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पद्म विभूषण तीजन बाई नहीं रहीं, पंडवानी की अमर आवाज हमेशा गूंजती रहेगी
Digital Desk
70 वर्ष की आयु में रायपुर एम्स में ली अंतिम सांस, महाभारत की लोकगाथाओं को विश्व मंच तक पहुंचाने वाली महान लोक कलाकार के निधन से कला जगत में शोक
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और पंडवानी गायन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली देश की महान लोक कलाकार, पद्म विभूषण तीजन बाई का शनिवार देर रात निधन हो गया। 70 वर्षीय तीजन बाई ने रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में रात करीब 3:15 बजे अंतिम सांस ली। वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं और उनका इलाज जारी था। उनके निधन की खबर सामने आते ही कला, संस्कृति और साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। देशभर के कलाकारों, राजनीतिक नेताओं और उनके प्रशंसकों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
रविवार सुबह उनके पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांव गनियारी लाया गया, जहां अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। गांव और आसपास के क्षेत्रों से आए लोगों ने अपनी प्रिय लोक कलाकार को नम आंखों से विदाई दी। यहीं पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
नाना से मिली महाभारत सुनाने की प्रेरणा
तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनका झुकाव लोककला और महाभारत की कथाओं की ओर था। उनके नाना उन्हें महाभारत की कहानियां सुनाया करते थे। इन्हीं कथाओं ने उनके मन में पंडवानी गायन के प्रति गहरी रुचि पैदा की। उन्होंने बचपन में ही इन कथाओं को याद करना शुरू कर दिया और बाद में अपनी विशिष्ट शैली में मंच पर प्रस्तुत करने लगीं।
महज 13 वर्ष की आयु में उन्होंने पहली बार सार्वजनिक मंच पर पंडवानी का गायन किया। उनकी दमदार आवाज, प्रभावशाली अभिनय और भावपूर्ण प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
पंडवानी को दिलाई वैश्विक पहचान
तीजन बाई ने पंडवानी जैसी पारंपरिक लोककला को केवल गांवों और मेलों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। उन्होंने भारत सहित दुनिया के कई देशों में अपनी प्रस्तुतियां देकर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाई।
उनकी प्रस्तुति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल गाती नहीं थीं, बल्कि महाभारत के पात्रों को अपने अभिनय, भाव-भंगिमा और आवाज के उतार-चढ़ाव से जीवंत कर देती थीं। दर्शक स्वयं को महाभारत के घटनाक्रम का हिस्सा महसूस करने लगते थे।
संघर्षों से भरा रहा जीवन
आज भले ही तीजन बाई को विश्वस्तरीय कलाकार के रूप में जाना जाता हो, लेकिन उनकी यात्रा आसान नहीं रही। सामाजिक परंपराओं और रूढ़ियों के कारण शुरुआती दौर में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उस समय महिलाओं का पंडवानी की 'कापालिक शैली' में मंच पर प्रस्तुति देना सामान्य नहीं माना जाता था।
उन्होंने तमाम विरोधों और सामाजिक चुनौतियों का डटकर सामना किया। अपनी प्रतिभा और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने यह साबित कर दिया कि कला की कोई सीमा नहीं होती। उनके संघर्ष ने आने वाली पीढ़ियों की महिला कलाकारों के लिए भी नए रास्ते खोले।
देश के सर्वोच्च सम्मानों से हुईं सम्मानित
भारतीय लोककला में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए उन्हें समय-समय पर कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और बाद में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया।
इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि सम्मान और अनेक सांस्कृतिक संस्थानों द्वारा भी सम्मानित किया गया। उनके सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धियां नहीं थे, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का गौरव भी बने।
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने जताया शोक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीजन बाई के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि तीजन बाई ने अपनी अद्भुत प्रस्तुति से छत्तीसगढ़ की लोककला को पूरी दुनिया में नई पहचान दिलाई। उनका निधन कला और संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी शोक व्यक्त करते हुए कहा कि तीजन बाई ने अपने जीवन को लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित किया। पंडवानी के माध्यम से उन्होंने राज्य का गौरव पूरी दुनिया में बढ़ाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन गईं।
तीजन बाई का जीवन इस बात का उदाहरण है कि समर्पण, मेहनत और प्रतिभा के बल पर कोई भी कलाकार वैश्विक पहचान हासिल कर सकता है। उन्होंने न केवल लोककला को जीवित रखा, बल्कि उसे आधुनिक मंचों तक भी पहुंचाया। आज देश-विदेश के अनेक युवा कलाकार उनकी शैली से प्रेरणा लेकर पंडवानी और लोककला के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। उनकी आवाज, अभिनय और महाभारत के पात्रों को जीवंत करने की कला हमेशा लोगों की स्मृतियों में जीवित रहेगी। उनका योगदान भारतीय लोक संस्कृति के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।
कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति
तीजन बाई का निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा के एक युग का अंत माना जा रहा है। उन्होंने अपने जीवन के कई दशक लोककला को समर्पित किए और पंडवानी को विश्व मंच पर स्थापित किया। उनके जाने से जो रिक्तता बनी है, उसे भर पाना आसान नहीं होगा। हालांकि उनकी प्रस्तुतियां, उनके गीत और उनकी कला आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेंगी। भारतीय लोक संगीत और पंडवानी की दुनिया में उनका नाम सदैव सम्मान और गर्व के साथ लिया जाएगा।
