जीडीपी तेज, रुपया कमजोर: RBI नीति का इंतजार बढ़ा; EMI घटेगी या नहीं, कुछ देर में होगा फैसला

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तेज GDP ग्रोथ, गिरती महंगाई और कमजोर रुपये के बीच MPC की बैठक निर्णायक; रेपो रेट 5.5% पर रहेगा या कटेगा—बाजार, उद्योग और उपभोक्ताओं की निगाहें नीति घोषणा पर।

भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़े मिले-जुले संकेतों के बीच भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की घोषणा का इंतज़ार बढ़ गया है। वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में देश की GDP ग्रोथ 8.2% दर्ज की गई है, जो अनुमान से काफी बेहतर है। वहीं अक्टूबर की खुदरा महंगाई 0.25% तक फिसल गई—यह कई वर्षों के सबसे निचले स्तरों में से एक है। इन सकारात्मक संकेतों के बीच रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पूंजी निकालते जा रहे हैं, जिससे नीति-निर्माताओं के सामने एक जटिल स्थिति खड़ी हो गई है।


नीतिगत घोषणा से पहले माहौल

RBI की तीन दिवसीय MPC बैठक 3 दिसंबर को शुरू हुई थी। गवर्नर संजय मल्होत्रा आज दरों और मौद्रिक स्थिति पर फैसला सुनाएंगे। वर्तमान में रेपो रेट 5.5% है। यदि दरों में कटौती होती है, तो होम लोन से लेकर ऑटो और पर्सनल लोन तक—सभी EMI पर सीधा असर पड़ेगा।

लेकिन यहीं पर तस्वीर जटिल होती है। अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग मानता है कि इतनी तेज GDP ग्रोथ के बीच दरों में कटौती उपयुक्त नहीं होगी। उनका कहना है कि आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार पहले से सुधरी है और ऐसे वक्त में नरम मौद्रिक नीति बाज़ार में अनावश्यक तरलता बढ़ा सकती है।

इसके विपरीत, महंगाई का ऐतिहासिक रूप से नीचे आना दरों में नरमी की संभावना को मजबूत करता है। उपभोक्ता स्तर पर कीमतों में आई स्थिरता ने नीति निर्माताओं को राहत दी है।


महंगाई नरम, रुपया दबाव में

खाद्य वस्तुओं की कीमतों में कमी के चलते अक्टूबर की महंगाई 0.25% तक सीमित रही। विश्लेषकों का अनुमान है कि आने वाले महीनों में भी कीमतों का दबाव कम रहेगा और महंगाई आरबीआई के लक्ष्य दायरे में बनी रह सकती है।

इसके समानांतर, रुपया अब भी कमजोरी से जूझ रहा है। डॉलर के मुकाबले लगातार फिसलन और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) की निकासी ने मुद्रा बाज़ार को दबाव में रखा है। यही कमजोर कड़ी नीतिगत विकल्पों को और कठिन बनाती है।

CareEdge Ratings के MD और ग्रुप CEO मेहुल पंड्या का कहना है, “तेज GDP ग्रोथ और गिरती महंगाई दोनों ही अलग दिशाओं में संकेत दे रहे हैं। मजबूत आर्थिक गतिविधि के साथ दरों में कटौती का चलन नहीं होता, लेकिन इतनी कम महंगाई इस पर विचार करने की गुंजाइश देती है।”


आगे क्या?

मनीबॉक्स फाइनेंस लिमिटेड के सह-संस्थापक मयूर मोदी का मत है कि “मजबूत वृद्धि RBI को अधिक नीति-स्वतंत्रता देती है। महंगाई लक्ष्य सीमा में हो, तो दरों में राहत की संभावना बढ़ती है।”

हालांकि बैंक ऑफ बड़ौदा की रिपोर्ट सावधानी की ओर संकेत करती है। रिपोर्ट के अनुसार रेपो रेट को मौजूदा स्तर पर बरकरार रखा जा सकता है, क्योंकि शहरी खपत, ग्रामीण मांग और निजी निवेश में सुधार तीसरी तिमाही में भी अर्थव्यवस्था को आधार दे सकते हैं।

अब बाज़ार, उद्योग, बैंकें और आम उपभोक्ता—सभी इस फैसले का इंतज़ार कर रहे हैं कि क्या आज EMI में राहत मिलेगी या फिलहाल स्थितियां जस की तस रहेंगी।

