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बिहारी के इस दोहे में छिपा है सफल जीवन का रहस्य, धन के घमंड से क्यों बचना चाहिए?
जीवन के मंत्र
'कनक कनक ते सौ गुनी' दोहे के माध्यम से महाकवि बिहारी ने बताया कि धन का अहंकार इंसान की सोच, व्यवहार और रिश्तों को कैसे प्रभावित करता है।
रीतिकाल के महान कवि महाकवि बिहारी लाल हिंदी साहित्य के ऐसे रचनाकार हैं, जिनकी एकमात्र कृति 'बिहारी सतसई' आज भी नीति, ज्ञान, जीवन-दर्शन और व्यवहारिक शिक्षा का महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है। उनके दोहे केवल साहित्यिक सौंदर्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाले संदेश भी देते हैं। इन्हीं दोहों में से एक प्रसिद्ध दोहा "कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। इहि खाए बौरात जग, इहि पाए बौराय॥" आज भी उतना ही प्रासंगिक माना जाता है, जितना सदियों पहले था।
इस दोहे में महाकवि बिहारी ने धन और अहंकार के बीच के गहरे संबंध को बेहद सरल शब्दों में समझाया है। उनका मानना है कि धन का नशा किसी भी नशीले पदार्थ से अधिक खतरनाक होता है। धतूरा जैसे विषैले पौधे को खाने के बाद व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खो देता है, लेकिन धन ऐसा माध्यम है, जिसका केवल साथ मिल जाना ही कई लोगों के व्यवहार और सोच को पूरी तरह बदल देता है। यही कारण है कि बिहारी ने सोने यानी धन की तुलना धतूरे से करते हुए कहा कि इसका प्रभाव कहीं अधिक घातक होता है।
आज के दौर में यह दोहा पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक नजर आता है। आधुनिक जीवन में सफलता का पैमाना अक्सर धन, संपत्ति और भौतिक सुविधाओं को माना जाने लगा है। आर्थिक रूप से मजबूत होने की इच्छा स्वाभाविक है, लेकिन जब यही इच्छा अहंकार, लालच और दूसरों को छोटा समझने की मानसिकता में बदल जाती है, तब समस्याएं शुरू होती हैं। कई बार देखा जाता है कि आर्थिक सफलता मिलने के बाद व्यक्ति अपने पुराने रिश्तों, दोस्तों और समाज से दूरी बना लेता है। वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है, जिससे उसके व्यवहार में बदलाव आ जाता है।
महाकवि बिहारी का यह संदेश केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक और व्यावसायिक जीवन पर भी समान रूप से लागू होता है। किसी भी संगठन, परिवार या समाज में विनम्रता और सहयोग की भावना ही लंबे समय तक सम्मान दिलाती है। वहीं, धन के कारण पैदा हुआ अहंकार व्यक्ति को धीरे-धीरे अकेला कर देता है। इतिहास और वर्तमान दोनों इस बात के गवाह हैं कि केवल संपत्ति के बल पर कोई व्यक्ति हमेशा सम्मानित नहीं रह सकता। सम्मान उसके व्यवहार, चरित्र और मानवीय मूल्यों से मिलता है।
धन स्वयं में बुरा नहीं है। जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने, परिवार की जिम्मेदारियां निभाने और समाज के विकास में योगदान देने के लिए धन जरूरी है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब धन साधन के बजाय उद्देश्य बन जाता है। जब व्यक्ति हर निर्णय केवल लाभ और संपत्ति के आधार पर लेने लगता है, तब वह रिश्तों, नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं से दूर होने लगता है। बिहारी का दोहा इसी मानसिकता से सावधान करता है।
भारतीय संस्कृति में सदैव यह शिक्षा दी गई है कि धन का उपयोग समाज और जरूरतमंद लोगों के हित में होना चाहिए। दान, सेवा और सहयोग की भावना को श्रेष्ठ माना गया है। यदि धन के साथ विनम्रता और करुणा भी जुड़ी रहे, तो वही संपत्ति समाज के लिए उपयोगी बनती है। इसके विपरीत यदि धन के साथ अहंकार जुड़ जाए, तो वह व्यक्ति के पतन का कारण बन सकता है।
मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि अत्यधिक भौतिकता की दौड़ व्यक्ति को मानसिक तनाव, असंतोष और अकेलेपन की ओर ले जाती है। लगातार अधिक पाने की इच्छा कभी खत्म नहीं होती। ऐसे में व्यक्ति वर्तमान की खुशियों का आनंद भी नहीं ले पाता। संतुलित जीवन, संतोष और अच्छे संबंध ही वास्तविक सुख का आधार होते हैं। यही संदेश बिहारी अपने दोहे के माध्यम से देना चाहते हैं।
आज सोशल मीडिया के दौर में लोग अपनी सफलता, महंगी गाड़ियां, आलीशान घर और विलासितापूर्ण जीवनशैली का प्रदर्शन करने लगे हैं। इससे तुलना की भावना बढ़ती है और कई लोग केवल दिखावे के लिए जीवन जीने लगते हैं। ऐसे समय में बिहारी का यह दोहा याद दिलाता है कि वास्तविक मूल्य व्यक्ति के चरित्र, व्यवहार और विनम्रता में है, न कि केवल उसकी आर्थिक स्थिति में।
शिक्षा के क्षेत्र में भी यह दोहा महत्वपूर्ण माना जाता है। विद्यार्थियों को प्रारंभ से ही यह सिखाया जाता है कि सफलता मिलने के बाद भी विनम्र बने रहना चाहिए। ज्ञान और धन दोनों तभी सार्थक हैं, जब उनका उपयोग समाज और मानवता के हित में किया जाए। अहंकार किसी भी उपलब्धि की चमक को कम कर देता है।
महाकवि बिहारी का यह दोहा केवल साहित्य का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक व्यवहारिक सीख है। यह हमें याद दिलाता है कि धन कमाना गलत नहीं है, लेकिन धन का घमंड इंसान को भीतर से कमजोर बना देता है। विनम्रता, संतोष, अच्छे संस्कार और मानवीय व्यवहार ही किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान होते हैं।
आज जब समाज तेज़ी से भौतिक सफलता की ओर बढ़ रहा है, तब बिहारी का यह संदेश पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि व्यक्ति धन को साधन मानकर उसका सदुपयोग करे और जीवन में विनम्रता बनाए रखे, तो वही सच्ची सफलता कहलाती है। यही कारण है कि सदियों पहले लिखा गया यह दोहा आज भी हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत बना हुआ है।
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बिहारी के इस दोहे में छिपा है सफल जीवन का रहस्य, धन के घमंड से क्यों बचना चाहिए?
जीवन के मंत्र
रीतिकाल के महान कवि महाकवि बिहारी लाल हिंदी साहित्य के ऐसे रचनाकार हैं, जिनकी एकमात्र कृति 'बिहारी सतसई' आज भी नीति, ज्ञान, जीवन-दर्शन और व्यवहारिक शिक्षा का महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है। उनके दोहे केवल साहित्यिक सौंदर्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाले संदेश भी देते हैं। इन्हीं दोहों में से एक प्रसिद्ध दोहा "कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। इहि खाए बौरात जग, इहि पाए बौराय॥" आज भी उतना ही प्रासंगिक माना जाता है, जितना सदियों पहले था।
इस दोहे में महाकवि बिहारी ने धन और अहंकार के बीच के गहरे संबंध को बेहद सरल शब्दों में समझाया है। उनका मानना है कि धन का नशा किसी भी नशीले पदार्थ से अधिक खतरनाक होता है। धतूरा जैसे विषैले पौधे को खाने के बाद व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खो देता है, लेकिन धन ऐसा माध्यम है, जिसका केवल साथ मिल जाना ही कई लोगों के व्यवहार और सोच को पूरी तरह बदल देता है। यही कारण है कि बिहारी ने सोने यानी धन की तुलना धतूरे से करते हुए कहा कि इसका प्रभाव कहीं अधिक घातक होता है।
आज के दौर में यह दोहा पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक नजर आता है। आधुनिक जीवन में सफलता का पैमाना अक्सर धन, संपत्ति और भौतिक सुविधाओं को माना जाने लगा है। आर्थिक रूप से मजबूत होने की इच्छा स्वाभाविक है, लेकिन जब यही इच्छा अहंकार, लालच और दूसरों को छोटा समझने की मानसिकता में बदल जाती है, तब समस्याएं शुरू होती हैं। कई बार देखा जाता है कि आर्थिक सफलता मिलने के बाद व्यक्ति अपने पुराने रिश्तों, दोस्तों और समाज से दूरी बना लेता है। वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है, जिससे उसके व्यवहार में बदलाव आ जाता है।
