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एथेनॉल ब्लेंडिंग से पेट्रोल हुआ सस्ता, सरकार का दावा- प्रति लीटर करीब 30 रुपये की बचत
बिजनेस डेस्क
पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा- यदि एथेनॉल मिश्रण नहीं होता तो दिल्ली में पेट्रोल 125 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकता था, E20 ईंधन से कीमतों पर पड़ा सकारात्मक असर।
देश में पेट्रोल की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित रखने में एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। केंद्र सरकार का दावा है कि यदि पेट्रोल में एथेनॉल का मिश्रण नहीं किया गया होता, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ता और दिल्ली में पेट्रोल की कीमत लगभग 125 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती थी। सरकार के अनुसार, एथेनॉल मिश्रण की वजह से उपभोक्ताओं को प्रति लीटर करीब 30 रुपये तक की राहत मिली।
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने शुक्रवार को एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को लेकर उठ रहे विभिन्न सवालों पर विस्तृत जानकारी जारी की। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि इस योजना का उद्देश्य केवल पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना ही नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं को महंगे ईंधन से राहत देना और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना भी है।
मंत्रालय के अनुसार, जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 135 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं, तब भी भारत में पेट्रोल की खुदरा कीमतों को पूरी तरह उसी अनुपात में नहीं बढ़ाना पड़ा। इसकी प्रमुख वजह यह रही कि देश में पहले से तय कीमतों पर खरीदे गए एथेनॉल को पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक मिलाया जा रहा था। इससे आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कुछ हद तक कम हुई और खुदरा कीमतों पर नियंत्रण बनाए रखने में मदद मिली।
फिलहाल राजधानी दिल्ली में E20 पेट्रोल की कीमत लगभग 102 रुपये प्रति लीटर के आसपास है। सरकार का कहना है कि यदि एथेनॉल मिश्रण की व्यवस्था नहीं होती तो यही कीमत करीब 125 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती थी। इससे आम उपभोक्ताओं, परिवहन क्षेत्र और व्यवसायों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता।
सरकार ने यह भी बताया कि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के दौरान करीब ढाई महीने तक पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखा गया था। बाद में परिस्थितियों के अनुसार सीमित बढ़ोतरी की गई, लेकिन एथेनॉल ब्लेंडिंग के कारण कीमतों में अत्यधिक उछाल से बचाव संभव हो सका।
एथेनॉल कार्यक्रम को लेकर यह आरोप भी लगाए जाते रहे हैं कि इसके लिए गरीबों के हिस्से का अनाज या भारतीय खाद्य निगम (FCI) का सब्सिडी वाला चावल उपयोग किया जा रहा है। इन आरोपों पर मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस योजना के लिए एफसीआई के सार्वजनिक वितरण प्रणाली वाले चावल का इस्तेमाल नहीं किया जाता। सरकार का कहना है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए निर्धारित स्रोतों और स्वीकृत कच्चे माल का ही उपयोग किया जाता है तथा खाद्य सुरक्षा से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया गया है।
एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के उपयोग को लेकर वाहन चालकों के मन में सबसे बड़ा सवाल माइलेज को लेकर रहता है। इस संबंध में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI), सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन द्वारा किए गए अध्ययन का हवाला दिया है।
अध्ययन के अनुसार, जो वाहन मूल रूप से E10 ईंधन के लिए डिजाइन किए गए थे, उन्हें E20 पेट्रोल पर चलाने से ईंधन दक्षता में लगभग 2 से 6 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। हालांकि यह अंतर वाहन की तकनीक, इंजन की स्थिति और मॉडल पर भी निर्भर करता है। इससे पहले सरकार ने संसद में बताया था कि अधिकांश मामलों में माइलेज में कमी लगभग 3 से 5 प्रतिशत के बीच ही रहती है।
सरकार का कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को बिना वैज्ञानिक परीक्षण के लागू नहीं किया गया। इसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया गया, ताकि वाहन उद्योग, तेल कंपनियां और उपभोक्ता सभी नई व्यवस्था के अनुरूप तैयार हो सकें। इसके लिए इंजन की क्षमता, फ्यूल सिस्टम, ड्राइविंग प्रदर्शन, उत्सर्जन स्तर और विभिन्न तकनीकी पहलुओं का व्यापक परीक्षण किया गया।
सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने भी संसद में जानकारी दी कि E20 ईंधन को लागू करने से पहले देश के प्रमुख वाहन निर्माताओं, तेल विपणन कंपनियों और संबंधित उद्योगों के साथ लगातार विचार-विमर्श किया गया। सभी आवश्यक परीक्षणों और तकनीकी मानकों की पुष्टि के बाद ही इस प्रणाली को लागू किया गया।
सरकार का दावा है कि वर्तमान में देश में 20 करोड़ से अधिक दोपहिया वाहन और 3 करोड़ से ज्यादा पेट्रोल कारें एथेनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग कर रही हैं। अब तक उपलब्ध आंकड़ों और प्रयोगशाला परीक्षणों के आधार पर किसी भी वाहन में केवल एथेनॉल ब्लेंडिंग की वजह से इंजन खराब होने का कोई प्रमाणित मामला सामने नहीं आया है।
