महिला जज को धमकियों पर हाईकोर्ट सख्त, ACS गृह और DGP से मांगा हलफनामा

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गौहत्या से जुड़े चर्चित मामले में उम्रकैद की सजा सुनाने के बाद मिली जान से मारने की धमकियों पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से सुरक्षा इंतजामों का पूरा ब्यौरा मांगा, अगली सुनवाई 9 जुलाई को होगी।

गौहत्या से जुड़े बहुचर्चित मामले में 14 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाने वाली सिवनी मालवा की महिला न्यायिक अधिकारी को मिल रही जान से मारने की धमकियों पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस मामले को बेहद गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया है और गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) तथा पुलिस महानिदेशक (DGP) को शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने पूछा है कि महिला न्यायिक अधिकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अब तक कौन-कौन से ठोस कदम उठाए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई को निर्धारित की गई है। न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से जुड़े इस घटनाक्रम ने एक बार फिर न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला अगस्त 2022 में हुई उस घटना से जुड़ा है, जिसने पूरे प्रदेश में काफी चर्चा बटोरी थी। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक महाराष्ट्र के अमरावती जा रहे एक ट्रक को नर्मदापुरम जिले के सिवनी मालवा क्षेत्र के बराखड़ गांव के पास रोक लिया गया था। ट्रक में करीब 30 मवेशी मौजूद थे। इसके बाद मौके पर ग्रामीणों और गो-रक्षकों की भीड़ जमा हो गई। आरोप है कि भीड़ ने ट्रक में सवार तीन लोगों के साथ लाठी-डंडों से मारपीट की, जिसमें नाजिर अहमद की मौत हो गई थी। इस मामले की सुनवाई अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान की अदालत में चल रही थी। सुनवाई पूरी होने के बाद 12 जून को अदालत ने 14 आरोपियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। फैसले के बाद न्यायालय परिसर का माहौल भी तनावपूर्ण हो गया था। बताया गया कि जब पुलिस दोषियों को जेल ले जाने की प्रक्रिया पूरी कर रही थी, उसी दौरान अदालत परिसर में हंगामा हुआ और सुरक्षा व्यवस्था बढ़ानी पड़ी।

फैसले के कुछ समय बाद ही सोशल मीडिया पर महिला न्यायिक अधिकारी को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां सामने आने लगीं। अधिकारियों के अनुसार कई प्लेटफॉर्म पर सांप्रदायिक माहौल बनाने की कोशिश करते हुए न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया। कुछ पोस्ट में जान से मारने की धमकियां भी दी गईं। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने दो फेसबुक उपयोगकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और आपत्तिजनक सामग्री हटाने की प्रक्रिया भी शुरू की। हालांकि लगातार सामने आ रहे संदेशों और धमकियों को देखते हुए न्यायिक अधिकारी की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई। न्यायपालिका से जुड़े कई लोगों ने भी इस तरह की घटनाओं को गंभीर बताते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की। इसी दौरान वर्ष 2016 से लंबित न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस पूरे मामले का स्वतः संज्ञान लिया। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी। अदालत ने कहा कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी को न्यायिक दायित्व निभाने के कारण धमकियां मिलती हैं तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि पूरी न्यायिक व्यवस्था की सुरक्षा और स्वतंत्रता से जुड़ा विषय है। ऐसे मामलों में राज्य की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने अदालत को बताया कि महिला न्यायिक अधिकारी को 1-5 श्रेणी की सशस्त्र सुरक्षा उपलब्ध करा दी गई है। इसके अलावा सोशल मीडिया पर प्रसारित आपत्तिजनक पोस्ट और धमकी भरे संदेशों को हटाने के लिए संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय किया जा रहा है। पुलिस की ओर से मामले की जांच जारी है और जिन लोगों की पहचान हुई है, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है। अदालत ने इन जानकारियों को रिकॉर्ड पर लिया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि केवल मौखिक जानकारी पर्याप्त नहीं होगी। इसलिए गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को शपथपत्र के माध्यम से यह बताना होगा कि सुरक्षा के लिए अब तक कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं और भविष्य में क्या व्यवस्था की गई है। हाईकोर्ट ने अपने निर्देशों में यह भी संकेत दिया कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि न्यायाधीश कानून के अनुसार स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय देते हैं। यदि फैसलों के बाद उन्हें धमकियों का सामना करना पड़े और पर्याप्त सुरक्षा न मिले तो इसका असर न्यायिक व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में राज्य सरकार को संवेदनशीलता और तत्परता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए। अदालत अब 9 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में सरकार की ओर से दाखिल शपथपत्र का परीक्षण करेगी। माना जा रहा है कि इस सुनवाई में न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर आगे के निर्देश भी जारी किए जा सकते हैं।