महाकवि बिहारी का यह संदेश केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक और व्यावसायिक जीवन पर भी समान रूप से लागू होता है। किसी भी संगठन, परिवार या समाज में विनम्रता और सहयोग की भावना ही लंबे समय तक सम्मान दिलाती है। वहीं, धन के कारण पैदा हुआ अहंकार व्यक्ति को धीरे-धीरे अकेला कर देता है। इतिहास और वर्तमान दोनों इस बात के गवाह हैं कि केवल संपत्ति के बल पर कोई व्यक्ति हमेशा सम्मानित नहीं रह सकता। सम्मान उसके व्यवहार, चरित्र और मानवीय मूल्यों से मिलता है।
धन स्वयं में बुरा नहीं है। जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने, परिवार की जिम्मेदारियां निभाने और समाज के विकास में योगदान देने के लिए धन जरूरी है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब धन साधन के बजाय उद्देश्य बन जाता है। जब व्यक्ति हर निर्णय केवल लाभ और संपत्ति के आधार पर लेने लगता है, तब वह रिश्तों, नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं से दूर होने लगता है। बिहारी का दोहा इसी मानसिकता से सावधान करता है।
भारतीय संस्कृति में सदैव यह शिक्षा दी गई है कि धन का उपयोग समाज और जरूरतमंद लोगों के हित में होना चाहिए। दान, सेवा और सहयोग की भावना को श्रेष्ठ माना गया है। यदि धन के साथ विनम्रता और करुणा भी जुड़ी रहे, तो वही संपत्ति समाज के लिए उपयोगी बनती है। इसके विपरीत यदि धन के साथ अहंकार जुड़ जाए, तो वह व्यक्ति के पतन का कारण बन सकता है।
मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि अत्यधिक भौतिकता की दौड़ व्यक्ति को मानसिक तनाव, असंतोष और अकेलेपन की ओर ले जाती है। लगातार अधिक पाने की इच्छा कभी खत्म नहीं होती। ऐसे में व्यक्ति वर्तमान की खुशियों का आनंद भी नहीं ले पाता। संतुलित जीवन, संतोष और अच्छे संबंध ही वास्तविक सुख का आधार होते हैं। यही संदेश बिहारी अपने दोहे के माध्यम से देना चाहते हैं।
आज सोशल मीडिया के दौर में लोग अपनी सफलता, महंगी गाड़ियां, आलीशान घर और विलासितापूर्ण जीवनशैली का प्रदर्शन करने लगे हैं। इससे तुलना की भावना बढ़ती है और कई लोग केवल दिखावे के लिए जीवन जीने लगते हैं। ऐसे समय में बिहारी का यह दोहा याद दिलाता है कि वास्तविक मूल्य व्यक्ति के चरित्र, व्यवहार और विनम्रता में है, न कि केवल उसकी आर्थिक स्थिति में।
शिक्षा के क्षेत्र में भी यह दोहा महत्वपूर्ण माना जाता है। विद्यार्थियों को प्रारंभ से ही यह सिखाया जाता है कि सफलता मिलने के बाद भी विनम्र बने रहना चाहिए। ज्ञान और धन दोनों तभी सार्थक हैं, जब उनका उपयोग समाज और मानवता के हित में किया जाए। अहंकार किसी भी उपलब्धि की चमक को कम कर देता है।
महाकवि बिहारी का यह दोहा केवल साहित्य का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक व्यवहारिक सीख है। यह हमें याद दिलाता है कि धन कमाना गलत नहीं है, लेकिन धन का घमंड इंसान को भीतर से कमजोर बना देता है। विनम्रता, संतोष, अच्छे संस्कार और मानवीय व्यवहार ही किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान होते हैं।
आज जब समाज तेज़ी से भौतिक सफलता की ओर बढ़ रहा है, तब बिहारी का यह संदेश पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि व्यक्ति धन को साधन मानकर उसका सदुपयोग करे और जीवन में विनम्रता बनाए रखे, तो वही सच्ची सफलता कहलाती है। यही कारण है कि सदियों पहले लिखा गया यह दोहा आज भी हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत बना हुआ है।
