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प्रियंका गांधी के बयान पर पिटीशन, कामकोटि के समर्थन में 14 हजार सिग्नेचर
भारत
IIT मद्रास निदेशक को ‘गोमूत्र एक्सपर्ट’ कहने पर विवाद, 38 देशों के वैज्ञानिकों समेत लोगों ने लोकसभा अध्यक्ष से कार्रवाई की मांग की
IIT मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि को लेकर कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा की संसद में की गई टिप्पणी अब ऑनलाइन अभियान का मुद्दा बन गई है। उनके बयान के खिलाफ Change.org पर शुरू की गई पिटीशन पर 14 हजार से ज्यादा लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं। अभियान चलाने वालों का दावा है कि इसमें भारत के अलग-अलग राज्यों के लोगों के साथ 38 से ज्यादा देशों में रहने वाले भारतीय वैज्ञानिकों और अकादमिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का समर्थन मिला है। पिटीशन 1 अगस्त को शुरू की गई थी और इसमें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मामले का संज्ञान लेने की मांग की गई है।
साथ ही प्रियंका गांधी से कथित टिप्पणी वापस लेने और अपने बयान पर खेद जताने की अपील की गई है। आयोजकों ने इसे किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का अभियान नहीं बताया है। उनका कहना है कि मुद्दा सार्वजनिक जीवन और संसद में वैज्ञानिकों तथा शिक्षाविदों के लिए इस्तेमाल होने वाली भाषा से जुड़ा है। पिटीशन में कहा गया है कि किसी वैज्ञानिक के काम या किसी शोध को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन बहस व्यक्तिगत टिप्पणी की तरफ नहीं जानी चाहिए। आयोजकों के मुताबिक, किसी प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान के प्रमुख पर इस तरह की टिप्पणी का असर केवल संबंधित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उस संस्थान की सार्वजनिक छवि पर भी सवाल खड़े कर सकता है।
इसी आधार पर अभियान से जुड़े लोगों ने अकादमिक और वैज्ञानिक समुदाय से पिटीशन का समर्थन करने की अपील की है। मामला संसद की कार्यवाही के दौरान दिए गए उस बयान से जुड़ा है, जिसमें प्रियंका गांधी ने वी. कामकोटि के लिए ‘गोमूत्र एक्सपर्ट’ शब्द का इस्तेमाल किया था। इस टिप्पणी को लेकर समर्थकों का कहना है कि यह कामकोटि की वैज्ञानिक और शैक्षणिक पहचान को लेकर व्यक्तिगत उपहास जैसा है। वहीं, विवाद का दूसरा पक्ष कामकोटि के उस पुराने बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने गोमूत्र के संभावित औषधीय गुणों का उल्लेख किया था। 2025 में सामने आए एक वीडियो में कामकोटि गोमूत्र में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण होने की बात कहते दिखाई दिए थे। उन्होंने यह भी दावा किया था कि इसके इस्तेमाल से कुछ बीमारियों में फायदा हो सकता है। इसी बयान को लेकर उस समय भी चर्चा हुई थी।
बाद में संसद में उनकी टिप्पणी का संदर्भ आने के बाद पुराना वीडियो फिर चर्चा में आ गया। कामकोटि ने अपनी बात के समर्थन में जून 2021 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन का हवाला दिया था। यह अध्ययन गोमूत्र में पाए जाने वाले पेप्टाइड्स की पहचान और प्रोफाइलिंग से संबंधित था। हालांकि, किसी अध्ययन में किसी पदार्थ के जैविक घटकों की पहचान होना और उसके आधार पर किसी बीमारी के इलाज की पुष्टि होना अलग-अलग बातें हैं। पिटीशन में कामकोटि के वैज्ञानिक योगदान का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कंप्यूटर आर्किटेक्चर, साइबर सिक्योरिटी और स्वदेशी प्रोसेसर तकनीक से जुड़े उनके काम को प्रमुखता से रखा गया है। खास तौर पर SHAKTI प्रोजेक्ट का जिक्र किया गया है, जो स्वदेशी प्रोसेसर विकास से जुड़ी पहल है। अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि कामकोटि लंबे समय से शिक्षा, रिसर्च और तकनीकी विकास के क्षेत्र में काम कर रहे हैं और सार्वजनिक बहस में उनके काम को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