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02 Jul 2026 By Vaishnavi.J

महिला जज को धमकियों पर हाईकोर्ट सख्त, ACS गृह और DGP से मांगा हलफनामा

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गौहत्या से जुड़े बहुचर्चित मामले में 14 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाने वाली सिवनी मालवा की महिला न्यायिक अधिकारी को मिल रही जान से मारने की धमकियों पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस मामले को बेहद गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया है और गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) तथा पुलिस महानिदेशक (DGP) को शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने पूछा है कि महिला न्यायिक अधिकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अब तक कौन-कौन से ठोस कदम उठाए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई को निर्धारित की गई है। न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से जुड़े इस घटनाक्रम ने एक बार फिर न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला अगस्त 2022 में हुई उस घटना से जुड़ा है, जिसने पूरे प्रदेश में काफी चर्चा बटोरी थी। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक महाराष्ट्र के अमरावती जा रहे एक ट्रक को नर्मदापुरम जिले के सिवनी मालवा क्षेत्र के बराखड़ गांव के पास रोक लिया गया था। ट्रक में करीब 30 मवेशी मौजूद थे। इसके बाद मौके पर ग्रामीणों और गो-रक्षकों की भीड़ जमा हो गई। आरोप है कि भीड़ ने ट्रक में सवार तीन लोगों के साथ लाठी-डंडों से मारपीट की, जिसमें नाजिर अहमद की मौत हो गई थी। इस मामले की सुनवाई अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान की अदालत में चल रही थी। सुनवाई पूरी होने के बाद 12 जून को अदालत ने 14 आरोपियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। फैसले के बाद न्यायालय परिसर का माहौल भी तनावपूर्ण हो गया था। बताया गया कि जब पुलिस दोषियों को जेल ले जाने की प्रक्रिया पूरी कर रही थी, उसी दौरान अदालत परिसर में हंगामा हुआ और सुरक्षा व्यवस्था बढ़ानी पड़ी।

फैसले के कुछ समय बाद ही सोशल मीडिया पर महिला न्यायिक अधिकारी को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां सामने आने लगीं। अधिकारियों के अनुसार कई प्लेटफॉर्म पर सांप्रदायिक माहौल बनाने की कोशिश करते हुए न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया। कुछ पोस्ट में जान से मारने की धमकियां भी दी गईं। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने दो फेसबुक उपयोगकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और आपत्तिजनक सामग्री हटाने की प्रक्रिया भी शुरू की। हालांकि लगातार सामने आ रहे संदेशों और धमकियों को देखते हुए न्यायिक अधिकारी की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई। न्यायपालिका से जुड़े कई लोगों ने भी इस तरह की घटनाओं को गंभीर बताते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की। इसी दौरान वर्ष 2016 से लंबित न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस पूरे मामले का स्वतः संज्ञान लिया। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी। अदालत ने कहा कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी को न्यायिक दायित्व निभाने के कारण धमकियां मिलती हैं तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि पूरी न्यायिक व्यवस्था की सुरक्षा और स्वतंत्रता से जुड़ा विषय है। ऐसे मामलों में राज्य की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने अदालत को बताया कि महिला न्यायिक अधिकारी को 1-5 श्रेणी की सशस्त्र सुरक्षा उपलब्ध करा दी गई है। इसके अलावा सोशल मीडिया पर प्रसारित आपत्तिजनक पोस्ट और धमकी भरे संदेशों को हटाने के लिए संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय किया जा रहा है। पुलिस की ओर से मामले की जांच जारी है और जिन लोगों की पहचान हुई है, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है। अदालत ने इन जानकारियों को रिकॉर्ड पर लिया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि केवल मौखिक जानकारी पर्याप्त नहीं होगी। इसलिए गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को शपथपत्र के माध्यम से यह बताना होगा कि सुरक्षा के लिए अब तक कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं और भविष्य में क्या व्यवस्था की गई है। हाईकोर्ट ने अपने निर्देशों में यह भी संकेत दिया कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि न्यायाधीश कानून के अनुसार स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय देते हैं। यदि फैसलों के बाद उन्हें धमकियों का सामना करना पड़े और पर्याप्त सुरक्षा न मिले तो इसका असर न्यायिक व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में राज्य सरकार को संवेदनशीलता और तत्परता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए। अदालत अब 9 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में सरकार की ओर से दाखिल शपथपत्र का परीक्षण करेगी। माना जा रहा है कि इस सुनवाई में न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर आगे के निर्देश भी जारी किए जा सकते हैं।

https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-strict-on-threats-to-female-judge-seeks-affidavit/article-57651

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