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12 साल पुराने पिंटू हत्याकांड में आया फैसला, दो दोषियों को उम्रकैद; तीन आरोपी सबूतों के अभाव में बरी
Digital Desk
इंदौर की अदालत ने 2013 के चर्चित देवेंद्र उर्फ पिंटू मर्डर केस में मुख्य आरोपी को हत्या और आर्म्स एक्ट में दोषी ठहराया, फोरेंसिक रिपोर्ट बनी अहम सबूत
इंदौर के बाणगंगा थाना क्षेत्र में वर्ष 2013 में हुए चर्चित देवेंद्र उर्फ पिंटू हत्याकांड में करीब 12 साल बाद अदालत ने अपना फैसला सुना दिया। लंबे समय तक चली सुनवाई, गवाहों के बयान और फोरेंसिक जांच के आधार पर अपर सत्र न्यायाधीश विनोद कुमार शर्मा की अदालत ने मुख्य आरोपी जितेंद्र उर्फ जेडी और सचिन कुशवाह उर्फ कबाड़ी को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। वहीं, मामले में आरोपी बनाए गए बबलू ठाकुर उर्फ प्रेम, चंदन उइके और गोलू उर्फ आनंद को पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण बरी कर दिया गया।
करीब एक दशक से अधिक समय तक चले इस मामले का फैसला शनिवार को सुनाया गया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष मुख्य आरोपी जितेंद्र उर्फ जेडी के खिलाफ हत्या के आरोप को संदेह से परे साबित करने में सफल रहा है। वहीं सचिन कुशवाह की भूमिका भी हत्या की साजिश और वारदात में सहयोग करने के रूप में प्रमाणित हुई। इसी आधार पर दोनों को भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
अदालत के फैसले में फोरेंसिक जांच रिपोर्ट को बेहद महत्वपूर्ण माना गया। जांच के दौरान पुलिस ने मुख्य आरोपी के कब्जे से एक अवैध पिस्टल बरामद की थी। इस हथियार को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया, जहां विशेषज्ञों ने घटनास्थल से मिली गोली और बरामद पिस्टल का मिलान किया। रिपोर्ट में यह पुष्टि हुई कि हत्या में इस्तेमाल की गई गोली उसी पिस्टल से चलाई गई थी। अदालत ने इस वैज्ञानिक साक्ष्य को बेहद मजबूत प्रमाण माना और इसे दोष सिद्ध करने का प्रमुख आधार बनाया।
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने यह भी साबित किया कि घटना के समय सचिन कुशवाह मुख्य आरोपी जितेंद्र के साथ मौजूद था। अदालत ने माना कि वह हत्या की पूरी साजिश में शामिल था और वारदात को अंजाम देने में उसकी सक्रिय भूमिका रही। इसी वजह से उसे भी हत्या और आपराधिक साजिश के आरोपों में दोषी ठहराया गया।
अदालत ने जितेंद्र उर्फ जेडी को हत्या के अपराध में आजीवन कारावास की सजा सुनाने के साथ-साथ अवैध हथियार रखने और उसका इस्तेमाल करने के मामले में आर्म्स एक्ट की धारा 25 और 27 के तहत भी अलग-अलग सजा सुनाई। वहीं सचिन कुशवाह को भी हत्या और हत्या की साजिश के अपराध में आजीवन कारावास की सजा दी गई। दोनों दोषियों पर आर्थिक दंड भी लगाया गया है। हालांकि अदालत ने जुर्माने की राशि निर्धारित करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि राशि जमा नहीं करने की स्थिति में अतिरिक्त कारावास का प्रावधान लागू होगा।
दूसरी ओर अदालत ने बबलू ठाकुर उर्फ प्रेम, चंदन उइके और गोलू उर्फ आनंद के खिलाफ पर्याप्त और ठोस साक्ष्य नहीं मिलने की बात कही। अदालत का मानना था कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। चूंकि अभियोजन पक्ष इन तीनों आरोपियों की भूमिका को स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं कर सका, इसलिए उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