पिटीशन में लोकसभा अध्यक्ष के सामने मुख्य रूप से दो मांगें रखी गई हैं। पहली मांग है कि अकादमिक और वैज्ञानिक समुदाय की ओर से उठाई गई आपत्ति का संज्ञान लिया जाए। दूसरी मांग संबंधित सांसद से कथित टिप्पणी वापस लेने और उसके लिए खेद जताने की है। आयोजकों ने कहा है कि यह पहल किसी पार्टी, सरकार या राजनीतिक विचारधारा के पक्ष में नहीं है। उनका दावा है कि अभियान का मकसद संसद और सार्वजनिक मंचों पर बहस के दौरान सम्मानजनक भाषा के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाना है। पिटीशन में प्रोफेसरों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, शिक्षकों, विश्वविद्यालयों के प्रशासकों, छात्रों और पूर्व छात्रों से भी समर्थन मांगा गया है।
अभियान के आयोजकों के अनुसार अलग-अलग देशों में रह रहे भारतीय वैज्ञानिकों की भागीदारी यह दिखाती है कि मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं माना जा रहा। हालांकि, ऑनलाइन पिटीशन पर हस्ताक्षर करने वालों की संख्या और उनकी पेशेवर पृष्ठभूमि की स्वतंत्र पुष्टि इस अभियान के सार्वजनिक दावों से अलग विषय है। कामकोटि से जुड़ा पुराना वीडियो सामने आने के बाद गोमूत्र को लेकर उनके दावों पर भी बहस हुई थी। वीडियो में उन्होंने इसके एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुणों का जिक्र किया था। इसी दौरान उन्होंने IBS यानी इरिटेबल बाउल सिंड्रोम जैसी समस्या का भी उल्लेख किया था।
अपने दावे को समझाते समय उन्होंने एक वैज्ञानिक पेपर का हवाला दिया था, जिसमें गोमूत्र में मौजूद एंडोजिनस पेप्टाइड्स की पहचान की गई थी। अध्ययन में अलग-अलग पेप्टाइड्स की मौजूदगी और उनकी प्रोफाइलिंग पर शोध किया गया था। पिटीशन समर्थकों का कहना है कि कामकोटि के वैज्ञानिक करियर और उनके संस्थागत योगदान को किसी एक बयान के आधार पर खारिज करना उचित नहीं है। दूसरी तरफ प्रियंका गांधी की टिप्पणी को लेकर राजनीतिक बहस अलग स्तर पर चल रही है। कांग्रेस की ओर से इस बयान को लेकर क्या औपचारिक स्पष्टीकरण दिया जाता है और पिटीशन पर लोकसभा अध्यक्ष की ओर से कोई कदम उठाया जाता है, इस पर भी नजर बनी हुई है।
प्रियंका गांधी के बयान पर पिटीशन, कामकोटि के समर्थन में 14 हजार सिग्नेचर
भारत
IIT मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि को लेकर कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा की संसद में की गई टिप्पणी अब ऑनलाइन अभियान का मुद्दा बन गई है। उनके बयान के खिलाफ Change.org पर शुरू की गई पिटीशन पर 14 हजार से ज्यादा लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं। अभियान चलाने वालों का दावा है कि इसमें भारत के अलग-अलग राज्यों के लोगों के साथ 38 से ज्यादा देशों में रहने वाले भारतीय वैज्ञानिकों और अकादमिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का समर्थन मिला है। पिटीशन 1 अगस्त को शुरू की गई थी और इसमें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मामले का संज्ञान लेने की मांग की गई है।
साथ ही प्रियंका गांधी से कथित टिप्पणी वापस लेने और अपने बयान पर खेद जताने की अपील की गई है। आयोजकों ने इसे किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का अभियान नहीं बताया है। उनका कहना है कि मुद्दा सार्वजनिक जीवन और संसद में वैज्ञानिकों तथा शिक्षाविदों के लिए इस्तेमाल होने वाली भाषा से जुड़ा है। पिटीशन में कहा गया है कि किसी वैज्ञानिक के काम या किसी शोध को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन बहस व्यक्तिगत टिप्पणी की तरफ नहीं जानी चाहिए। आयोजकों के मुताबिक, किसी प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान के प्रमुख पर इस तरह की टिप्पणी का असर केवल संबंधित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उस संस्थान की सार्वजनिक छवि पर भी सवाल खड़े कर सकता है।
