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सुप्रीम कोर्ट ने SIR को माना वैध, कहा- EC अपने अधिकार क्षेत्र में काम कर रहा
नेशनल डेस्क
बिहार समेत कई राज्यों में वोटर लिस्ट पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, विपक्षी दलों की याचिकाओं पर फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) की ओर से कराए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि इसे सिर्फ इसलिए गैरकानूनी नहीं माना जा सकता क्योंकि यह सामान्य प्रक्रिया से अलग है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया ऐसा नहीं कहा जा सकता कि चुनाव आयोग ने अपने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों से बाहर जाकर यह प्रक्रिया शुरू की है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी बिहार सहित कई राज्यों में चल रही SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आई। इस मामले में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) समेत कई संगठनों और विपक्षी नेताओं ने याचिकाएं दायर की थीं।
याचिकाकर्ताओं में आरजेडी सांसद मनोज झा, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल, सांसद पप्पू यादव और आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह समेत कई नेता शामिल हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया को चुनौती देते हुए आरोप लगाया था कि SIR के जरिए बड़ी संख्या में लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए।
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी बिहार में चल रही SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। हालांकि कोर्ट ने यह जरूर कहा था कि वह बाद में यह तय करेगा कि चुनाव आयोग को इस तरह का विशेष पुनरीक्षण अभियान चलाने का अधिकार है या नहीं। अब कोर्ट ने साफ संकेत दिए हैं कि आयोग के अधिकार क्षेत्र को लेकर तत्काल कोई असंवैधानिकता नहीं दिखती। कोर्ट के फैसला सुरक्षित रखने के बाद बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। वहीं उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और अन्य राज्यों में यह अभी जारी है।
चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग ने अदालत में SIR का बचाव करते हुए कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना उसका संवैधानिक दायित्व है। आयोग के अनुसार मतदाता सूची को अपडेट रखना और फर्जी या दोहराए गए नाम हटाना जरूरी प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि SIR के दौरान केवल चुनावी उद्देश्यों के लिए मतदाताओं का सत्यापन किया जा रहा है। यह प्रक्रिया किसी की कानूनी नागरिकता तय करने के लिए नहीं है। आयोग ने कहा कि मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट नामों को हटाना जरूरी था ताकि चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष बनी रहे।
बिहार में क्या हुआ
बिहार में SIR प्रक्रिया 24 जून 2025 को शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य फर्जी, दोहराए गए और स्थानांतरित मतदाताओं की पहचान कर मतदाता सूची को अपडेट करना था। निर्वाचन आयोग ने 1 अक्टूबर 2025 को बिहार की फाइनल वोटर लिस्ट जारी की थी। इसके बाद राज्य में मतदाताओं की संख्या लगभग 6 प्रतिशत घटकर 7.42 करोड़ रह गई। अंतिम सूची से 69.29 लाख नाम हटाए गए, जबकि 21.53 लाख नए मतदाताओं को जोड़ा गया। आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 22.34 लाख मतदाता मृत पाए गए। करीब 36.44 लाख लोग दूसरे स्थानों पर शिफ्ट हो चुके थे, जबकि 6.85 लाख लोगों के नाम दो जगह दर्ज मिले। फाइनल सूची में पटना जिले में मतदाताओं की संख्या बढ़ी, जबकि सारण जिले में बड़ी संख्या में नाम हटे। इससे SIR प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई।
आधार को लेकर भी निर्देश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि आधार पहचान का दस्तावेज है, नागरिकता का नहीं। इसके बाद आयोग को निर्देश दिया गया कि आधार को भी मतदाता सत्यापन के लिए मान्य दस्तावेजों की सूची में शामिल किया जाए। पहले बिहार SIR में 11 दस्तावेज मान्य थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद आधार को 12वें दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया गया।
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सुप्रीम कोर्ट ने SIR को माना वैध, कहा- EC अपने अधिकार क्षेत्र में काम कर रहा
नेशनल डेस्क
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) की ओर से कराए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि इसे सिर्फ इसलिए गैरकानूनी नहीं माना जा सकता क्योंकि यह सामान्य प्रक्रिया से अलग है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया ऐसा नहीं कहा जा सकता कि चुनाव आयोग ने अपने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों से बाहर जाकर यह प्रक्रिया शुरू की है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी बिहार सहित कई राज्यों में चल रही SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आई। इस मामले में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) समेत कई संगठनों और विपक्षी नेताओं ने याचिकाएं दायर की थीं।
याचिकाकर्ताओं में आरजेडी सांसद मनोज झा, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल, सांसद पप्पू यादव और आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह समेत कई नेता शामिल हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया को चुनौती देते हुए आरोप लगाया था कि SIR के जरिए बड़ी संख्या में लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए।
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी बिहार में चल रही SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। हालांकि कोर्ट ने यह जरूर कहा था कि वह बाद में यह तय करेगा कि चुनाव आयोग को इस तरह का विशेष पुनरीक्षण अभियान चलाने का अधिकार है या नहीं। अब कोर्ट ने साफ संकेत दिए हैं कि आयोग के अधिकार क्षेत्र को लेकर तत्काल कोई असंवैधानिकता नहीं दिखती। कोर्ट के फैसला सुरक्षित रखने के बाद बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। वहीं उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और अन्य राज्यों में यह अभी जारी है।
चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग ने अदालत में SIR का बचाव करते हुए कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना उसका संवैधानिक दायित्व है। आयोग के अनुसार मतदाता सूची को अपडेट रखना और फर्जी या दोहराए गए नाम हटाना जरूरी प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि SIR के दौरान केवल चुनावी उद्देश्यों के लिए मतदाताओं का सत्यापन किया जा रहा है। यह प्रक्रिया किसी की कानूनी नागरिकता तय करने के लिए नहीं है। आयोग ने कहा कि मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट नामों को हटाना जरूरी था ताकि चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष बनी रहे।
बिहार में क्या हुआ
बिहार में SIR प्रक्रिया 24 जून 2025 को शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य फर्जी, दोहराए गए और स्थानांतरित मतदाताओं की पहचान कर मतदाता सूची को अपडेट करना था। निर्वाचन आयोग ने 1 अक्टूबर 2025 को बिहार की फाइनल वोटर लिस्ट जारी की थी। इसके बाद राज्य में मतदाताओं की संख्या लगभग 6 प्रतिशत घटकर 7.42 करोड़ रह गई। अंतिम सूची से 69.29 लाख नाम हटाए गए, जबकि 21.53 लाख नए मतदाताओं को जोड़ा गया। आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 22.34 लाख मतदाता मृत पाए गए। करीब 36.44 लाख लोग दूसरे स्थानों पर शिफ्ट हो चुके थे, जबकि 6.85 लाख लोगों के नाम दो जगह दर्ज मिले। फाइनल सूची में पटना जिले में मतदाताओं की संख्या बढ़ी, जबकि सारण जिले में बड़ी संख्या में नाम हटे। इससे SIR प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई।
आधार को लेकर भी निर्देश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि आधार पहचान का दस्तावेज है, नागरिकता का नहीं। इसके बाद आयोग को निर्देश दिया गया कि आधार को भी मतदाता सत्यापन के लिए मान्य दस्तावेजों की सूची में शामिल किया जाए। पहले बिहार SIR में 11 दस्तावेज मान्य थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद आधार को 12वें दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया गया।
