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ट्रम्प पर 7 दिन का दबाव: 1 मई तक युद्ध मंजूरी नहीं तो संकट
अंतराष्ट्रीय न्यूज
US-Iran War के बीच अमेरिकी संसद की मंजूरी जरूरी, ट्रम्प को अपनी ही पार्टी के विरोध का सामना जंग के मोर्चे पर अब अमेरिका के भीतर ही सियासी लड़ाई तेज हो गई है। 1 मई की डेडलाइन ने ट्रम्प के फैसलों पर बड़ा दबाव बना दिया है।
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने ही देश के कानून से आ खड़ी हुई है। 28 फरवरी को शुरू हुई सैन्य कार्रवाई को जारी रखने के लिए उन्हें 1 मई से पहले अमेरिकी संसद की मंजूरी लेनी होगी। इस डेडलाइन में अब सिर्फ सात दिन बचे हैं, जिससे व्हाइट हाउस पर दबाव तेजी से बढ़ रहा है।
स्थिति इसलिए भी जटिल हो गई है क्योंकि ट्रम्प को विपक्ष ही नहीं, अपनी ही पार्टी के भीतर विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में युद्ध जारी रखने का फैसला अब राजनीतिक जोखिम में बदलता दिख रहा है।
संसद में फंसा मामला
अमेरिकी सीनेट में भले ही रिपब्लिकन पार्टी के पास बहुमत है, लेकिन तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है।करीब 10 रिपब्लिकन सांसद खुलकर इस युद्ध के खिलाफ खड़े हो गए हैं। दूसरी ओर डेमोक्रेटिक पार्टी एकजुट होकर विरोध की तैयारी में है। ऐसे में ट्रम्प के लिए जरूरी समर्थन जुटाना आसान नहीं दिख रहा।
कानून की सख्ती
अमेरिकी नियम साफ कहते हैं कि 60 दिन से ज्यादा सैन्य कार्रवाई बिना संसद की मंजूरी के जारी नहीं रह सकती।एक बार 30 दिन का अतिरिक्त समय मिल सकता है, लेकिन वह सिर्फ सैनिकों की सुरक्षित वापसी के लिए होता है। इसका इस्तेमाल युद्ध जारी रखने के लिए नहीं किया जा सकता।
अमेरिका ने फरवरी के आखिर में ईरान के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी, जिसके बाद पूरे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ गया इसका असर सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहा। कई देशों ने अपने नागरिकों के लिए यात्रा संबंधी चेतावनियां जारी कर दी हैं और वैश्विक बाजारों पर भी दबाव देखा जा रहा है।
बढ़ता राजनीतिक दबाव
ट्रम्प के सामने अब दो मोर्चे खुल गए हैं—एक बाहर का युद्ध और दूसरा अंदर की राजनीति।अगर संसद से मंजूरी नहीं मिलती, तो उन्हें या तो कार्रवाई रोकनी पड़ेगी या फिर कानून की अनदेखी का जोखिम उठाना होगा। दोनों ही स्थितियां उनके लिए नुकसानदेह साबित हो सकती हैं।
आने वाले कुछ दिन बेहद अहम हैं।संकेत मिल रहे हैं कि प्रशासन किसी तरह टकराव टालने की कोशिश कर सकता है—चाहे वह सीमित कार्रवाई हो या बातचीत की राह।फिलहाल हालात ऐसे हैं कि यह सिर्फ US-Iran War नहीं, बल्कि अमेरिकी राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है।
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ट्रम्प पर 7 दिन का दबाव: 1 मई तक युद्ध मंजूरी नहीं तो संकट
अंतराष्ट्रीय न्यूज
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने ही देश के कानून से आ खड़ी हुई है। 28 फरवरी को शुरू हुई सैन्य कार्रवाई को जारी रखने के लिए उन्हें 1 मई से पहले अमेरिकी संसद की मंजूरी लेनी होगी। इस डेडलाइन में अब सिर्फ सात दिन बचे हैं, जिससे व्हाइट हाउस पर दबाव तेजी से बढ़ रहा है।
स्थिति इसलिए भी जटिल हो गई है क्योंकि ट्रम्प को विपक्ष ही नहीं, अपनी ही पार्टी के भीतर विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में युद्ध जारी रखने का फैसला अब राजनीतिक जोखिम में बदलता दिख रहा है।
संसद में फंसा मामला
अमेरिकी सीनेट में भले ही रिपब्लिकन पार्टी के पास बहुमत है, लेकिन तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है।करीब 10 रिपब्लिकन सांसद खुलकर इस युद्ध के खिलाफ खड़े हो गए हैं। दूसरी ओर डेमोक्रेटिक पार्टी एकजुट होकर विरोध की तैयारी में है। ऐसे में ट्रम्प के लिए जरूरी समर्थन जुटाना आसान नहीं दिख रहा।
कानून की सख्ती
अमेरिकी नियम साफ कहते हैं कि 60 दिन से ज्यादा सैन्य कार्रवाई बिना संसद की मंजूरी के जारी नहीं रह सकती।एक बार 30 दिन का अतिरिक्त समय मिल सकता है, लेकिन वह सिर्फ सैनिकों की सुरक्षित वापसी के लिए होता है। इसका इस्तेमाल युद्ध जारी रखने के लिए नहीं किया जा सकता।
अमेरिका ने फरवरी के आखिर में ईरान के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी, जिसके बाद पूरे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ गया इसका असर सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहा। कई देशों ने अपने नागरिकों के लिए यात्रा संबंधी चेतावनियां जारी कर दी हैं और वैश्विक बाजारों पर भी दबाव देखा जा रहा है।
बढ़ता राजनीतिक दबाव
ट्रम्प के सामने अब दो मोर्चे खुल गए हैं—एक बाहर का युद्ध और दूसरा अंदर की राजनीति।अगर संसद से मंजूरी नहीं मिलती, तो उन्हें या तो कार्रवाई रोकनी पड़ेगी या फिर कानून की अनदेखी का जोखिम उठाना होगा। दोनों ही स्थितियां उनके लिए नुकसानदेह साबित हो सकती हैं।
आने वाले कुछ दिन बेहद अहम हैं।संकेत मिल रहे हैं कि प्रशासन किसी तरह टकराव टालने की कोशिश कर सकता है—चाहे वह सीमित कार्रवाई हो या बातचीत की राह।फिलहाल हालात ऐसे हैं कि यह सिर्फ US-Iran War नहीं, बल्कि अमेरिकी राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है।
