TMC में सियासी संकट गहराया, बागी गुट आज चुनाव आयोग से करेगा नई कार्यकारिणी को मान्यता देने की मांग

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58 विधायक और 20 सांसदों के समर्थन का दावा करने वाला तृणमूल कांग्रेस का बागी गुट नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी को मान्यता दिलाने के लिए चुनाव आयोग पहुंचेगा।

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी सियासी संकट अब एक नए चरण में प्रवेश कर गया है। पार्टी का बागी गुट गुरुवार को नई दिल्ली में चुनाव आयोग से मुलाकात करेगा और हाल ही में गठित नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी (नेशनल वर्किंग कमेटी) को आधिकारिक मान्यता देने की मांग करेगा। बागी नेताओं का दावा है कि पार्टी के भीतर संगठनात्मक बदलाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत किए गए हैं और उन्हें संवैधानिक मान्यता मिलनी चाहिए। इस घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी हलचल तेज कर दी है। बागी गुट के नेता और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने बताया कि चुनाव आयोग ने प्रतिनिधिमंडल को दोपहर 12 बजे मिलने का समय दिया है। करीब 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल आयोग के सामने उन सभी दस्तावेजों को पेश करेगा, जिनमें नई कार्यकारिणी के गठन और संगठनात्मक बदलावों का उल्लेख है। उनके अनुसार 22 जून को कोलकाता में आयोजित प्रतिनिधि बैठक में पार्टी के नए अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और 30 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन किया गया था। इस बैठक की जानकारी पहले ही चुनाव आयोग को भेजी जा चुकी है और अब उसी के आधार पर औपचारिक मान्यता की मांग की जाएगी।

टीएमसी में यह संकट विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन के बाद खुलकर सामने आया। तीन जून को पार्टी के 80 में से 58 विधायकों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व से अलग होने का फैसला लिया। इसके बाद इन विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना और विधानसभा अध्यक्ष को समर्थन पत्र सौंपते हुए उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाने की मांग की। बाद में इस मांग को मंजूरी भी मिल गई। इसके कुछ दिनों बाद लोकसभा में भी बड़ा घटनाक्रम सामने आया, जब पार्टी के 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने अलग रास्ता अपनाने का फैसला किया। बाद में इन सांसदों ने एक अलग राजनीतिक मंच के साथ विलय का निर्णय लिया, जिससे टीएमसी के भीतर संकट और गहरा गया। बागी गुट का कहना है कि उसके पास पार्टी के दो-तिहाई से अधिक विधायक और सांसदों का समर्थन है। दल-बदल कानून की दसवीं अनुसूची के तहत यदि किसी राजनीतिक दल के दो-तिहाई निर्वाचित सदस्य किसी अलग समूह का समर्थन करते हैं या विलय का फैसला लेते हैं, तो उन्हें कानूनी संरक्षण मिल सकता है। इसी आधार पर बागी गुट खुद को वैध संगठन बताते हुए चुनाव आयोग से नई कार्यकारिणी को मान्यता देने की मांग कर रहा है। हालांकि अंतिम निर्णय चुनाव आयोग, विधानसभा अध्यक्ष और आवश्यक होने पर न्यायपालिका के स्तर पर ही होगा।

यह मामला केवल संगठनात्मक बदलाव तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में पार्टी के नाम, चुनाव चिन्ह और संगठन पर अधिकार को लेकर भी कानूनी लड़ाई तेज हो सकती है। यदि दोनों पक्ष अपने-अपने दावों पर कायम रहते हैं तो मामला उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच सकता है। ऐसे में चुनाव आयोग की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। टीएमसी के भीतर पैदा हुआ यह संकट कई राजनीतिक विश्लेषकों को महाराष्ट्र में शिवसेना में हुई बगावत की याद दिला रहा है। वहां भी बड़ी संख्या में विधायक तत्कालीन नेतृत्व से अलग हो गए थे और बाद में संगठन, चुनाव चिन्ह और वैधता को लेकर लंबी कानूनी प्रक्रिया चली थी। आखिरकार चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष के फैसलों ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे। अब पश्चिम बंगाल में भी कुछ वैसी ही स्थिति बनने की चर्चा तेज हो गई है, हालांकि अंतिम फैसला संवैधानिक संस्थाओं के निर्णय पर निर्भर करेगा।

वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो ममता बनर्जी के पास विधानसभा में केवल 22 विधायक बचे होने का दावा किया जा रहा है, जबकि लोकसभा में भी उनके साथ सांसदों की संख्या काफी कम हो गई है। राज्यसभा में भी कुछ सांसदों के इस्तीफे के बाद उनकी संसदीय ताकत पहले की तुलना में कमजोर बताई जा रही है। हालांकि ममता समर्थक गुट इन दावों से सहमत नहीं है और पूरे घटनाक्रम को कानूनी चुनौती देने की तैयारी में जुटा हुआ है। यदि चुनाव आयोग बागी गुट के दावों पर विचार करता है तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। दूसरी ओर यदि मामला अदालत तक जाता है तो अंतिम निर्णय आने में समय लग सकता है। इस दौरान दोनों गुट अपने-अपने समर्थकों को मजबूत करने और संगठन पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश करेंगे। जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक कई नेताओं की भूमिका भी आने वाले दिनों में बदल सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल तृणमूल कांग्रेस तक सीमित नहीं रहेगा। विपक्षी दल भी इस स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। यदि पार्टी में टूट और गहराती है तो आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों, उपचुनावों और भविष्य की राजनीतिक रणनीतियों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में भी ममता बनर्जी की भूमिका और विपक्षी गठबंधन में उनकी स्थिति को लेकर नए समीकरण बनने की संभावना जताई जा रही है। आयोग के सामने रखे जाने वाले दस्तावेज, दोनों पक्षों के दावे और आगे की कानूनी प्रक्रिया यह तय करेगी कि तृणमूल कांग्रेस के संगठनात्मक विवाद का अगला अध्याय किस दिशा में आगे बढ़ेगा। 

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02 Jul 2026 By Vaishnavi.J

TMC में सियासी संकट गहराया, बागी गुट आज चुनाव आयोग से करेगा नई कार्यकारिणी को मान्यता देने की मांग

Digital Desk

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी सियासी संकट अब एक नए चरण में प्रवेश कर गया है। पार्टी का बागी गुट गुरुवार को नई दिल्ली में चुनाव आयोग से मुलाकात करेगा और हाल ही में गठित नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी (नेशनल वर्किंग कमेटी) को आधिकारिक मान्यता देने की मांग करेगा। बागी नेताओं का दावा है कि पार्टी के भीतर संगठनात्मक बदलाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत किए गए हैं और उन्हें संवैधानिक मान्यता मिलनी चाहिए। इस घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी हलचल तेज कर दी है। बागी गुट के नेता और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने बताया कि चुनाव आयोग ने प्रतिनिधिमंडल को दोपहर 12 बजे मिलने का समय दिया है। करीब 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल आयोग के सामने उन सभी दस्तावेजों को पेश करेगा, जिनमें नई कार्यकारिणी के गठन और संगठनात्मक बदलावों का उल्लेख है। उनके अनुसार 22 जून को कोलकाता में आयोजित प्रतिनिधि बैठक में पार्टी के नए अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और 30 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन किया गया था। इस बैठक की जानकारी पहले ही चुनाव आयोग को भेजी जा चुकी है और अब उसी के आधार पर औपचारिक मान्यता की मांग की जाएगी।

