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भोजशाला से फिर चर्चा में आई मां वाग्देवी की प्रतिमा, मुगल आक्रमण में हुई थी खंडित, 17 साल से ब्रिटिश म्यूजियम में रखी है मूल प्रतिमा
धार (म.प्र.)
धार भोजशाला को लेकर हाईकोर्ट के फैसले के बाद लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा फिर चर्चा में आ गई है।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने धार के भोजशाला को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए इसे हिंदू मंदिर माना है। इस फैसले के दौरान कोर्ट ने पुरातात्विक साक्ष्यों, एएसआई की सर्वे रिपोर्ट और ऐतिहासिक तथ्यों का जिक्र किया। इसके बाद एक बार फिर भोजशाला और मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा की चर्चा शुरू हो गई है। कहा जाता है कि यह वही प्रतिमा है जिसे हिंदू संगठन भोजशाला की आराध्य देवी मानते हैं। मुग़ल आक्रमण के दौरान यह प्रतिमा खंडित हो गई थी और बाद में इसे अंग्रेजों ने खुदाई में निकाला। अब यह प्रतिमा पिछले 117 साल से लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम के ग्रेट रसल स्ट्रीट में एक कांच के बॉक्स में सुरक्षित रखी गई है। धार से लगभग 7350 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग वर्षों से उठती रही है।
धार के कृष पाल, जो लंदन में रहते हैं, ने ब्रिटिश म्यूजियम जाकर इस प्रतिमा को करीब से देखा। उन्होंने बताया कि बचपन से ही वे भोजशाला और मां वाग्देवी के बारे में सुनते आए थे, इसलिए उन्हें इसे देखने की इच्छा थी। हालांकि, वहां पहुंचना आसान नहीं था। म्यूजियम में भारत, चीन, अफ्रीका और अन्य देशों की ऐतिहासिक धरोहरें रखी गई हैं। मां वाग्देवी की यह प्रतिमा एक बड़े कांच के बॉक्स में सुरक्षित रखी गई है, जिसे छूने की अनुमति नहीं है। प्रतिमा करीब चार से पांच फीट ऊंची है और इसकी दो भुजाएं टूटी हुई हैं। विवरण के अनुसार इसे जैन देवी अंबिका बताया गया है, जबकि हिंदू संगठन इसे मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा मानते हैं। जानकारी के मुताबिक, यह प्रतिमा 1909 में लंदन ले जाई गई थी।
ब्रिटिश म्यूजियम में भारत से लाकर रखी गई कई मूर्तियां हैं। मां वाग्देवी की प्रतिमा के पास देवी दुर्गा, गणेशजी और भगवान महावीर समेत अन्य जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं भी रखी गई हैं। बताया जा रहा है कि इस सफेद पत्थर की प्रतिमा के नीचे 1034 ईस्वी का शिलालेख भी मौजूद है। भोजशाला से जुड़े लोग दावा करते हैं कि यह प्रतिमा राजा भोज की नगरी धार की विद्या की देवी की है।
भोजशाला को लेकर वर्षों से विवाद और संघर्ष होते आए हैं। हिंदू पक्ष इसे मंदिर मानता है, वहीं मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद मानता है। इतिहास में यहां कई बार संघर्ष और विरोध की घटनाएं देखी गई हैं। हिंदू संगठनों का कहना है कि 1952 से लगातार इस प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग की जा रही है, जिसके लिए कई सरकारों और नेताओं को ज्ञापन भी दिए गए हैं।
समिति से जुड़े लोगों का कहना है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, उमा भारती, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक से प्रतिमा लौटाने की मांग की जा चुकी है। 1961 में, इतिहासकार पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर भी लंदन गए थे और उन्होंने यह साबित किया था कि यह धार की मां वाग्देवी की प्रतिमा है। अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद भोजशाला और प्रतिमा की वापसी का मुद्दा फिर से गरमाने लगा है। धार और आसपास के क्षेत्र में इस फैसले के बाद धार्मिक और ऐतिहासिक चर्चाएं भी बढ़ गई हैं।
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भोजशाला से फिर चर्चा में आई मां वाग्देवी की प्रतिमा, मुगल आक्रमण में हुई थी खंडित, 17 साल से ब्रिटिश म्यूजियम में रखी है मूल प्रतिमा
धार (म.प्र.)