इसी आधार पर अभियान से जुड़े लोगों ने अकादमिक और वैज्ञानिक समुदाय से पिटीशन का समर्थन करने की अपील की है। मामला संसद की कार्यवाही के दौरान दिए गए उस बयान से जुड़ा है, जिसमें प्रियंका गांधी ने वी. कामकोटि के लिए ‘गोमूत्र एक्सपर्ट’ शब्द का इस्तेमाल किया था। इस टिप्पणी को लेकर समर्थकों का कहना है कि यह कामकोटि की वैज्ञानिक और शैक्षणिक पहचान को लेकर व्यक्तिगत उपहास जैसा है। वहीं, विवाद का दूसरा पक्ष कामकोटि के उस पुराने बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने गोमूत्र के संभावित औषधीय गुणों का उल्लेख किया था। 2025 में सामने आए एक वीडियो में कामकोटि गोमूत्र में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण होने की बात कहते दिखाई दिए थे। उन्होंने यह भी दावा किया था कि इसके इस्तेमाल से कुछ बीमारियों में फायदा हो सकता है। इसी बयान को लेकर उस समय भी चर्चा हुई थी।
बाद में संसद में उनकी टिप्पणी का संदर्भ आने के बाद पुराना वीडियो फिर चर्चा में आ गया। कामकोटि ने अपनी बात के समर्थन में जून 2021 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन का हवाला दिया था। यह अध्ययन गोमूत्र में पाए जाने वाले पेप्टाइड्स की पहचान और प्रोफाइलिंग से संबंधित था। हालांकि, किसी अध्ययन में किसी पदार्थ के जैविक घटकों की पहचान होना और उसके आधार पर किसी बीमारी के इलाज की पुष्टि होना अलग-अलग बातें हैं। पिटीशन में कामकोटि के वैज्ञानिक योगदान का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कंप्यूटर आर्किटेक्चर, साइबर सिक्योरिटी और स्वदेशी प्रोसेसर तकनीक से जुड़े उनके काम को प्रमुखता से रखा गया है। खास तौर पर SHAKTI प्रोजेक्ट का जिक्र किया गया है, जो स्वदेशी प्रोसेसर विकास से जुड़ी पहल है। अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि कामकोटि लंबे समय से शिक्षा, रिसर्च और तकनीकी विकास के क्षेत्र में काम कर रहे हैं और सार्वजनिक बहस में उनके काम को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
पिटीशन में लोकसभा अध्यक्ष के सामने मुख्य रूप से दो मांगें रखी गई हैं। पहली मांग है कि अकादमिक और वैज्ञानिक समुदाय की ओर से उठाई गई आपत्ति का संज्ञान लिया जाए। दूसरी मांग संबंधित सांसद से कथित टिप्पणी वापस लेने और उसके लिए खेद जताने की है। आयोजकों ने कहा है कि यह पहल किसी पार्टी, सरकार या राजनीतिक विचारधारा के पक्ष में नहीं है। उनका दावा है कि अभियान का मकसद संसद और सार्वजनिक मंचों पर बहस के दौरान सम्मानजनक भाषा के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाना है। पिटीशन में प्रोफेसरों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, शिक्षकों, विश्वविद्यालयों के प्रशासकों, छात्रों और पूर्व छात्रों से भी समर्थन मांगा गया है।
अभियान के आयोजकों के अनुसार अलग-अलग देशों में रह रहे भारतीय वैज्ञानिकों की भागीदारी यह दिखाती है कि मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं माना जा रहा। हालांकि, ऑनलाइन पिटीशन पर हस्ताक्षर करने वालों की संख्या और उनकी पेशेवर पृष्ठभूमि की स्वतंत्र पुष्टि इस अभियान के सार्वजनिक दावों से अलग विषय है। कामकोटि से जुड़ा पुराना वीडियो सामने आने के बाद गोमूत्र को लेकर उनके दावों पर भी बहस हुई थी। वीडियो में उन्होंने इसके एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुणों का जिक्र किया था। इसी दौरान उन्होंने IBS यानी इरिटेबल बाउल सिंड्रोम जैसी समस्या का भी उल्लेख किया था।
अपने दावे को समझाते समय उन्होंने एक वैज्ञानिक पेपर का हवाला दिया था, जिसमें गोमूत्र में मौजूद एंडोजिनस पेप्टाइड्स की पहचान की गई थी। अध्ययन में अलग-अलग पेप्टाइड्स की मौजूदगी और उनकी प्रोफाइलिंग पर शोध किया गया था। पिटीशन समर्थकों का कहना है कि कामकोटि के वैज्ञानिक करियर और उनके संस्थागत योगदान को किसी एक बयान के आधार पर खारिज करना उचित नहीं है। दूसरी तरफ प्रियंका गांधी की टिप्पणी को लेकर राजनीतिक बहस अलग स्तर पर चल रही है। कांग्रेस की ओर से इस बयान को लेकर क्या औपचारिक स्पष्टीकरण दिया जाता है और पिटीशन पर लोकसभा अध्यक्ष की ओर से कोई कदम उठाया जाता है, इस पर भी नजर बनी हुई है।
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