके।
