सादगी का सवाल: क्या अब यह आउटडेटेड हो गई है?

लाइफस्टाइल डेस्क

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आधुनिक लाइफस्टाइल और सोशल मीडिया की चमक-धमक के बीच लोग अब सादगी को प्राथमिकता नहीं दे रहे, विशेषज्ञ चिंतित

नई दिल्ली: आज के तेजी से बदलते समय में सादगी की परिभाषा बदलती जा रही है। जहां पहले सरल जीवन और कम भौतिकतावाद को गुण माना जाता था, वहीं अब युवा वर्ग में भव्यता, ब्रांडेड जीवनशैली और सोशल मीडिया में दिखावे की ओर झुकाव बढ़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव केवल आदतों में नहीं बल्कि सोच में भी स्पष्ट है।

क्या बदल रहा है?

साधारण कपड़े, सीमित खरीददारी और आत्मसंतोष जैसी सादगी की परंपराएँ अब कम लोग अपनाते हैं। दिल्ली के जीवनशैली विशेषज्ञ के अनुसार“मौजूदा पीढ़ी में ‘कम में खुश रहना’ की भावना तेजी से घट रही है। लोग अनुभव और दिखावे के लिए खर्च करना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।”

क्यों हो रही यह प्रवृत्ति?

विशेषज्ञों के अनुसार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे इंस्टाग्राम और टिकटॉक ने भौतिकता और ग्लैमर को बढ़ावा दिया है। युवा वर्ग में लाइफस्टाइल की तुलना और प्रतिस्पर्धा बढ़ी है, जिससे सादगी का महत्व घटा है। इसके अलावा, वैश्विककरण और विज्ञापन की दुनिया में चमक-धमक जीवन को सफलता का प्रतीक मानने की प्रवृत्ति मजबूत हो गई है।

कैसे बदल रही है सोच?

भले ही सादगी मानसिक शांति देती है, लेकिन आज लोग तत्काल संतुष्टि और स्टेटस सिंबल को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके चलते दिखावे और खर्च की संस्कृति बढ़ रही है।”

कुछ परिवारों और सामाजिक समूहों में अभी भी सादगी को अपनाया जाता है। राजस्थान और उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में लोग सीमित संसाधनों में संतोषपूर्वक जीवन जीते हैं। वहीं, बड़े शहरों में फ्लैट और कार के साथ जीवनशैली में भव्यता का दबदबा बढ़ गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आधुनिक शिक्षा और मीडिया में संतुलित जीवन के मूल्य नहीं सिखाए गए, तो सादगी पूरी तरह सामाजिक नजरिए से गायब हो सकती है। हालांकि, मिनिमलिज़्म और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता की बढ़ती हुई पहल कुछ सकारात्मक संकेत देती हैं।

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Edited By: ANKITA

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