FCRA बिल JPC को भेजने का प्रस्ताव लोकसभा में मंजूर

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विदेशी फंडिंग से जुड़े कानून में बदलाव पर विपक्ष और कई संगठनों की आपत्ति के बीच सरकार ने 31 सदस्यीय संयुक्त समिति को भेजने का फैसला किया

नई दिल्ली में बुधवार को विदेशी चंदे और फंडिंग से जुड़े FCRA संशोधन विधेयक को लेकर संसद में बड़ा घटनाक्रम हुआ। सरकार ने Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को आगे की विस्तृत जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेजने का प्रस्ताव लोकसभा में रखा, जिसे सदन ने मंजूरी दे दी। प्रस्तावित समिति में कुल 31 सदस्य होंगे। इनमें 21 सदस्य लोकसभा और 10 सदस्य राज्यसभा से होंगे। दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों की ओर से सदस्यों को नामित किया जाएगा। सरकार की ओर से यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब विधेयक के कई प्रावधानों को लेकर विपक्ष, ईसाई संगठनों और कुछ अन्य हितधारकों की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे थे।

विधेयक को मूल रूप से 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। इसका मकसद 2010 के Foreign Contribution (Regulation) Act यानी FCRA में कई बड़े बदलाव करना है। यह कानून देश में NGOs, संस्थानों, संगठनों और कुछ अन्य इकाइयों को मिलने वाले विदेशी चंदे और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करता है। मौजूदा विवाद मुख्य तौर पर उन प्रावधानों को लेकर है जिनके तहत किसी संगठन का FCRA पंजीकरण रद्द होने, समाप्त होने या नवीनीकरण नहीं होने की स्थिति में विदेशी चंदे से बनाई गई संपत्तियों पर सरकार की ओर से नियुक्त Designated Authority का नियंत्रण हो सकता है। बिल में ऐसी संपत्तियों के अस्थायी रूप से प्राधिकरण के पास जाने और कुछ परिस्थितियों में स्थायी रूप से उसके अधीन किए जाने का प्रावधान रखा गया है।

प्रस्तावित व्यवस्था के मुताबिक अगर किसी संगठन का FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाता है, वह खुद पंजीकरण सरेंडर करता है या उसका प्रमाणपत्र समाप्त हो जाता है और तय अवधि में नया पंजीकरण या नवीनीकरण नहीं होता, तो विदेशी योगदान और उससे बनाई गई संपत्तियां पहले अस्थायी रूप से Designated Authority के पास जा सकती हैं। अगर बाद में पंजीकरण बहाल हो जाता है तो संपत्तियां और इस्तेमाल न हुआ विदेशी योगदान वापस करने का प्रावधान है। लेकिन तय प्रक्रिया के भीतर पंजीकरण बहाल नहीं होने पर संपत्तियों के स्थायी रूप से प्राधिकरण के अधीन जाने का रास्ता बनाया गया है। ऐसी संपत्तियों को केंद्र या राज्य सरकार की किसी एजेंसी को ट्रांसफर करने या उन्हें बेचकर रकम को Consolidated Fund of India में जमा करने का प्रावधान भी बिल में है।

धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति के मामले में उसके धार्मिक चरित्र को बनाए रखने और प्रबंधन की व्यवस्था का भी प्रावधान रखा गया है। सरकार का पक्ष है कि FCRA व्यवस्था में स्पष्टता, पारदर्शिता और विदेशी फंड के इस्तेमाल की निगरानी जरूरी है। वहीं विपक्ष और कुछ संगठनों को आशंका है कि नए प्रावधानों से प्रशासन को बहुत ज्यादा अधिकार मिल सकते हैं और ऐसे संस्थानों की संपत्तियों पर असर पड़ सकता है जो विदेशी चंदे से स्कूल, अस्पताल, सामाजिक सेवा या धार्मिक गतिविधियां संचालित करते हैं। हाल के दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक दबाव भी बढ़ा। कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने विधेयक को वापस लेने या JPC के पास भेजने की मांग की थी। बीजेडी सांसद सस्मित पात्रा ने भी बिल की विस्तृत जांच के लिए संयुक्त समिति का रास्ता अपनाने की मांग रखी थी। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा और ईसाई संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी केंद्र सरकार से विधेयक को JPC में भेजने की अपील की थी। तमिलनाडु विधानसभा ने 11 अगस्त को विधेयक को मौजूदा स्वरूप में वापस लेने की मांग वाला प्रस्ताव भी पारित किया था।

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गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के दौरान प्रतिनिधिमंडलों ने भी अपनी आपत्तियां रखी थीं। शाह की ओर से यह आश्वासन दिए जाने की जानकारी सामने आई थी कि प्रस्तावित संशोधन पिछली घटनाओं पर पूर्वव्यापी तरीके से लागू नहीं होगा। अब JPC में विधेयक की धाराओं पर विस्तार से विचार होगा। समिति अलग-अलग पक्षों से राय लेने और विधेयक के प्रावधानों की समीक्षा करने के बाद अपनी रिपोर्ट संसद में रख सकती है। बिल में विदेशी फंड हासिल करने पर रोक से जुड़े प्रावधानों में भी बदलाव प्रस्तावित हैं। इसके अलावा अपराध और सजा से जुड़े हिस्से में भी संशोधन किया गया है। मौजूदा कानून के तहत कुछ उल्लंघनों में पांच साल तक की जेल हो सकती है, जबकि संशोधन विधेयक में अधिकतम सजा को एक साल तक करने का प्रस्ताव है। साथ ही FCRA के तहत किसी अपराध की जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी की जरूरत का प्रावधान भी जोड़ा गया है।

