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चिप्स-सोडा पर लाल चेतावनी लेबल क्यों नहीं लगा? FSSAI और बड़ी कंपनियों के बीच क्या है विवाद
Digital Desk
भारत में ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले पैकेज्ड फूड पर साफ चेतावनी की मांग के बीच लेबलिंग व्यवस्था को लेकर सरकार, उद्योग और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच मतभेद सामने आए हैं
भारत में पैकेज्ड फूड की पैकिंग पर मिलने वाली पोषण संबंधी जानकारी को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। मामला इस बात पर अटका है कि चिप्स, मीठे पेय और दूसरे हाई-शुगर, हाई-सॉल्ट या हाई-फैट उत्पादों पर उपभोक्ताओं को सामने से स्पष्ट चेतावनी दी जाए या सामान्य न्यूट्रिशन टेबल को ही ज्यादा प्रमुख बनाया जाए। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने पहले पैकेट के सामने रंगों के जरिए पोषण संबंधी चेतावनी देने की व्यवस्था पर विचार किया था। लेकिन खाद्य और पेय उद्योग की आपत्तियों के बाद यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका और अब कम प्रमुख ब्लैक एंड व्हाइट न्यूट्रिशन डिक्लेरेशन पर जोर है।
लाल चेतावनी लेबल का विचार क्या था?
फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग यानी FOPL का मकसद यह है कि ग्राहक को पैकेट खोलने या पीछे लिखी लंबी पोषण तालिका पढ़ने से पहले ही उत्पाद की प्रमुख पोषण संबंधी जानकारी मिल जाए। भारत में पहले ऐसे मॉडल पर चर्चा हुई थी, जिसमें ज्यादा चीनी, सैचुरेटेड फैट और सोडियम वाले उत्पादों पर सामने से अलग रंग में जानकारी दिखाई जाती। FSSAI के पुराने प्रस्तावों में पोषण संबंधी जानकारी को पैकेट के फ्रंट पर प्रमुखता से दिखाने की व्यवस्था शामिल रही है। FSSAI के 2022 के ड्राफ्ट में फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबलिंग के तहत ऊर्जा, कुल शुगर, सैचुरेटेड फैट और सोडियम जैसे पोषक तत्वों को ध्यान में रखकर पैकेज्ड फूड का आकलन करने का प्रस्ताव था।
बड़ी कंपनियों की आपत्ति क्या है?
रॉयटर्स के मुताबिक, Coca-Cola, Nestlé और PepsiCo जैसी बड़ी कंपनियों ने प्रस्तावित रंगीन चेतावनी व्यवस्था पर आपत्ति जताई थी। उद्योग की ओर से यह तर्क दिया गया कि केवल पैकेट पर एक चिन्ह लगाने से यह जरूरी नहीं कि ग्राहक अपने खान-पान का व्यवहार बदल देगा। उद्योग से जुड़े पक्षों ने यह सवाल भी उठाया कि अंतरराष्ट्रीय पोषण मॉडल को भारतीय खान-पान पर उसी रूप में लागू करना कितना उपयुक्त होगा। उनका तर्क है कि भारतीय भोजन की विविधता और पारंपरिक खाद्य पदार्थों को देखते हुए लेबलिंग का मॉडल अलग तरीके से तैयार किया जाना चाहिए।
FSSAI का मौजूदा रुख क्या है?
विवाद के बीच FSSAI का जोर ज्यादा प्रमुख पोषण जानकारी देने पर रहा है। 2024 में खाद्य नियामक ने पैकेज्ड फूड पर कुल शुगर, नमक और सैचुरेटेड फैट की जानकारी को बड़े और बोल्ड अक्षरों में दिखाने की दिशा में कदम उठाया था। वहीं, रॉयटर्स के मुताबिक मौजूदा रुख रंगीन चेतावनी के बजाय ब्लैक एंड व्हाइट न्यूट्रिशन टेबल की तरफ है। इसमें ग्राहक को उत्पाद में मौजूद पोषक तत्वों और उनकी अनुशंसित दैनिक मात्रा में हिस्सेदारी के बारे में जानकारी दी जानी है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी उठाया है सवाल
फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। रॉयटर्स के अनुसार, 13 अगस्त की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से इस मुद्दे पर अपना अंतिम फैसला रिकॉर्ड पर रखने को कहा था। अदालत ने उपभोक्ताओं, खासकर बच्चों, को खाद्य उत्पादों के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलने के महत्व पर भी सवाल उठाए। मामले में FSSAI पहले से पक्षकार है। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में भी इस याचिका का संबंध पैकेज्ड फूड पर चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की स्पष्ट फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी की मांग से बताया गया है।
ग्राहक के लिए असली फर्क क्या होगा?
फिलहाल विवाद का सबसे अहम पहलू यही है कि पैकेट खरीदते समय ग्राहक को जरूरी पोषण जानकारी कितनी जल्दी और कितनी आसानी से दिखाई देगी। पीछे दी गई विस्तृत न्यूट्रिशन टेबल में कैलोरी, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कुल शुगर, एडेड शुगर, फैट और सोडियम जैसी जानकारियां होती हैं। FSSAI के मौजूदा लेबलिंग नियमों में पोषण संबंधी जानकारी और प्रति सर्विंग अनुशंसित दैनिक मात्रा में योगदान बताने का प्रावधान है। दूसरी ओर, फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी का उद्देश्य जानकारी को इतना सरल बनाना है कि ग्राहक खरीदारी के दौरान ही समझ सके कि किसी उत्पाद में चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट का स्तर ज्यादा है या नहीं।
भारत में यह बहस क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत में पैकेज्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की खपत बढ़ने के साथ पोषण संबंधी जानकारी को आसान भाषा और स्पष्ट संकेतों में उपलब्ध कराने की मांग भी बढ़ी है। रॉयटर्स ने The Lancet के एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि मौजूदा रुझान जारी रहने पर 2050 तक करीब 45 करोड़ भारतीयों के ओवरवेट या मोटापे से प्रभावित होने का अनुमान है। इसी वजह से फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग केवल पैकेज डिजाइन का मुद्दा नहीं रह गया है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि उपभोक्ता को खरीदारी के समय पोषण संबंधी जोखिम की जानकारी कितनी स्पष्ट तरीके से दी जाए और उस व्यवस्था में सरकार तथा खाद्य उद्योग की भूमिका क्या हो।
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