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हसल कल्चर बनाम मानसिक स्वास्थ्य: कब काम करने की होड़ खा रही है हमारी सेहत?
लाइफस्टाइल डेस्क
लगातार “वर्क-ऑल-डे, नींद कम, और सफलता ज्यादा” की मानसिकता से बढ़ रहे तनाव और चिंता के मामले
आज के युवा और पेशेवर अक्सर “हसल कल्चर” के जाल में फँसे नजर आते हैं। हसल कल्चर यानी लगातार काम करना, ज़्यादा प्रोडक्टिव होना और हर समय अपनी कैरियर ग्रोथ पर फोकस करना। सोशल मीडिया पर सफलता की चमक-धमक और ओवरटाइम की प्रशंसा इसे और भी बढ़ावा देती है। लेकिन क्या इस लगातार भाग-दौड़ वाली मानसिकता का असर हमारी मानसिक और शारीरिक सेहत पर पड़ रहा है?
क्या है हसल कल्चर?
हसल कल्चर में व्यक्ति दिन-रात काम में जुटा रहता है, ब्रेक कम लेता है और अक्सर अपनी निजी जरूरतों और आराम को नजरअंदाज कर देता है। इसका मकसद तेजी से करियर ग्रोथ, सामाजिक मान्यता और आर्थिक सफलता हासिल करना है।
क्यों खतरनाक हो सकता है?
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के अनुसार “हसल कल्चर से थकान, तनाव और बर्नआउट जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। लंबे समय तक लगातार काम करने से नींद, खाने की आदतें और सामाजिक जीवन प्रभावित होता है। इसके चलते डिप्रेशन और एंग्जायटी के केस भी बढ़ रहे हैं।”
कैसे प्रभावित हो रहा जीवन?
हाल के सर्वेक्षण बताते हैं कि भारत में 25-35 साल के पेशेवरों में 60% लोग हसल कल्चर के कारण समय पर आराम नहीं ले पा रहे हैं। नतीजतन, शरीर और मन दोनों पर दबाव बढ़ता है। लगातार काम करना एक समय के बाद प्रोडक्टिविटी को भी नुकसान पहुंचाता है।
प्रतिक्रिया और समाधान
कुछ कंपनियां अब अपने कर्मचारियों की वर्क-लाइफ बैलेंस पर ध्यान दे रही हैं। वर्क फ्रॉम होम, लचीले समय और मानसिक स्वास्थ्य सपोर्ट प्रोग्राम इसके उदाहरण हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि दिन में छोटे ब्रेक लें, सोशल मीडिया टाइम कम करें, और शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए योग, ध्यान या नियमित व्यायाम को अपनाएं।
हसल कल्चर का ट्रेंड बढ़ता ही जा रहा है, लेकिन अगर इसे संतुलन के बिना अपनाया गया, तो मानसिक स्वास्थ्य संकट गंभीर रूप ले सकता है। युवा वर्ग को यह समझना जरूरी है कि सफलता केवल काम की मात्रा से नहीं बल्कि गुणवत्ता और मानसिक स्थिरता से भी जुड़ी है।
हसल कल्चर आधुनिक जीवन का हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अपनी सेहत और खुशियों को भूल जाएँ। मानसिक स्वास्थ्य बनाए रखना और काम की संतुलित प्राथमिकता तय करना अब जरूरी है।
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