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पद्म विभूषण तीजन बाई नहीं रहीं, पंडवानी की अमर आवाज हमेशा गूंजती रहेगी
Digital Desk
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और पंडवानी गायन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली देश की महान लोक कलाकार, पद्म विभूषण तीजन बाई का शनिवार देर रात निधन हो गया। 70 वर्षीय तीजन बाई ने रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में रात करीब 3:15 बजे अंतिम सांस ली। वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं और उनका इलाज जारी था। उनके निधन की खबर सामने आते ही कला, संस्कृति और साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। देशभर के कलाकारों, राजनीतिक नेताओं और उनके प्रशंसकों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
रविवार सुबह उनके पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांव गनियारी लाया गया, जहां अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। गांव और आसपास के क्षेत्रों से आए लोगों ने अपनी प्रिय लोक कलाकार को नम आंखों से विदाई दी। यहीं पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
नाना से मिली महाभारत सुनाने की प्रेरणा
तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनका झुकाव लोककला और महाभारत की कथाओं की ओर था। उनके नाना उन्हें महाभारत की कहानियां सुनाया करते थे। इन्हीं कथाओं ने उनके मन में पंडवानी गायन के प्रति गहरी रुचि पैदा की। उन्होंने बचपन में ही इन कथाओं को याद करना शुरू कर दिया और बाद में अपनी विशिष्ट शैली में मंच पर प्रस्तुत करने लगीं।
महज 13 वर्ष की आयु में उन्होंने पहली बार सार्वजनिक मंच पर पंडवानी का गायन किया। उनकी दमदार आवाज, प्रभावशाली अभिनय और भावपूर्ण प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
पंडवानी को दिलाई वैश्विक पहचान
तीजन बाई ने पंडवानी जैसी पारंपरिक लोककला को केवल गांवों और मेलों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। उन्होंने भारत सहित दुनिया के कई देशों में अपनी प्रस्तुतियां देकर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाई।
उनकी प्रस्तुति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल गाती नहीं थीं, बल्कि महाभारत के पात्रों को अपने अभिनय, भाव-भंगिमा और आवाज के उतार-चढ़ाव से जीवंत कर देती थीं। दर्शक स्वयं को महाभारत के घटनाक्रम का हिस्सा महसूस करने लगते थे।
संघर्षों से भरा रहा जीवन
आज भले ही तीजन बाई को विश्वस्तरीय कलाकार के रूप में जाना जाता हो, लेकिन उनकी यात्रा आसान नहीं रही। सामाजिक परंपराओं और रूढ़ियों के कारण शुरुआती दौर में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उस समय महिलाओं का पंडवानी की 'कापालिक शैली' में मंच पर प्रस्तुति देना सामान्य नहीं माना जाता था।
उन्होंने तमाम विरोधों और सामाजिक चुनौतियों का डटकर सामना किया। अपनी प्रतिभा और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने यह साबित कर दिया कि कला की कोई सीमा नहीं होती। उनके संघर्ष ने आने वाली पीढ़ियों की महिला कलाकारों के लिए भी नए रास्ते खोले।
देश के सर्वोच्च सम्मानों से हुईं सम्मानित
भारतीय लोककला में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए उन्हें समय-समय पर कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और बाद में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया।
इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि सम्मान और अनेक सांस्कृतिक संस्थानों द्वारा भी सम्मानित किया गया। उनके सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धियां नहीं थे, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का गौरव भी बने।
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने जताया शोक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीजन बाई के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि तीजन बाई ने अपनी अद्भुत प्रस्तुति से छत्तीसगढ़ की लोककला को पूरी दुनिया में नई पहचान दिलाई। उनका निधन कला और संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी शोक व्यक्त करते हुए कहा कि तीजन बाई ने अपने जीवन को लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित किया। पंडवानी के माध्यम से उन्होंने राज्य का गौरव पूरी दुनिया में बढ़ाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन गईं।
तीजन बाई का जीवन इस बात का उदाहरण है कि समर्पण, मेहनत और प्रतिभा के बल पर कोई भी कलाकार वैश्विक पहचान हासिल कर सकता है। उन्होंने न केवल लोककला को जीवित रखा, बल्कि उसे आधुनिक मंचों तक भी पहुंचाया। आज देश-विदेश के अनेक युवा कलाकार उनकी शैली से प्रेरणा लेकर पंडवानी और लोककला के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। उनकी आवाज, अभिनय और महाभारत के पात्रों को जीवंत करने की कला हमेशा लोगों की स्मृतियों में जीवित रहेगी। उनका योगदान भारतीय लोक संस्कृति के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।
कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति
तीजन बाई का निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा के एक युग का अंत माना जा रहा है। उन्होंने अपने जीवन के कई दशक लोककला को समर्पित किए और पंडवानी को विश्व मंच पर स्थापित किया। उनके जाने से जो रिक्तता बनी है, उसे भर पाना आसान नहीं होगा। हालांकि उनकी प्रस्तुतियां, उनके गीत और उनकी कला आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेंगी। भारतीय लोक संगीत और पंडवानी की दुनिया में उनका नाम सदैव सम्मान और गर्व के साथ लिया जाएगा।
