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ट्रंप के नए टैरिफ पर अमेरिका में बड़ा कानूनी संकट, 25 राज्यों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया
Digital Desk
भारत समेत 60 व्यापारिक साझेदार देशों पर 10% से 12.5% शुल्क को बताया अवैध, राज्यों ने टैरिफ रद्द करने और वसूली गई राशि लौटाने की मांग की
अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई व्यापार नीति को लेकर बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। भारत सहित 60 प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों से आने वाले उत्पादों पर 10 प्रतिशत से 12.5 प्रतिशत तक नए आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने के फैसले के खिलाफ अमेरिका के 25 राज्यों ने संयुक्त रूप से अदालत का रुख किया है। राज्यों का आरोप है कि यह फैसला अमेरिकी संविधान और कानून के खिलाफ है तथा राष्ट्रपति अपने अधिकारों का दायरा पार करते हुए मनमाने तरीके से नए कर लागू करने की कोशिश कर रहे हैं।
यह मुकदमा अमेरिका के कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में दायर किया गया है। इसमें अदालत से मांग की गई है कि नए टैरिफ को अवैध घोषित किया जाए, इसके क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाई जाए और अब तक इन टैरिफ के तहत वसूली गई राशि प्रभावित आयातकों को वापस लौटाई जाए। याचिका में कहा गया है कि ट्रंप प्रशासन ने पिछले महीने जिन 59 देशों और यूरोपीय संघ पर नए शुल्क लागू किए हैं, वे अमेरिका के कुल आयात का लगभग 99.4 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित करते हैं। इनमें भारत, कनाडा, जापान, नॉर्वे, ताइवान, चीन और अन्य बड़े व्यापारिक साझेदार शामिल हैं। इससे वैश्विक व्यापार और अमेरिकी बाजार दोनों पर व्यापक असर पड़ सकता है।
राज्यों का कहना है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने इसी वर्ष फरवरी में ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए पहले के "लिबरेशन डे टैरिफ" को असंवैधानिक ठहराया था। अदालत के उस फैसले के बाद प्रशासन ने अब ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 के तहत नए टैरिफ लागू कर दिए हैं। राज्यों का आरोप है कि यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अप्रत्यक्ष रूप से दरकिनार करने की कोशिश है। न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स ने कहा कि प्रशासन सुप्रीम कोर्ट में हारने के बावजूद एक नए रास्ते से अमेरिकी परिवारों और कारोबारों पर अतिरिक्त कर का बोझ डालने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि संविधान स्पष्ट रूप से राष्ट्रपति को यह अधिकार नहीं देता कि वह अपनी इच्छा से किसी भी देश पर व्यापक टैरिफ लागू कर दें।
मुकदमे में शामिल राज्यों में न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया, इलिनॉय, मैसाचुसेट्स, वॉशिंगटन, विस्कॉन्सिन सहित कुल 25 राज्य शामिल हैं। इसके अलावा केंटकी और पेंसिल्वेनिया के गवर्नरों ने भी इस कानूनी चुनौती का समर्थन किया है। राज्यों का तर्क है कि इन टैरिफ का सीधा असर आम नागरिकों की जेब पर पड़ेगा क्योंकि आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी और महंगाई में इजाफा होगा।
ट्रंप प्रशासन ने इन टैरिफ का बचाव करते हुए कहा है कि कई देश जबरन श्रम (Forced Labour) से बने उत्पादों के आयात को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे हैं। प्रशासन का दावा है कि अमेरिकी व्यापार और श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए यह कदम जरूरी है। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने कहा कि अमेरिका अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करते हुए ऐसे देशों पर दबाव बना रहा है, जिनकी नीतियां अमेरिकी व्यापार को नुकसान पहुंचा रही हैं। उनके अनुसार धारा 301 के तहत लगाए गए टैरिफ राष्ट्रपति के पहले कार्यकाल में भी प्रभावी साबित हुए थे और वर्तमान में भी पूरी तरह कानूनी हैं।
हालांकि न्यूयॉर्क की गवर्नर कैथी होचुल ने प्रशासन के इस तर्क को खारिज कर दिया। उनका कहना है कि "फोर्स्ड लेबर" का मुद्दा केवल एक बहाना बनाया जा रहा है, जबकि असली असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन टैरिफ की वजह से किराना, घरेलू सामान, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा की कई आवश्यक वस्तुएं महंगी हो रही हैं।
