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मध्यप्रदेश में नवजात स्वास्थ्य सेवाएं हुईं और मजबूत: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव
भोपाल (म.प्र.)
मध्यप्रदेश में नवजात और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हुआ है। नवजात डिस्चार्ज दर 82.3% पहुंची, ICU बेड क्षमता भी बढ़ाई गई।
मध्यप्रदेश सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने में लगी हुई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मातृ और नवजात स्वास्थ्य सेवाओं पर खासा जोर दिया जा रहा है। भोपाल में शनिवार को मिली जानकारी के अनुसार, प्रदेश में नवजात शिशुओं के इलाज और देखभाल से जुड़े आंकड़ों में इस साल सुधार देखने को मिला है। सरकार का कहना है कि आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं, विशेषज्ञ डॉक्टर्स और निगरानी व्यवस्थाओं को बेहतर किया जा रहा है, जिसका असर अब ज़मीन पर भी देखा जा रहा है। गंभीर रूप से बीमार और समय से पहले जन्मे नवजातों के लिए एसएनसीयू, यानी नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाइयों में इलाज पहले से ज़्यादा बेहतर हुआ है। अधिकारियों के मुताबिक, नवजातों की डिस्चार्ज दर अब 82.3 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2025-26 में अब तक 1 लाख 34 हजार से अधिक नवजातों को एसएनसीयू में उपचार दिया गया है। वहीं, 1 अप्रैल से 15 मई 2026 के बीच 62 एसएनसीयू इकाइयों में 15 हजार से अधिक नवजात भर्ती हुए, जिनमें से 12,818 बच्चों को स्वस्थ होने पर छुट्टी दी गई। शुरुआती जानकारी से यह भी पता चला है कि प्रदेश में नवजात मृत्यु दर और रेफरल दर राष्ट्रीय औसत से कम है। राज्य सरकार ने आईसीयू बेड की संख्या भी बढ़ाई है। पहले जहां 1,654 बेड थे, अब ये बढ़कर 1,770 हो गए हैं। इससे गंभीर हालत वाले बच्चों को समय पर इलाज मिल पा रहा है। अस्पतालों में वेंटिलेटर, सी-पैप, फोटोथेरेपी और ऑक्सीजन सपोर्ट जैसी आधुनिक सुविधाओं का उपयोग बढ़ा है। डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को खास ट्रेनिंग भी दी जा रही है ताकि नवजातों को बेहतर उपचार मिल सके।
प्रदेश में न्यूबॉर्न स्टैबिलाइजेशन यूनिट यानी एनबीएसयू के जरिए भी जिला और उप जिला स्तर पर नवजातों को चिकित्सा सुविधाएं दी जा रही हैं। इस साल अब तक 2,000 से अधिक बच्चों को उपचार के बाद डिस्चार्ज किया गया है। सरकार 'जीरो सेपरेशन' मॉडल पर भी काम कर रही है, जिसमें मां और नवजात को अलग नहीं किया जाता। इसे मदर एंड न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एमएनसीयू) के रूप में विकसित किया जा रहा है। फिलहाल, प्रदेश में 23 एमएनसीयू चालू हैं। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि इससे स्तनपान और नवजात देखभाल को बढ़ावा मिल रहा है, खासकर कम वजन वाले बच्चों के लिए यह व्यवस्था बहुत सहायक साबित हो रही है।
इसी बीच, मातृ दुग्ध इकाइयों के जरिए भी कमजोर और बीमार नवजातों को पोषण उपलब्ध कराया जा रहा है। भोपाल और इंदौर में संचालित सीएलएमसी केंद्रों में इस साल 241 लीटर से अधिक मातृ दूध दान किया गया है, जिसे जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचाया गया है। इसके अलावा, ई-शिशु परियोजना के माध्यम से डिजिटल मॉनिटरिंग और विशेषज्ञ सलाह की सुविधाएं भी शुरू की गई हैं। दिसंबर 2025 से अब तक करीब 9,889 नवजात इस योजना से लाभान्वित हुए हैं। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि इससे रेफरल और मृत्यु दर में कमी देखने को मिली है। सरकार का दावा है कि भविष्य में प्रदेश के सभी क्षेत्रों में नवजात और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत किया जाएगा।
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मध्यप्रदेश में नवजात स्वास्थ्य सेवाएं हुईं और मजबूत: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव
भोपाल (म.प्र.)
