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PM मोदी ने सचिवों से कहा- युवाओं की राय से बनें बेहतर नीतियां
भारत
केंद्रीय सचिवों की बैठक में शिक्षा, AI, रक्षा, पोर्ट, शिपबिल्डिंग और एक्सपोर्ट पर मंथन, भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर काम करने की सलाह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को केंद्रीय सचिवों के साथ उच्चस्तरीय बैठक की। यह बैठक नई दिल्ली में 7, लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री आवास पर हुई। इसमें सरकार के अलग-अलग विभागों के कामकाज के साथ उन क्षेत्रों पर चर्चा की गई, जिनका आने वाले वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था और प्रशासन पर सीधा असर पड़ सकता है। प्रधानमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि नीतियां बनाते समय सिर्फ सरकारी आंकड़ों और मौजूदा समस्याओं को देखने से काम नहीं चलेगा। देश के युवाओं और विश्वविद्यालयों से भी लगातार संवाद होना चाहिए। छात्रों के पास कई ऐसे नए विचार होते हैं, जो नीतियों और योजनाओं को ज्यादा व्यावहारिक बनाने में मदद कर सकते हैं। बैठक में शिक्षा, युवा, तकनीक, इंफ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षा, विदेश नीति और उद्योग से जुड़े मुद्दे उठाए गए।
युवाओं के साथ संवाद को बैठक में खास महत्व दिया गया। प्रधानमंत्री ने सचिवों को यूनिवर्सिटी और युवाओं के बीच जाकर उनकी राय समझने पर जोर दिया। सरकार के स्तर पर तैयार होने वाली योजनाओं का असर आखिरकार छात्रों, नौकरी तलाश रहे युवाओं और नई पीढ़ी पर भी पड़ता है। ऐसे में उनके अनुभव और सुझाव सीधे नीति निर्माण तक पहुंचें, इस दिशा में अधिकारियों को काम करने को कहा गया। विश्वविद्यालयों को केवल शिक्षा के केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि नए विचार और रिसर्च के स्रोत के तौर पर देखने की बात भी सामने आई। युवाओं के साथ बातचीत के दौरान शिक्षा, रोजगार, तकनीक और बदलती अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर मिलने वाले इनपुट का इस्तेमाल आगे की योजनाओं में किया जा सकता है।
बैठक में बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी को लेकर भी चर्चा हुई। प्रधानमंत्री ने अलग-अलग मंत्रालयों के बीच समन्वय बढ़ाने की जरूरत बताई। सड़क, रेल, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स और दूसरी कनेक्टिविटी परियोजनाओं को अलग-अलग तरीके से देखने के बजाय उनके बीच तालमेल पर ध्यान देने की बात कही गई। किसी इलाके में सिर्फ सड़क या रेल लाइन बन जाने से पूरा आर्थिक फायदा नहीं मिलता, जब तक उसका जुड़ाव उत्पादन केंद्र, बाजार और परिवहन नेटवर्क से न हो। इसी वजह से भविष्य की जरूरतों का आकलन करते हुए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने पर जोर दिया गया। सचिवों से अपने-अपने विभाग की योजनाओं को दूसरे मंत्रालयों के काम से जोड़कर देखने को कहा गया।
सुरक्षा और विदेश मामलों को लेकर भी अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श हुआ। बदलते वैश्विक माहौल में भारत की सुरक्षा जरूरतें केवल सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। तकनीक, व्यापार, समुद्री रास्ते और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां भी इससे जुड़ी हुई हैं। बैठक में संबंधित मंत्रालयों के काम को आगे की परिस्थितियों के हिसाब से तैयार करने पर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री ने अधिकारियों को मौजूदा चुनौतियों के साथ भविष्य में सामने आ सकने वाली परिस्थितियों का अनुमान लगाने की जरूरत बताई। यानी किसी समस्या के सामने आने के बाद कार्रवाई करने के बजाय पहले से तैयारी रखने पर जोर