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अनुपम खेर ने विरोध प्रदर्शनों में अभद्र भाषा पर जताई आपत्ति, बोले- लोकतंत्र में असहमति जरूरी, लेकिन मर्यादा भी उतनी ही आवश्यक
बालीवुड न्यूज़
प्रधानमंत्री के लिए इस्तेमाल हुई आपत्तिजनक भाषा पर जताई नाराजगी, कहा- विचारों का संघर्ष हो सकता है, शब्दों का पतन नहीं होना चाहिए
स्टूडेंट प्रोटेस्ट समाप्त होने के बाद वरिष्ठ अभिनेता अनुपम खेर ने आंदोलन के दौरान इस्तेमाल की गई भाषा को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक वीडियो में उन्होंने लोकतंत्र में असहमति और विरोध के अधिकार का समर्थन करते हुए कहा कि किसी भी मुद्दे पर सवाल पूछना और सरकार से जवाब मांगना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन विरोध के दौरान भाषा की मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति या संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग समाज के लिए उचित संदेश नहीं देता।
अनुपम खेर ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो साझा किया। इसके साथ लिखे संदेश में उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता की आवाज है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी भाषा और अभिव्यक्ति की गरिमा में होती है। उन्होंने लिखा कि मतभेद होना स्वाभाविक है और सरकारों से सवाल पूछना लोकतंत्र का मूल अधिकार है, लेकिन यदि भाषा की मर्यादा समाप्त हो जाती है तो विचारों की ताकत भी कमजोर पड़ जाती है।
वीडियो में अभिनेता ने कहा कि आंदोलन समाप्त होने के बाद कई बातें स्पष्ट हुई हैं और यह भी सामने आया कि जब छात्र अपनी बात शांतिपूर्ण और ईमानदारी से रखते हैं तो लोकतांत्रिक व्यवस्था उन्हें सुनती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि पूरे आंदोलन के दौरान एक बात ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से काफी दुख पहुंचाया और वह थी देश के प्रधानमंत्री के लिए सार्वजनिक मंचों से इस्तेमाल की गई कथित अपमानजनक भाषा।
अनुपम खेर ने कहा कि यह केवल किसी एक व्यक्ति का मामला नहीं है, बल्कि उस सामाजिक संस्कृति का प्रश्न है जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाएगा। उन्होंने कहा कि किसी भी नेता की नीतियों से असहमति व्यक्त की जा सकती है, उनकी आलोचना की जा सकती है और उनसे सवाल भी पूछे जा सकते हैं, लेकिन जब तर्क समाप्त होकर अपशब्दों का स्थान ले लेते हैं तो स्वस्थ बहस की जगह केवल शोर रह जाता है।
उन्होंने अपने संदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लंबे सार्वजनिक जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले कई दशकों से वे सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं और देश की जनता ने उन्हें कई बार अपना जनादेश दिया है। अभिनेता ने कहा कि किसी भी नागरिक के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह हर निर्णय से सहमत हो, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित पदों की गरिमा का सम्मान किया जाना चाहिए।
अनुपम खेर ने आगे कहा कि उन्हें विरोध से कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि चिंता इस बात की है कि विरोध की भाषा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। उनके अनुसार यह केवल युवाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विभिन्न आयु वर्ग के लोग भी सार्वजनिक विमर्श में मर्यादा का पालन नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब बड़े लोग ही संयमित भाषा का प्रयोग नहीं करेंगे तो नई पीढ़ी से बेहतर व्यवहार की अपेक्षा करना कठिन होगा।
उन्होंने लोगों से अपील की कि लोकतंत्र में सवाल अवश्य पूछें, लेकिन अपनी भाषा को इतना कमजोर न होने दें कि वह विचारों से पहले व्यक्ति के चरित्र का परिचय देने लगे। उनके अनुसार किसी भी देश की पहचान केवल उसके विकास से नहीं बल्कि उसके नागरिकों के संवाद और व्यवहार से भी होती है।
दूसरी ओर, छात्र आंदोलन को लेकर फिल्म और मनोरंजन जगत की कई हस्तियों ने भी अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दीं। कई कलाकारों ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार, छात्रों की आवाज सुने जाने और लोकतांत्रिक संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया। कुछ कलाकारों ने सोशल मीडिया के माध्यम से छात्रों को बधाई दी, जबकि कई ने आंदोलन के दौरान सार्वजनिक रूप से अपना समर्थन भी व्यक्त किया।
मनोरंजन जगत से जुड़े कई कलाकारों ने इस घटनाक्रम को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की आवश्यकता पर अपने विचार साझा किए। विभिन्न कलाकारों ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए युवाओं के शांतिपूर्ण प्रयासों की सराहना की और भविष्य में शिक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाने की उम्मीद जताई।