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12 Aug 2026 By Priyanka

FCRA बिल JPC को भेजने का प्रस्ताव लोकसभा में मंजूर

भारत

नई दिल्ली में बुधवार को विदेशी चंदे और फंडिंग से जुड़े FCRA संशोधन विधेयक को लेकर संसद में बड़ा घटनाक्रम हुआ। सरकार ने Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को आगे की विस्तृत जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेजने का प्रस्ताव लोकसभा में रखा, जिसे सदन ने मंजूरी दे दी। प्रस्तावित समिति में कुल 31 सदस्य होंगे। इनमें 21 सदस्य लोकसभा और 10 सदस्य राज्यसभा से होंगे। दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों की ओर से सदस्यों को नामित किया जाएगा। सरकार की ओर से यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब विधेयक के कई प्रावधानों को लेकर विपक्ष, ईसाई संगठनों और कुछ अन्य हितधारकों की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे थे।

विधेयक को मूल रूप से 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। इसका मकसद 2010 के Foreign Contribution (Regulation) Act यानी FCRA में कई बड़े बदलाव करना है। यह कानून देश में NGOs, संस्थानों, संगठनों और कुछ अन्य इकाइयों को मिलने वाले विदेशी चंदे और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करता है। मौजूदा विवाद मुख्य तौर पर उन प्रावधानों को लेकर है जिनके तहत किसी संगठन का FCRA पंजीकरण रद्द होने, समाप्त होने या नवीनीकरण नहीं होने की स्थिति में विदेशी चंदे से बनाई गई संपत्तियों पर सरकार की ओर से नियुक्त Designated Authority का नियंत्रण हो सकता है। बिल में ऐसी संपत्तियों के अस्थायी रूप से प्राधिकरण के पास जाने और कुछ परिस्थितियों में स्थायी रूप से उसके अधीन किए जाने का प्रावधान रखा गया है।

प्रस्तावित व्यवस्था के मुताबिक अगर किसी संगठन का FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाता है, वह खुद पंजीकरण सरेंडर करता है या उसका प्रमाणपत्र समाप्त हो जाता है और तय अवधि में नया पंजीकरण या नवीनीकरण नहीं होता, तो विदेशी योगदान और उससे बनाई गई संपत्तियां पहले अस्थायी रूप से Designated Authority के पास जा सकती हैं। अगर बाद में पंजीकरण बहाल हो जाता है तो संपत्तियां और इस्तेमाल न हुआ विदेशी योगदान वापस करने का प्रावधान है। लेकिन तय प्रक्रिया के भीतर पंजीकरण बहाल नहीं होने पर संपत्तियों के स्थायी रूप से प्राधिकरण के अधीन जाने का रास्ता बनाया गया है। ऐसी संपत्तियों को केंद्र या राज्य सरकार की किसी एजेंसी को ट्रांसफर करने या उन्हें बेचकर रकम को Consolidated Fund of India में जमा करने का प्रावधान भी बिल में है।

धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति के मामले में उसके धार्मिक चरित्र को बनाए रखने और प्रबंधन की व्यवस्था का भी प्रावधान रखा गया है। सरकार का पक्ष है कि FCRA व्यवस्था में स्पष्टता, पारदर्शिता और विदेशी फंड के इस्तेमाल की निगरानी जरूरी है। वहीं विपक्ष और कुछ संगठनों को आशंका है कि नए प्रावधानों से प्रशासन को बहुत ज्यादा अधिकार मिल सकते हैं और ऐसे संस्थानों की संपत्तियों पर असर पड़ सकता है जो विदेशी चंदे से स्कूल, अस्पताल, सामाजिक सेवा या धार्मिक गतिविधियां संचालित करते हैं। हाल के दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक दबाव भी बढ़ा। कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने विधेयक को वापस लेने या JPC के पास भेजने की मांग की थी। बीजेडी सांसद सस्मित पात्रा ने भी बिल की विस्तृत जांच के लिए संयुक्त समिति का रास्ता अपनाने की मांग रखी थी। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा और ईसाई संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी केंद्र सरकार से विधेयक को JPC में भेजने की अपील की थी। तमिलनाडु विधानसभा ने 11 अगस्त को विधेयक को मौजूदा स्वरूप में वापस लेने की मांग वाला प्रस्ताव भी पारित किया था।

गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के दौरान प्रतिनिधिमंडलों ने भी अपनी आपत्तियां रखी थीं। शाह की ओर से यह आश्वासन दिए जाने की जानकारी सामने आई थी कि प्रस्तावित संशोधन पिछली घटनाओं पर पूर्वव्यापी तरीके से लागू नहीं होगा। अब JPC में विधेयक की धाराओं पर विस्तार से विचार होगा। समिति अलग-अलग पक्षों से राय लेने और विधेयक के प्रावधानों की समीक्षा करने के बाद अपनी रिपोर्ट संसद में रख सकती है। बिल में विदेशी फंड हासिल करने पर रोक से जुड़े प्रावधानों में भी बदलाव प्रस्तावित हैं। इसके अलावा अपराध और सजा से जुड़े हिस्से में भी संशोधन किया गया है। मौजूदा कानून के तहत कुछ उल्लंघनों में पांच साल तक की जेल हो सकती है, जबकि संशोधन विधेयक में अधिकतम सजा को एक साल तक करने का प्रस्ताव है। साथ ही FCRA के तहत किसी अपराध की जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी की जरूरत का प्रावधान भी जोड़ा गया है।

https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/lok-sabha-approves-proposal-to-send-fcr-bill-to-jpc/article-61301

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