रहा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI और डेटा के इस्तेमाल पर भी बैठक में विशेष चर्चा हुई। सरकारी विभागों के पास बड़ी मात्रा में डेटा मौजूद है, जिसका इस्तेमाल योजनाओं को बेहतर तरीके से तैयार करने और फैसले लेने में किया जा सकता है। प्रधानमंत्री ने तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ाने की बात कही, लेकिन साथ ही AI से जुड़े फैसलों में मानवीय निगरानी को जरूरी बताया। मशीन से मिलने वाले परिणाम को अंतिम सत्य मानने के बजाय अधिकारियों की समझ और जिम्मेदारी बनी रहनी चाहिए। सरकारी व्यवस्था में AI का इस्तेमाल बढ़ने के साथ डेटा की गुणवत्ता, पारदर्शिता और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर निगरानी को भी महत्वपूर्ण माना गया।
रिसर्च और इनोवेशन को लेकर भी अधिकारियों से ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने को कहा गया। खास तौर पर रक्षा क्षेत्र में देश के भीतर रिसर्च और नई तकनीक विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया गया। भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए केवल दूसरे देशों से तकनीक लेने के बजाय अपने संस्थानों और कंपनियों में अनुसंधान की क्षमता बढ़ाना जरूरी है। इसमें यूनिवर्सिटी, स्टार्टअप, रिसर्च संस्थान और उद्योग के बीच सहयोग की भूमिका अहम हो सकती है। रक्षा क्षेत्र में नई तकनीक का विकास देश की सुरक्षा जरूरतों के साथ घरेलू विनिर्माण और तकनीकी क्षमता को भी मजबूत कर सकता है।
समुद्री क्षेत्र को लेकर भी बैठक में लंबी चर्चा हुई। भारत की लंबी समुद्री सीमा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में समुद्री परिवहन की भूमिका को देखते हुए पोर्ट और शिपिंग सेक्टर को आगे बढ़ाने की जरूरत बताई गई। प्रधानमंत्री ने मैरिटाइम सेक्टर को केवल बंदरगाहों के निर्माण तक सीमित न रखने की बात कही। समुद्री कारोबार, लॉजिस्टिक्स, जहाज निर्माण, कौशल विकास और तटीय क्षेत्रों के आर्थिक विकास को एक साथ देखने पर जोर दिया गया। इस क्षेत्र में आगे की जरूरतों का अनुमान लगाकर व्यापक रणनीति बनाने की बात अधिकारियों के सामने रखी गई।
शिपबिल्डिंग को लेकर भी सरकार के स्तर पर किए जा रहे काम की समीक्षा की गई। जहाज निर्माण को इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा मिलने के बाद अब यह देखना जरूरी बताया गया कि इसका लाभ जमीन पर कितना दिखाई दे रहा है। देश में बड़े और आधुनिक जहाज बनाने की क्षमता बढ़ाने, निजी निवेश आकर्षित करने और इस क्षेत्र में तकनीकी कौशल विकसित करने की जरूरत पर चर्चा हुई। जहाज निर्माण से जुड़े उद्योगों के बढ़ने का असर रोजगार और दूसरे सहायक उद्योगों पर भी पड़ सकता है। इसी कारण इस सेक्टर को केवल एक औद्योगिक गतिविधि के बजाय व्यापक आर्थिक ढांचे का हिस्सा मानकर आगे बढ़ाने की बात कही गई।
पोर्ट को लेकर प्रधानमंत्री का जोर सिर्फ नए बंदरगाह बनाने पर नहीं, बल्कि उनके आसपास आर्थिक गतिविधियां विकसित करने पर रहा। ‘पोर्ट-लेड डेवलपमेंट’ के तहत बंदरगाहों को उद्योग, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और स्थानीय रोजगार से जोड़ने की दिशा में काम करने की जरूरत बताई गई। इसी के साथ मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट यूनिट्स तक बेहतर कनेक्टिविटी पहुंचाने पर भी ध्यान दिया गया। उत्पादन केंद्रों से माल को बंदरगाह, बाजार या निर्यात केंद्र तक पहुंचाने में कम समय और कम लागत लगे, इसके लिए परिवहन नेटवर्क में तालमेल जरूरी है। सचिवों के साथ बैठक में इन क्षेत्रों में मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय और काम की नियमित समीक्षा को लेकर भी चर्चा हुई।
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