टीएमसी में यह संकट विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन के बाद खुलकर सामने आया। तीन जून को पार्टी के 80 में से 58 विधायकों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व से अलग होने का फैसला लिया। इसके बाद इन विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना और विधानसभा अध्यक्ष को समर्थन पत्र सौंपते हुए उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाने की मांग की। बाद में इस मांग को मंजूरी भी मिल गई। इसके कुछ दिनों बाद लोकसभा में भी बड़ा घटनाक्रम सामने आया, जब पार्टी के 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने अलग रास्ता अपनाने का फैसला किया। बाद में इन सांसदों ने एक अलग राजनीतिक मंच के साथ विलय का निर्णय लिया, जिससे टीएमसी के भीतर संकट और गहरा गया। बागी गुट का कहना है कि उसके पास पार्टी के दो-तिहाई से अधिक विधायक और सांसदों का समर्थन है। दल-बदल कानून की दसवीं अनुसूची के तहत यदि किसी राजनीतिक दल के दो-तिहाई निर्वाचित सदस्य किसी अलग समूह का समर्थन करते हैं या विलय का फैसला लेते हैं, तो उन्हें कानूनी संरक्षण मिल सकता है। इसी आधार पर बागी गुट खुद को वैध संगठन बताते हुए चुनाव आयोग से नई कार्यकारिणी को मान्यता देने की मांग कर रहा है। हालांकि अंतिम निर्णय चुनाव आयोग, विधानसभा अध्यक्ष और आवश्यक होने पर न्यायपालिका के स्तर पर ही होगा।

यह मामला केवल संगठनात्मक बदलाव तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में पार्टी के नाम, चुनाव चिन्ह और संगठन पर अधिकार को लेकर भी कानूनी लड़ाई तेज हो सकती है। यदि दोनों पक्ष अपने-अपने दावों पर कायम रहते हैं तो मामला उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच सकता है। ऐसे में चुनाव आयोग की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। टीएमसी के भीतर पैदा हुआ यह संकट कई राजनीतिक विश्लेषकों को महाराष्ट्र में शिवसेना में हुई बगावत की याद दिला रहा है। वहां भी बड़ी संख्या में विधायक तत्कालीन नेतृत्व से अलग हो गए थे और बाद में संगठन, चुनाव चिन्ह और वैधता को लेकर लंबी कानूनी प्रक्रिया चली थी। आखिरकार चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष के फैसलों ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे। अब पश्चिम बंगाल में भी कुछ वैसी ही स्थिति बनने की चर्चा तेज हो गई है, हालांकि अंतिम फैसला संवैधानिक संस्थाओं के निर्णय पर निर्भर करेगा।

वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो ममता बनर्जी के पास विधानसभा में केवल 22 विधायक बचे होने का दावा किया जा रहा है, जबकि लोकसभा में भी उनके साथ सांसदों की संख्या काफी कम हो गई है। राज्यसभा में भी कुछ सांसदों के इस्तीफे के बाद उनकी संसदीय ताकत पहले की तुलना में कमजोर बताई जा रही है। हालांकि ममता समर्थक गुट इन दावों से सहमत नहीं है और पूरे घटनाक्रम को कानूनी चुनौती देने की तैयारी में जुटा हुआ है। यदि चुनाव आयोग बागी गुट के दावों पर विचार करता है तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। दूसरी ओर यदि मामला अदालत तक जाता है तो अंतिम निर्णय आने में समय लग सकता है। इस दौरान दोनों गुट अपने-अपने समर्थकों को मजबूत करने और संगठन पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश करेंगे। जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक कई नेताओं की भूमिका भी आने वाले दिनों में बदल सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल तृणमूल कांग्रेस तक सीमित नहीं रहेगा। विपक्षी दल भी इस स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। यदि पार्टी में टूट और गहराती है तो आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों, उपचुनावों और भविष्य की राजनीतिक रणनीतियों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में भी ममता बनर्जी की भूमिका और विपक्षी गठबंधन में उनकी स्थिति को लेकर नए समीकरण बनने की संभावना जताई जा रही है। आयोग के सामने रखे जाने वाले दस्तावेज, दोनों पक्षों के दावे और आगे की कानूनी प्रक्रिया यह तय करेगी कि तृणमूल कांग्रेस के संगठनात्मक विवाद का अगला अध्याय किस दिशा में आगे बढ़ेगा। 

https://www.dainikjagranmpcg.com/election/political-crisis-deepens-in-tmc-rebel-group-will-demand-from/article-57603

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