मध्यप्रदेश सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने में लगी हुई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मातृ और नवजात स्वास्थ्य सेवाओं पर खासा जोर दिया जा रहा है। भोपाल में शनिवार को मिली जानकारी के अनुसार, प्रदेश में नवजात शिशुओं के इलाज और देखभाल से जुड़े आंकड़ों में इस साल सुधार देखने को मिला है। सरकार का कहना है कि आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं, विशेषज्ञ डॉक्टर्स और निगरानी व्यवस्थाओं को बेहतर किया जा रहा है, जिसका असर अब ज़मीन पर भी देखा जा रहा है। गंभीर रूप से बीमार और समय से पहले जन्मे नवजातों के लिए एसएनसीयू, यानी नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाइयों में इलाज पहले से ज़्यादा बेहतर हुआ है। अधिकारियों के मुताबिक, नवजातों की डिस्चार्ज दर अब 82.3 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2025-26 में अब तक 1 लाख 34 हजार से अधिक नवजातों को एसएनसीयू में उपचार दिया गया है। वहीं, 1 अप्रैल से 15 मई 2026 के बीच 62 एसएनसीयू इकाइयों में 15 हजार से अधिक नवजात भर्ती हुए, जिनमें से 12,818 बच्चों को स्वस्थ होने पर छुट्टी दी गई। शुरुआती जानकारी से यह भी पता चला है कि प्रदेश में नवजात मृत्यु दर और रेफरल दर राष्ट्रीय औसत से कम है। राज्य सरकार ने आईसीयू बेड की संख्या भी बढ़ाई है। पहले जहां 1,654 बेड थे, अब ये बढ़कर 1,770 हो गए हैं। इससे गंभीर हालत वाले बच्चों को समय पर इलाज मिल पा रहा है। अस्पतालों में वेंटिलेटर, सी-पैप, फोटोथेरेपी और ऑक्सीजन सपोर्ट जैसी आधुनिक सुविधाओं का उपयोग बढ़ा है। डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को खास ट्रेनिंग भी दी जा रही है ताकि नवजातों को बेहतर उपचार मिल सके।
प्रदेश में न्यूबॉर्न स्टैबिलाइजेशन यूनिट यानी एनबीएसयू के जरिए भी जिला और उप जिला स्तर पर नवजातों को चिकित्सा सुविधाएं दी जा रही हैं। इस साल अब तक 2,000 से अधिक बच्चों को उपचार के बाद डिस्चार्ज किया गया है। सरकार 'जीरो सेपरेशन' मॉडल पर भी काम कर रही है, जिसमें मां और नवजात को अलग नहीं किया जाता। इसे मदर एंड न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एमएनसीयू) के रूप में विकसित किया जा रहा है। फिलहाल, प्रदेश में 23 एमएनसीयू चालू हैं। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि इससे स्तनपान और नवजात देखभाल को बढ़ावा मिल रहा है, खासकर कम वजन वाले बच्चों के लिए यह व्यवस्था बहुत सहायक साबित हो रही है।
इसी बीच, मातृ दुग्ध इकाइयों के जरिए भी कमजोर और बीमार नवजातों को पोषण उपलब्ध कराया जा रहा है। भोपाल और इंदौर में संचालित सीएलएमसी केंद्रों में इस साल 241 लीटर से अधिक मातृ दूध दान किया गया है, जिसे जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचाया गया है। इसके अलावा, ई-शिशु परियोजना के माध्यम से डिजिटल मॉनिटरिंग और विशेषज्ञ सलाह की सुविधाएं भी शुरू की गई हैं। दिसंबर 2025 से अब तक करीब 9,889 नवजात इस योजना से लाभान्वित हुए हैं। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि इससे रेफरल और मृत्यु दर में कमी देखने को मिली है। सरकार का दावा है कि भविष्य में प्रदेश के सभी क्षेत्रों में नवजात और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत किया जाएगा।