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने धार के भोजशाला को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए इसे हिंदू मंदिर माना है। इस फैसले के दौरान कोर्ट ने पुरातात्विक साक्ष्यों, एएसआई की सर्वे रिपोर्ट और ऐतिहासिक तथ्यों का जिक्र किया। इसके बाद एक बार फिर भोजशाला और मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा की चर्चा शुरू हो गई है। कहा जाता है कि यह वही प्रतिमा है जिसे हिंदू संगठन भोजशाला की आराध्य देवी मानते हैं। मुग़ल आक्रमण के दौरान यह प्रतिमा खंडित हो गई थी और बाद में इसे अंग्रेजों ने खुदाई में निकाला। अब यह प्रतिमा पिछले 117 साल से लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम के ग्रेट रसल स्ट्रीट में एक कांच के बॉक्स में सुरक्षित रखी गई है। धार से लगभग 7350 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग वर्षों से उठती रही है।
धार के कृष पाल, जो लंदन में रहते हैं, ने ब्रिटिश म्यूजियम जाकर इस प्रतिमा को करीब से देखा। उन्होंने बताया कि बचपन से ही वे भोजशाला और मां वाग्देवी के बारे में सुनते आए थे, इसलिए उन्हें इसे देखने की इच्छा थी। हालांकि, वहां पहुंचना आसान नहीं था। म्यूजियम में भारत, चीन, अफ्रीका और अन्य देशों की ऐतिहासिक धरोहरें रखी गई हैं। मां वाग्देवी की यह प्रतिमा एक बड़े कांच के बॉक्स में सुरक्षित रखी गई है, जिसे छूने की अनुमति नहीं है। प्रतिमा करीब चार से पांच फीट ऊंची है और इसकी दो भुजाएं टूटी हुई हैं। विवरण के अनुसार इसे जैन देवी अंबिका बताया गया है, जबकि हिंदू संगठन इसे मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा मानते हैं। जानकारी के मुताबिक, यह प्रतिमा 1909 में लंदन ले जाई गई थी।
ब्रिटिश म्यूजियम में भारत से लाकर रखी गई कई मूर्तियां हैं। मां वाग्देवी की प्रतिमा के पास देवी दुर्गा, गणेशजी और भगवान महावीर समेत अन्य जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं भी रखी गई हैं। बताया जा रहा है कि इस सफेद पत्थर की प्रतिमा के नीचे 1034 ईस्वी का शिलालेख भी मौजूद है। भोजशाला से जुड़े लोग दावा करते हैं कि यह प्रतिमा राजा भोज की नगरी धार की विद्या की देवी की है।
भोजशाला को लेकर वर्षों से विवाद और संघर्ष होते आए हैं। हिंदू पक्ष इसे मंदिर मानता है, वहीं मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद मानता है। इतिहास में यहां कई बार संघर्ष और विरोध की घटनाएं देखी गई हैं। हिंदू संगठनों का कहना है कि 1952 से लगातार इस प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग की जा रही है, जिसके लिए कई सरकारों और नेताओं को ज्ञापन भी दिए गए हैं।
समिति से जुड़े लोगों का कहना है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, उमा भारती, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक से प्रतिमा लौटाने की मांग की जा चुकी है। 1961 में, इतिहासकार पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर भी लंदन गए थे और उन्होंने यह साबित किया था कि यह धार की मां वाग्देवी की प्रतिमा है। अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद भोजशाला और प्रतिमा की वापसी का मुद्दा फिर से गरमाने लगा है। धार और आसपास के क्षेत्र में इस फैसले के बाद धार्मिक और ऐतिहासिक चर्चाएं भी बढ़ गई हैं।
