OBC आरक्षण पर एमपी हाईकोर्ट का अहम फैसला, दूसरे राज्य का OBC सर्टिफिकेट अमान्य, याचिका खारिज की

ग्वालियर (म.प्र.)

By Rohit.P
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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दूसरे राज्य से जारी ओबीसी प्रमाणपत्र के आधार पर एमपी में आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।

मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक अहम और स्पष्ट निर्णय सुनाया है। अदालत ने कहा कि किसी दूसरे राज्य से जारी ओबीसी प्रमाणपत्र के आधार पर मध्यप्रदेश में आरक्षण का लाभ नहीं लिया जा सकता। इस फैसले ने उन मामलों पर साफ रुख दिया है, जहां अभ्यर्थी दूसरे राज्य का प्रमाणपत्र लेकर यहां लाभ लेने की कोशिश करते हैं।

ग्वालियर खंडपीठ का स्पष्ट फैसला

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने अपने हालिया फैसले में कहा है कि राज्य में आरक्षण का लाभ केवल उन्हीं लोगों को मिलेगा, जिनके पास मध्यप्रदेश का वैध ओबीसी प्रमाणपत्र हो। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी अन्य राज्य से जारी प्रमाणपत्र यहां मान्य नहीं होगा, भले ही संबंधित जाति दोनों राज्यों की सूची में शामिल हो।

जन्म से तय होती है जाति

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जाति का निर्धारण जन्म के आधार पर होता है। विवाह, निवास परिवर्तन या किसी अन्य कारण से व्यक्ति की जाति नहीं बदलती। खासतौर पर महिलाओं के मामले में कोर्ट ने कहा कि विवाह के बाद वे सामाजिक रूप से पति के परिवार का हिस्सा बन सकती हैं, लेकिन उन्हें पति की जाति के आधार पर आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता।

याचिकाकर्ता का मामला

यह मामला मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जालौन जिले की निवासी अर्चना दांगी से जुड़ा था। उन्होंने उच्च माध्यमिक शिक्षक पात्रता परीक्षा 2018 पास की थी। हालांकि, दस्तावेजों के सत्यापन के दौरान उनकी उम्मीदवारी इस आधार पर रद्द कर दी गई कि उनका ओबीसी प्रमाणपत्र उत्तर प्रदेश से जारी हुआ था।

याचिका में क्या दलील दी गई

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि दांगी जाति उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश दोनों में ओबीसी वर्ग में शामिल है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि विवाह के बाद वे मध्यप्रदेश की निवासी बन चुकी हैं, इसलिए उन्हें यहां आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य शासन की ओर से अदालत में यह कहा गया कि आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है, जो जन्म से जुड़ा होता है। इसलिए किसी अन्य राज्य का प्रमाणपत्र मध्यप्रदेश में मान्य नहीं माना जा सकता।

आरक्षण का मूल आधार क्या है

अदालत ने स्पष्ट किया कि आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर दिया जाता है। यह स्थिति जन्म से निर्धारित होती है, न कि विवाह या स्थान परिवर्तन से। इसलिए किसी महिला को विवाह के बाद पति की जाति के आधार पर आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट दिशा-निर्देश दे चुका है। शीर्ष अदालत के अनुसार, कोई भी व्यक्ति एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने पर अपनी आरक्षण स्थिति साथ नहीं ले जा सकता, भले ही उसकी जाति दोनों राज्यों में सूचीबद्ध हो।

याचिका खारिज

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया और संबंधित अधिकारियों के फैसले को सही और कानूनी रूप से उचित ठहराया।

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01 Apr 2026 By Rohit.P

OBC आरक्षण पर एमपी हाईकोर्ट का अहम फैसला, दूसरे राज्य का OBC सर्टिफिकेट अमान्य, याचिका खारिज की

ग्वालियर (म.प्र.)

मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक अहम और स्पष्ट निर्णय सुनाया है। अदालत ने कहा कि किसी दूसरे राज्य से जारी ओबीसी प्रमाणपत्र के आधार पर मध्यप्रदेश में आरक्षण का लाभ नहीं लिया जा सकता। इस फैसले ने उन मामलों पर साफ रुख दिया है, जहां अभ्यर्थी दूसरे राज्य का प्रमाणपत्र लेकर यहां लाभ लेने की कोशिश करते हैं।

ग्वालियर खंडपीठ का स्पष्ट फैसला

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने अपने हालिया फैसले में कहा है कि राज्य में आरक्षण का लाभ केवल उन्हीं लोगों को मिलेगा, जिनके पास मध्यप्रदेश का वैध ओबीसी प्रमाणपत्र हो। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी अन्य राज्य से जारी प्रमाणपत्र यहां मान्य नहीं होगा, भले ही संबंधित जाति दोनों राज्यों की सूची में शामिल हो।

जन्म से तय होती है जाति

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जाति का निर्धारण जन्म के आधार पर होता है। विवाह, निवास परिवर्तन या किसी अन्य कारण से व्यक्ति की जाति नहीं बदलती। खासतौर पर महिलाओं के मामले में कोर्ट ने कहा कि विवाह के बाद वे सामाजिक रूप से पति के परिवार का हिस्सा बन सकती हैं, लेकिन उन्हें पति की जाति के आधार पर आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता।

याचिकाकर्ता का मामला

यह मामला मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जालौन जिले की निवासी अर्चना दांगी से जुड़ा था। उन्होंने उच्च माध्यमिक शिक्षक पात्रता परीक्षा 2018 पास की थी। हालांकि, दस्तावेजों के सत्यापन के दौरान उनकी उम्मीदवारी इस आधार पर रद्द कर दी गई कि उनका ओबीसी प्रमाणपत्र उत्तर प्रदेश से जारी हुआ था।

याचिका में क्या दलील दी गई

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि दांगी जाति उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश दोनों में ओबीसी वर्ग में शामिल है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि विवाह के बाद वे मध्यप्रदेश की निवासी बन चुकी हैं, इसलिए उन्हें यहां आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य शासन की ओर से अदालत में यह कहा गया कि आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है, जो जन्म से जुड़ा होता है। इसलिए किसी अन्य राज्य का प्रमाणपत्र मध्यप्रदेश में मान्य नहीं माना जा सकता।

आरक्षण का मूल आधार क्या है

अदालत ने स्पष्ट किया कि आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर दिया जाता है। यह स्थिति जन्म से निर्धारित होती है, न कि विवाह या स्थान परिवर्तन से। इसलिए किसी महिला को विवाह के बाद पति की जाति के आधार पर आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट दिशा-निर्देश दे चुका है। शीर्ष अदालत के अनुसार, कोई भी व्यक्ति एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने पर अपनी आरक्षण स्थिति साथ नहीं ले जा सकता, भले ही उसकी जाति दोनों राज्यों में सूचीबद्ध हो।

याचिका खारिज

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया और संबंधित अधिकारियों के फैसले को सही और कानूनी रूप से उचित ठहराया।

https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/important-decision-of-mp-high-court-on-obc-reservation-obc/article-49763

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