फिल्म ‘हाय जिंदगी’ का मुद्दा पहुंचा अदालत: बलात्कार कानून को ‘जेंडर न्यूट्रल’ बनाने की मांग पर दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका

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14 नवंबर को रिलीज होने जा रही फिल्म ‘हाय जिंदगी’ ने पुरुषों की सुरक्षा पर उठाया सवाल; बीएनएस धारा 63 में संशोधन की मांग को लेकर दाखिल हुई PIL, कोर्ट ने UOI से मांगा जवाब

 आगामी फिल्म ‘हाय जिंदगी’ में उठाए गए संवेदनशील मुद्दे ने अब कानूनी बहस का रूप ले लिया है। दिल्ली उच्च न्यायालय में बलात्कार से संबंधित प्रावधान को ‘जेंडर न्यूट्रल’ (लैंगिक रूप से तटस्थ) बनाने की मांग पर एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है। यह वही विषय है, जिस पर 14 नवंबर को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली फिल्म ‘हाय जिंदगी’ केंद्रित है।

बीएनएस धारा 63 पर सवाल

याचिका में कहा गया है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63, जो बलात्कार से संबंधित प्रावधान को परिभाषित करती है, केवल महिलाओं को पीड़िता मानती है। जबकि आज के समय में पुरुष और ट्रांसजेंडर समुदाय भी यौन हिंसा के शिकार हो सकते हैं। इस कानून में केवल महिला को ‘विक्टिम’ के रूप में शामिल करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन बताया गया है।

यह याचिका 29 अक्टूबर 2025 को सूचीबद्ध हुई थी। माननीय मुख्य न्यायाधीश ने इसे W.P. (CRL) 3274/2025 से जोड़ने का आदेश दिया, जिसमें पहले से ट्रांसजेंडर्स के संदर्भ में इसी विषय पर सुनवाई चल रही है। अदालत ने Union of India (UOI) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

फिल्म ‘हाय जिंदगी’ ने भी उठाया मुद्दा

सी. आर. फिल्म्स और सुनील अग्रवाल फिल्म्स के बैनर तले बनी फिल्म ‘हाय जिंदगी’ का कथानक भी इसी कानूनी असमानता पर केंद्रित है। फिल्म के निर्माता सुनील कुमार अग्रवाल और निर्देशक अजय राम ने इसमें दिखाया है कि कैसे एक पुरुष भी महिलाओं द्वारा बलात्कार या यौन उत्पीड़न का शिकार हो सकता है, लेकिन वर्तमान कानून में उसके लिए कोई न्यायिक उपाय उपलब्ध नहीं है।

निर्माताओं का कहना है कि समाज में यह धारणा बन चुकी है कि केवल पुरुष ही अपराधी और महिला ही पीड़िता हो सकती है, जबकि बदलते समय में यह दृष्टिकोण समानता और न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में भी उठ चुका है विषय

गौरतलब है कि इस विषय पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश यू.यू. ललित ने भी सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में कहा था कि "बलात्कार कानून को लैंगिक रूप से तटस्थ बनाए जाने की आवश्यकता पर गंभीर विचार होना चाहिए।"

न्यायिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से अहम मामला

‘हाय जिंदगी’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि यह कानूनी और सामाजिक विमर्श की नई दिशा की शुरुआत मानी जा रही है। फिल्म यह संदेश देती है कि “पीड़ा का कोई लिंग नहीं होता” और न्याय व्यवस्था को इस वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए।

फिल्म की शूटिंग उत्तर प्रदेश के मथुरा में हुई है, और इसमें गौरव सिंह, गरिमा सिंह, आयुषी तिवारी, सोमी श्री, दीपांशी और ऋषभ शर्मा जैसे कलाकारों ने अभिनय किया है।

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www.dainikjagranmpcg.com
07 Nov 2025 By दैनिक जागरण

फिल्म ‘हाय जिंदगी’ का मुद्दा पहुंचा अदालत: बलात्कार कानून को ‘जेंडर न्यूट्रल’ बनाने की मांग पर दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका

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 आगामी फिल्म ‘हाय जिंदगी’ में उठाए गए संवेदनशील मुद्दे ने अब कानूनी बहस का रूप ले लिया है। दिल्ली उच्च न्यायालय में बलात्कार से संबंधित प्रावधान को ‘जेंडर न्यूट्रल’ (लैंगिक रूप से तटस्थ) बनाने की मांग पर एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है। यह वही विषय है, जिस पर 14 नवंबर को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली फिल्म ‘हाय जिंदगी’ केंद्रित है।

बीएनएस धारा 63 पर सवाल

याचिका में कहा गया है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63, जो बलात्कार से संबंधित प्रावधान को परिभाषित करती है, केवल महिलाओं को पीड़िता मानती है। जबकि आज के समय में पुरुष और ट्रांसजेंडर समुदाय भी यौन हिंसा के शिकार हो सकते हैं। इस कानून में केवल महिला को ‘विक्टिम’ के रूप में शामिल करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन बताया गया है।

यह याचिका 29 अक्टूबर 2025 को सूचीबद्ध हुई थी। माननीय मुख्य न्यायाधीश ने इसे W.P. (CRL) 3274/2025 से जोड़ने का आदेश दिया, जिसमें पहले से ट्रांसजेंडर्स के संदर्भ में इसी विषय पर सुनवाई चल रही है। अदालत ने Union of India (UOI) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

फिल्म ‘हाय जिंदगी’ ने भी उठाया मुद्दा

सी. आर. फिल्म्स और सुनील अग्रवाल फिल्म्स के बैनर तले बनी फिल्म ‘हाय जिंदगी’ का कथानक भी इसी कानूनी असमानता पर केंद्रित है। फिल्म के निर्माता सुनील कुमार अग्रवाल और निर्देशक अजय राम ने इसमें दिखाया है कि कैसे एक पुरुष भी महिलाओं द्वारा बलात्कार या यौन उत्पीड़न का शिकार हो सकता है, लेकिन वर्तमान कानून में उसके लिए कोई न्यायिक उपाय उपलब्ध नहीं है।

निर्माताओं का कहना है कि समाज में यह धारणा बन चुकी है कि केवल पुरुष ही अपराधी और महिला ही पीड़िता हो सकती है, जबकि बदलते समय में यह दृष्टिकोण समानता और न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में भी उठ चुका है विषय

गौरतलब है कि इस विषय पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश यू.यू. ललित ने भी सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में कहा था कि "बलात्कार कानून को लैंगिक रूप से तटस्थ बनाए जाने की आवश्यकता पर गंभीर विचार होना चाहिए।"

न्यायिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से अहम मामला

‘हाय जिंदगी’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि यह कानूनी और सामाजिक विमर्श की नई दिशा की शुरुआत मानी जा रही है। फिल्म यह संदेश देती है कि “पीड़ा का कोई लिंग नहीं होता” और न्याय व्यवस्था को इस वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए।

फिल्म की शूटिंग उत्तर प्रदेश के मथुरा में हुई है, और इसमें गौरव सिंह, गरिमा सिंह, आयुषी तिवारी, सोमी श्री, दीपांशी और ऋषभ शर्मा जैसे कलाकारों ने अभिनय किया है।

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