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अनुपम खेर ने विरोध प्रदर्शनों में अभद्र भाषा पर जताई आपत्ति, बोले- लोकतंत्र में असहमति जरूरी, लेकिन मर्यादा भी उतनी ही आवश्यक
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स्टूडेंट प्रोटेस्ट समाप्त होने के बाद वरिष्ठ अभिनेता अनुपम खेर ने आंदोलन के दौरान इस्तेमाल की गई भाषा को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक वीडियो में उन्होंने लोकतंत्र में असहमति और विरोध के अधिकार का समर्थन करते हुए कहा कि किसी भी मुद्दे पर सवाल पूछना और सरकार से जवाब मांगना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन विरोध के दौरान भाषा की मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति या संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग समाज के लिए उचित संदेश नहीं देता।
अनुपम खेर ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो साझा किया। इसके साथ लिखे संदेश में उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता की आवाज है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी भाषा और अभिव्यक्ति की गरिमा में होती है। उन्होंने लिखा कि मतभेद होना स्वाभाविक है और सरकारों से सवाल पूछना लोकतंत्र का मूल अधिकार है, लेकिन यदि भाषा की मर्यादा समाप्त हो जाती है तो विचारों की ताकत भी कमजोर पड़ जाती है।
वीडियो में अभिनेता ने कहा कि आंदोलन समाप्त होने के बाद कई बातें स्पष्ट हुई हैं और यह भी सामने आया कि जब छात्र अपनी बात शांतिपूर्ण और ईमानदारी से रखते हैं तो लोकतांत्रिक व्यवस्था उन्हें सुनती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि पूरे आंदोलन के दौरान एक बात ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से काफी दुख पहुंचाया और वह थी देश के प्रधानमंत्री के लिए सार्वजनिक मंचों से इस्तेमाल की गई कथित अपमानजनक भाषा।
अनुपम खेर ने कहा कि यह केवल किसी एक व्यक्ति का मामला नहीं है, बल्कि उस सामाजिक संस्कृति का प्रश्न है जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाएगा। उन्होंने कहा कि किसी भी नेता की नीतियों से असहमति व्यक्त की जा सकती है, उनकी आलोचना की जा सकती है और उनसे सवाल भी पूछे जा सकते हैं, लेकिन जब तर्क समाप्त होकर अपशब्दों का स्थान ले लेते हैं तो स्वस्थ बहस की जगह केवल शोर रह जाता है।
उन्होंने अपने संदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लंबे सार्वजनिक जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले कई दशकों से वे सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं और देश की जनता ने उन्हें कई बार अपना जनादेश दिया है। अभिनेता ने कहा कि किसी भी नागरिक के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह हर निर्णय से सहमत हो, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित पदों की गरिमा का सम्मान किया जाना चाहिए।
अनुपम खेर ने आगे कहा कि उन्हें विरोध से कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि चिंता इस बात की है कि विरोध की भाषा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। उनके अनुसार यह केवल युवाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विभिन्न आयु वर्ग के लोग भी सार्वजनिक विमर्श में मर्यादा का पालन नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब बड़े लोग ही संयमित भाषा का प्रयोग नहीं करेंगे तो नई पीढ़ी से बेहतर व्यवहार की अपेक्षा करना कठिन होगा।
उन्होंने लोगों से अपील की कि लोकतंत्र में सवाल अवश्य पूछें, लेकिन अपनी भाषा को इतना कमजोर न होने दें कि वह विचारों से पहले व्यक्ति के चरित्र का परिचय देने लगे। उनके अनुसार किसी भी देश की पहचान केवल उसके विकास से नहीं बल्कि उसके नागरिकों के संवाद और व्यवहार से भी होती है।
दूसरी ओर, छात्र आंदोलन को लेकर फिल्म और मनोरंजन जगत की कई हस्तियों ने भी अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दीं। कई कलाकारों ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार, छात्रों की आवाज सुने जाने और लोकतांत्रिक संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया। कुछ कलाकारों ने सोशल मीडिया के माध्यम से छात्रों को बधाई दी, जबकि कई ने आंदोलन के दौरान सार्वजनिक रूप से अपना समर्थन भी व्यक्त किया।
मनोरंजन जगत से जुड़े कई कलाकारों ने इस घटनाक्रम को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की आवश्यकता पर अपने विचार साझा किए। विभिन्न कलाकारों ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए युवाओं के शांतिपूर्ण प्रयासों की सराहना की और भविष्य में शिक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाने की उम्मीद जताई।