फैसले के दौरान अदालत ने मृत्युदंड की मांग पर भी विचार किया। न्यायालय ने कहा कि हत्या निस्संदेह एक गंभीर अपराध है, लेकिन उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर यह मामला 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' यानी विरलतम से विरल श्रेणी में नहीं आता। इसलिए दोषियों को फांसी की सजा देने के बजाय आजीवन कारावास की सजा देना न्यायोचित और विधिसम्मत माना गया।
यह हत्याकांड वर्ष 2013 में बाणगंगा थाना क्षेत्र में हुआ था। देवेंद्र उर्फ पिंटू की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद क्षेत्र में सनसनी फैल गई थी। पुलिस ने जांच के दौरान कई संदिग्धों से पूछताछ की और साक्ष्य जुटाने के बाद पांच आरोपियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया था। जांच के दौरान हथियार की बरामदगी, गवाहों के बयान और तकनीकी साक्ष्यों को केस डायरी में शामिल किया गया।
मामले की सुनवाई के दौरान कई प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य गवाहों के बयान दर्ज किए गए। अभियोजन पक्ष ने अदालत के सामने फोरेंसिक रिपोर्ट, हथियार की बरामदगी, गवाहों के बयान और अन्य दस्तावेजी साक्ष्य पेश किए। बचाव पक्ष ने इन साक्ष्यों पर सवाल उठाते हुए आरोपियों को निर्दोष बताया, लेकिन अदालत ने उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर दोनों मुख्य आरोपियों को दोषी माना।
इस पूरे मामले में शासन की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक योगेश जायसवाल ने पैरवी की। उन्होंने अदालत के समक्ष वैज्ञानिक साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। अभियोजन पक्ष का तर्क था कि बरामद हथियार और फोरेंसिक रिपोर्ट इस मामले की सबसे मजबूत कड़ी हैं, जो सीधे मुख्य आरोपी को हत्या से जोड़ती हैं। अदालत ने भी अपने फैसले में इस तर्क को स्वीकार किया।
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12 साल पुराने पिंटू हत्याकांड में आया फैसला, दो दोषियों को उम्रकैद; तीन आरोपी सबूतों के अभाव में बरी
Digital Desk
इंदौर के बाणगंगा थाना क्षेत्र में वर्ष 2013 में हुए चर्चित देवेंद्र उर्फ पिंटू हत्याकांड में करीब 12 साल बाद अदालत ने अपना फैसला सुना दिया। लंबे समय तक चली सुनवाई, गवाहों के बयान और फोरेंसिक जांच के आधार पर अपर सत्र न्यायाधीश विनोद कुमार शर्मा की अदालत ने मुख्य आरोपी जितेंद्र उर्फ जेडी और सचिन कुशवाह उर्फ कबाड़ी को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। वहीं, मामले में आरोपी बनाए गए बबलू ठाकुर उर्फ प्रेम, चंदन उइके और गोलू उर्फ आनंद को पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण बरी कर दिया गया।
करीब एक दशक से अधिक समय तक चले इस मामले का फैसला शनिवार को सुनाया गया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष मुख्य आरोपी जितेंद्र उर्फ जेडी के खिलाफ हत्या के आरोप को संदेह से परे साबित करने में सफल रहा है। वहीं सचिन कुशवाह की भूमिका भी हत्या की साजिश और वारदात में सहयोग करने के रूप में प्रमाणित हुई। इसी आधार पर दोनों को भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
अदालत के फैसले में फोरेंसिक जांच रिपोर्ट को बेहद महत्वपूर्ण माना गया। जांच के दौरान पुलिस ने मुख्य आरोपी के कब्जे से एक अवैध पिस्टल बरामद की थी। इस हथियार को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया, जहां विशेषज्ञों ने घटनास्थल से मिली गोली और बरामद पिस्टल का मिलान किया। रिपोर्ट में यह पुष्टि हुई कि हत्या में इस्तेमाल की गई गोली उसी पिस्टल से चलाई गई थी। अदालत ने इस वैज्ञानिक साक्ष्य को बेहद मजबूत प्रमाण माना और इसे दोष सिद्ध करने का प्रमुख आधार बनाया।