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www.dainikjagranmpcg.com
05 Dec 2025 By Nitin Trivedi

जीडीपी तेज, रुपया कमजोर: RBI नीति का इंतजार बढ़ा; EMI घटेगी या नहीं, कुछ देर में होगा फैसला

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भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़े मिले-जुले संकेतों के बीच भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की घोषणा का इंतज़ार बढ़ गया है। वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में देश की GDP ग्रोथ 8.2% दर्ज की गई है, जो अनुमान से काफी बेहतर है। वहीं अक्टूबर की खुदरा महंगाई 0.25% तक फिसल गई—यह कई वर्षों के सबसे निचले स्तरों में से एक है। इन सकारात्मक संकेतों के बीच रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पूंजी निकालते जा रहे हैं, जिससे नीति-निर्माताओं के सामने एक जटिल स्थिति खड़ी हो गई है।


नीतिगत घोषणा से पहले माहौल

RBI की तीन दिवसीय MPC बैठक 3 दिसंबर को शुरू हुई थी। गवर्नर संजय मल्होत्रा आज दरों और मौद्रिक स्थिति पर फैसला सुनाएंगे। वर्तमान में रेपो रेट 5.5% है। यदि दरों में कटौती होती है, तो होम लोन से लेकर ऑटो और पर्सनल लोन तक—सभी EMI पर सीधा असर पड़ेगा।

लेकिन यहीं पर तस्वीर जटिल होती है। अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग मानता है कि इतनी तेज GDP ग्रोथ के बीच दरों में कटौती उपयुक्त नहीं होगी। उनका कहना है कि आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार पहले से सुधरी है और ऐसे वक्त में नरम मौद्रिक नीति बाज़ार में अनावश्यक तरलता बढ़ा सकती है।

इसके विपरीत, महंगाई का ऐतिहासिक रूप से नीचे आना दरों में नरमी की संभावना को मजबूत करता है। उपभोक्ता स्तर पर कीमतों में आई स्थिरता ने नीति निर्माताओं को राहत दी है।


महंगाई नरम, रुपया दबाव में

खाद्य वस्तुओं की कीमतों में कमी के चलते अक्टूबर की महंगाई 0.25% तक सीमित रही। विश्लेषकों का अनुमान है कि आने वाले महीनों में भी कीमतों का दबाव कम रहेगा और महंगाई आरबीआई के लक्ष्य दायरे में बनी रह सकती है।

इसके समानांतर, रुपया अब भी कमजोरी से जूझ रहा है। डॉलर के मुकाबले लगातार फिसलन और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) की निकासी ने मुद्रा बाज़ार को दबाव में रखा है। यही कमजोर कड़ी नीतिगत विकल्पों को और कठिन बनाती है।

CareEdge Ratings के MD और ग्रुप CEO मेहुल पंड्या का कहना है, “तेज GDP ग्रोथ और गिरती महंगाई दोनों ही अलग दिशाओं में संकेत दे रहे हैं। मजबूत आर्थिक गतिविधि के साथ दरों में कटौती का चलन नहीं होता, लेकिन इतनी कम महंगाई इस पर विचार करने की गुंजाइश देती है।”


आगे क्या?

मनीबॉक्स फाइनेंस लिमिटेड के सह-संस्थापक मयूर मोदी का मत है कि “मजबूत वृद्धि RBI को अधिक नीति-स्वतंत्रता देती है। महंगाई लक्ष्य सीमा में हो, तो दरों में राहत की संभावना बढ़ती है।”

हालांकि बैंक ऑफ बड़ौदा की रिपोर्ट सावधानी की ओर संकेत करती है। रिपोर्ट के अनुसार रेपो रेट को मौजूदा स्तर पर बरकरार रखा जा सकता है, क्योंकि शहरी खपत, ग्रामीण मांग और निजी निवेश में सुधार तीसरी तिमाही में भी अर्थव्यवस्था को आधार दे सकते हैं।

अब बाज़ार, उद्योग, बैंकें और आम उपभोक्ता—सभी इस फैसले का इंतज़ार कर रहे हैं कि क्या आज EMI में राहत मिलेगी या फिलहाल स्थितियां जस की तस रहेंगी।

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