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MP हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, गृहिणी को मजदूर मानना गलत, घरेलू काम का भी है आर्थिक मूल्य
मध्य प्रदेश
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक अहम फैसले में गृहिणी के काम को आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हुए मोटर दुर्घटना मामले में मुआवजा बढ़ा दिया।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक ऐतिहासिक निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि गृहिणी का कार्य केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण आर्थिक योगदान भी है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि घर संभालने वाली महिला को अकुशल श्रमिक की श्रेणी में रखना गलत होगा, क्योंकि उसका काम परिवार और समाज दोनों के लिए अमूल्य सेवाओं से जुड़ा होता है।
यह मामला एक मोटर दुर्घटना से जुड़ा है, जिसमें मृतका ममता के परिजनों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के निर्णय को चुनौती दी थी। अधिकरण ने 28 फरवरी 2019 को दिए अपने फैसले में मुआवजा 6.97 लाख रुपये तय किया था, जिसमें मृतका की मासिक आय 3,500 रुपये मानी गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि मृतका ब्यूटीशियन का काम करती थी, लेकिन आय के ठोस दस्तावेज उपलब्ध न होने के कारण कम मुआवजा निर्धारित हुआ।
ग्वालियर खंडपीठ की सुनवाई और तर्क
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि भले ही आय से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि मृतका एक गृहिणी थी। अदालत ने टिप्पणी की कि गृहिणी का योगदान बिना वेतन के होते हुए भी परिवार की आर्थिक और सामाजिक संरचना को मजबूत करता है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि गृहिणी प्रतिदिन बिना किसी निश्चित समय, छुट्टी या पारिश्रमिक के अनेक प्रकार के घरेलू कार्य करती है, जिनका मूल्यांकन केवल अकुशल मजदूरी के आधार पर नहीं किया जा सकता।
मुआवजे का नया आकलन
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का संदर्भ लेते हुए यह स्पष्ट किया कि भविष्य की आय की संभावना (फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स), आश्रितों की संख्या और अन्य मानकों को जोड़कर मुआवजा तय किया जाना चाहिए। इसी आधार पर अदालत ने मृतका की मासिक आय 5,975 रुपये निर्धारित की।
इन सभी तथ्यों को जोड़ते हुए कुल मुआवजा राशि 12,20,720 रुपये तय की गई, जिससे याचिकाकर्ताओं को अतिरिक्त 5,23,520 रुपये प्रदान करने का आदेश दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का प्रभाव
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों में पहले ही यह स्थापित किया जा चुका है कि गृहिणी का कार्य आर्थिक मूल्य से परे नहीं है। इसी सिद्धांत को आधार बनाते हुए यह फैसला दिया गया, जिससे भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नज़ीर स्थापित हो गई है।
न्यायिक टिप्पणी का महत्व
यह निर्णय केवल एक मुआवजा बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि यह समाज में गृहिणी के योगदान की कानूनी स्वीकृति को भी मजबूत करता है। अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि घरेलू कार्यों को कमतर नहीं आंका जा सकता।
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MP हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, गृहिणी को मजदूर मानना गलत, घरेलू काम का भी है आर्थिक मूल्य
मध्य प्रदेश
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक ऐतिहासिक निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि गृहिणी का कार्य केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण आर्थिक योगदान भी है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि घर संभालने वाली महिला को अकुशल श्रमिक की श्रेणी में रखना गलत होगा, क्योंकि उसका काम परिवार और समाज दोनों के लिए अमूल्य सेवाओं से जुड़ा होता है।
यह मामला एक मोटर दुर्घटना से जुड़ा है, जिसमें मृतका ममता के परिजनों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के निर्णय को चुनौती दी थी। अधिकरण ने 28 फरवरी 2019 को दिए अपने फैसले में मुआवजा 6.97 लाख रुपये तय किया था, जिसमें मृतका की मासिक आय 3,500 रुपये मानी गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि मृतका ब्यूटीशियन का काम करती थी, लेकिन आय के ठोस दस्तावेज उपलब्ध न होने के कारण कम मुआवजा निर्धारित हुआ।
ग्वालियर खंडपीठ की सुनवाई और तर्क
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि भले ही आय से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि मृतका एक गृहिणी थी। अदालत ने टिप्पणी की कि गृहिणी का योगदान बिना वेतन के होते हुए भी परिवार की आर्थिक और सामाजिक संरचना को मजबूत करता है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि गृहिणी प्रतिदिन बिना किसी निश्चित समय, छुट्टी या पारिश्रमिक के अनेक प्रकार के घरेलू कार्य करती है, जिनका मूल्यांकन केवल अकुशल मजदूरी के आधार पर नहीं किया जा सकता।
मुआवजे का नया आकलन
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का संदर्भ लेते हुए यह स्पष्ट किया कि भविष्य की आय की संभावना (फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स), आश्रितों की संख्या और अन्य मानकों को जोड़कर मुआवजा तय किया जाना चाहिए। इसी आधार पर अदालत ने मृतका की मासिक आय 5,975 रुपये निर्धारित की।
इन सभी तथ्यों को जोड़ते हुए कुल मुआवजा राशि 12,20,720 रुपये तय की गई, जिससे याचिकाकर्ताओं को अतिरिक्त 5,23,520 रुपये प्रदान करने का आदेश दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का प्रभाव
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों में पहले ही यह स्थापित किया जा चुका है कि गृहिणी का कार्य आर्थिक मूल्य से परे नहीं है। इसी सिद्धांत को आधार बनाते हुए यह फैसला दिया गया, जिससे भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नज़ीर स्थापित हो गई है।
न्यायिक टिप्पणी का महत्व
यह निर्णय केवल एक मुआवजा बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि यह समाज में गृहिणी के योगदान की कानूनी स्वीकृति को भी मजबूत करता है। अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि घरेलू कार्यों को कमतर नहीं आंका जा सकता।