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने यह भी साबित किया कि घटना के समय सचिन कुशवाह मुख्य आरोपी जितेंद्र के साथ मौजूद था। अदालत ने माना कि वह हत्या की पूरी साजिश में शामिल था और वारदात को अंजाम देने में उसकी सक्रिय भूमिका रही। इसी वजह से उसे भी हत्या और आपराधिक साजिश के आरोपों में दोषी ठहराया गया।
अदालत ने जितेंद्र उर्फ जेडी को हत्या के अपराध में आजीवन कारावास की सजा सुनाने के साथ-साथ अवैध हथियार रखने और उसका इस्तेमाल करने के मामले में आर्म्स एक्ट की धारा 25 और 27 के तहत भी अलग-अलग सजा सुनाई। वहीं सचिन कुशवाह को भी हत्या और हत्या की साजिश के अपराध में आजीवन कारावास की सजा दी गई। दोनों दोषियों पर आर्थिक दंड भी लगाया गया है। हालांकि अदालत ने जुर्माने की राशि निर्धारित करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि राशि जमा नहीं करने की स्थिति में अतिरिक्त कारावास का प्रावधान लागू होगा।
दूसरी ओर अदालत ने बबलू ठाकुर उर्फ प्रेम, चंदन उइके और गोलू उर्फ आनंद के खिलाफ पर्याप्त और ठोस साक्ष्य नहीं मिलने की बात कही। अदालत का मानना था कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। चूंकि अभियोजन पक्ष इन तीनों आरोपियों की भूमिका को स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं कर सका, इसलिए उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
फैसले के दौरान अदालत ने मृत्युदंड की मांग पर भी विचार किया। न्यायालय ने कहा कि हत्या निस्संदेह एक गंभीर अपराध है, लेकिन उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर यह मामला 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' यानी विरलतम से विरल श्रेणी में नहीं आता। इसलिए दोषियों को फांसी की सजा देने के बजाय आजीवन कारावास की सजा देना न्यायोचित और विधिसम्मत माना गया।
यह हत्याकांड वर्ष 2013 में बाणगंगा थाना क्षेत्र में हुआ था। देवेंद्र उर्फ पिंटू की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद क्षेत्र में सनसनी फैल गई थी। पुलिस ने जांच के दौरान कई संदिग्धों से पूछताछ की और साक्ष्य जुटाने के बाद पांच आरोपियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया था। जांच के दौरान हथियार की बरामदगी, गवाहों के बयान और तकनीकी साक्ष्यों को केस डायरी में शामिल किया गया।
मामले की सुनवाई के दौरान कई प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य गवाहों के बयान दर्ज किए गए। अभियोजन पक्ष ने अदालत के सामने फोरेंसिक रिपोर्ट, हथियार की बरामदगी, गवाहों के बयान और अन्य दस्तावेजी साक्ष्य पेश किए। बचाव पक्ष ने इन साक्ष्यों पर सवाल उठाते हुए आरोपियों को निर्दोष बताया, लेकिन अदालत ने उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर दोनों मुख्य आरोपियों को दोषी माना।
इस पूरे मामले में शासन की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक योगेश जायसवाल ने पैरवी की। उन्होंने अदालत के समक्ष वैज्ञानिक साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। अभियोजन पक्ष का तर्क था कि बरामद हथियार और फोरेंसिक रिपोर्ट इस मामले की सबसे मजबूत कड़ी हैं, जो सीधे मुख्य आरोपी को हत्या से जोड़ती हैं। अदालत ने भी अपने फैसले में इस तर्क को स्वीकार किया।