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एथेनॉल ब्लेंडिंग से पेट्रोल हुआ सस्ता, सरकार का दावा- प्रति लीटर करीब 30 रुपये की बचत
बिजनेस डेस्क
देश में पेट्रोल की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित रखने में एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। केंद्र सरकार का दावा है कि यदि पेट्रोल में एथेनॉल का मिश्रण नहीं किया गया होता, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ता और दिल्ली में पेट्रोल की कीमत लगभग 125 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती थी। सरकार के अनुसार, एथेनॉल मिश्रण की वजह से उपभोक्ताओं को प्रति लीटर करीब 30 रुपये तक की राहत मिली।
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने शुक्रवार को एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को लेकर उठ रहे विभिन्न सवालों पर विस्तृत जानकारी जारी की। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि इस योजना का उद्देश्य केवल पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना ही नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं को महंगे ईंधन से राहत देना और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना भी है।
मंत्रालय के अनुसार, जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 135 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं, तब भी भारत में पेट्रोल की खुदरा कीमतों को पूरी तरह उसी अनुपात में नहीं बढ़ाना पड़ा। इसकी प्रमुख वजह यह रही कि देश में पहले से तय कीमतों पर खरीदे गए एथेनॉल को पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक मिलाया जा रहा था। इससे आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कुछ हद तक कम हुई और खुदरा कीमतों पर नियंत्रण बनाए रखने में मदद मिली।
फिलहाल राजधानी दिल्ली में E20 पेट्रोल की कीमत लगभग 102 रुपये प्रति लीटर के आसपास है। सरकार का कहना है कि यदि एथेनॉल मिश्रण की व्यवस्था नहीं होती तो यही कीमत करीब 125 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती थी। इससे आम उपभोक्ताओं, परिवहन क्षेत्र और व्यवसायों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता।
सरकार ने यह भी बताया कि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के दौरान करीब ढाई महीने तक पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखा गया था। बाद में परिस्थितियों के अनुसार सीमित बढ़ोतरी की गई, लेकिन एथेनॉल ब्लेंडिंग के कारण कीमतों में अत्यधिक उछाल से बचाव संभव हो सका।
एथेनॉल कार्यक्रम को लेकर यह आरोप भी लगाए जाते रहे हैं कि इसके लिए गरीबों के हिस्से का अनाज या भारतीय खाद्य निगम (FCI) का सब्सिडी वाला चावल उपयोग किया जा रहा है। इन आरोपों पर मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस योजना के लिए एफसीआई के सार्वजनिक वितरण प्रणाली वाले चावल का इस्तेमाल नहीं किया जाता। सरकार का कहना है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए निर्धारित स्रोतों और स्वीकृत कच्चे माल का ही उपयोग किया जाता है तथा खाद्य सुरक्षा से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया गया है।
एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के उपयोग को लेकर वाहन चालकों के मन में सबसे बड़ा सवाल माइलेज को लेकर रहता है। इस संबंध में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI), सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन द्वारा किए गए अध्ययन का हवाला दिया है।
अध्ययन के अनुसार, जो वाहन मूल रूप से E10 ईंधन के लिए डिजाइन किए गए थे, उन्हें E20 पेट्रोल पर चलाने से ईंधन दक्षता में लगभग 2 से 6 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। हालांकि यह अंतर वाहन की तकनीक, इंजन की स्थिति और मॉडल पर भी निर्भर करता है। इससे पहले सरकार ने संसद में बताया था कि अधिकांश मामलों में माइलेज में कमी लगभग 3 से 5 प्रतिशत के बीच ही रहती है।
सरकार का कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को बिना वैज्ञानिक परीक्षण के लागू नहीं किया गया। इसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया गया, ताकि वाहन उद्योग, तेल कंपनियां और उपभोक्ता सभी नई व्यवस्था के अनुरूप तैयार हो सकें। इसके लिए इंजन की क्षमता, फ्यूल सिस्टम, ड्राइविंग प्रदर्शन, उत्सर्जन स्तर और विभिन्न तकनीकी पहलुओं का व्यापक परीक्षण किया गया।
सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने भी संसद में जानकारी दी कि E20 ईंधन को लागू करने से पहले देश के प्रमुख वाहन निर्माताओं, तेल विपणन कंपनियों और संबंधित उद्योगों के साथ लगातार विचार-विमर्श किया गया। सभी आवश्यक परीक्षणों और तकनीकी मानकों की पुष्टि के बाद ही इस प्रणाली को लागू किया गया।
सरकार का दावा है कि वर्तमान में देश में 20 करोड़ से अधिक दोपहिया वाहन और 3 करोड़ से ज्यादा पेट्रोल कारें एथेनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग कर रही हैं। अब तक उपलब्ध आंकड़ों और प्रयोगशाला परीक्षणों के आधार पर किसी भी वाहन में केवल एथेनॉल ब्लेंडिंग की वजह से इंजन खराब होने का कोई प्रमाणित मामला सामने नहीं आया है।