इस मामले में एक अलग कानूनी चुनौती भी सामने आई है। लिबर्टी जस्टिस सेंटर ने दो छोटे अमेरिकी कारोबारों की ओर से भी अदालत में याचिका दायर की है। उनका कहना है कि राष्ट्रपति ने अपने कार्यकारी अधिकारों की सीमा से आगे बढ़कर यह फैसला लिया है और इससे छोटे व्यवसायों को गंभीर आर्थिक नुकसान हो रहा है। यदि अदालत इन टैरिफ को अवैध घोषित करती है तो ट्रंप प्रशासन को बड़ा राजनीतिक और कानूनी झटका लग सकता है। वहीं यदि सरकार का पक्ष मजबूत रहता है तो अमेरिका की व्यापार नीति में यह फैसला लंबे समय तक प्रभाव डाल सकता है।
भारत पर भी इन नए टैरिफ का असर पड़ने की संभावना है। अमेरिका भारत का प्रमुख निर्यात बाजार है और कई भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में बड़ी मात्रा में भेजे जाते हैं। यदि टैरिफ लंबे समय तक लागू रहते हैं तो कुछ क्षेत्रों में निर्यात लागत बढ़ सकती है और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है। वैश्विक स्तर पर भी इस घटनाक्रम पर नजर रखी जा रही है। विश्व व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका और उसके प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के बीच शुल्क विवाद बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला, वैश्विक निवेश और आर्थिक विकास पर असर पड़ सकता है।
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ट्रंप के नए टैरिफ पर अमेरिका में बड़ा कानूनी संकट, 25 राज्यों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया
Digital Desk
अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई व्यापार नीति को लेकर बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। भारत सहित 60 प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों से आने वाले उत्पादों पर 10 प्रतिशत से 12.5 प्रतिशत तक नए आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने के फैसले के खिलाफ अमेरिका के 25 राज्यों ने संयुक्त रूप से अदालत का रुख किया है। राज्यों का आरोप है कि यह फैसला अमेरिकी संविधान और कानून के खिलाफ है तथा राष्ट्रपति अपने अधिकारों का दायरा पार करते हुए मनमाने तरीके से नए कर लागू करने की कोशिश कर रहे हैं।
यह मुकदमा अमेरिका के कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में दायर किया गया है। इसमें अदालत से मांग की गई है कि नए टैरिफ को अवैध घोषित किया जाए, इसके क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाई जाए और अब तक इन टैरिफ के तहत वसूली गई राशि प्रभावित आयातकों को वापस लौटाई जाए। याचिका में कहा गया है कि ट्रंप प्रशासन ने पिछले महीने जिन 59 देशों और यूरोपीय संघ पर नए शुल्क लागू किए हैं, वे अमेरिका के कुल आयात का लगभग 99.4 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित करते हैं। इनमें भारत, कनाडा, जापान, नॉर्वे, ताइवान, चीन और अन्य बड़े व्यापारिक साझेदार शामिल हैं। इससे वैश्विक व्यापार और अमेरिकी बाजार दोनों पर व्यापक असर पड़ सकता है।
राज्यों का कहना है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने इसी वर्ष फरवरी में ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए पहले के "लिबरेशन डे टैरिफ" को असंवैधानिक ठहराया था। अदालत के उस फैसले के बाद प्रशासन ने अब ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 के तहत नए टैरिफ लागू कर दिए हैं। राज्यों का आरोप है कि यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अप्रत्यक्ष रूप से दरकिनार करने की कोशिश है। न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स ने कहा कि प्रशासन सुप्रीम कोर्ट में हारने के बावजूद एक नए रास्ते से अमेरिकी परिवारों और कारोबारों पर अतिरिक्त कर का बोझ डालने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि संविधान स्पष्ट रूप से राष्ट्रपति को यह अधिकार नहीं देता कि वह अपनी इच्छा से किसी भी देश पर व्यापक टैरिफ लागू कर दें।
मुकदमे में शामिल राज्यों में न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया, इलिनॉय, मैसाचुसेट्स, वॉशिंगटन, विस्कॉन्सिन सहित कुल 25 राज्य शामिल हैं। इसके अलावा केंटकी और पेंसिल्वेनिया के गवर्नरों ने भी इस कानूनी चुनौती का समर्थन किया है। राज्यों का तर्क है कि इन टैरिफ का सीधा असर आम नागरिकों की जेब पर पड़ेगा क्योंकि आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी और महंगाई में इजाफा होगा।
ट्रंप प्रशासन ने इन टैरिफ का बचाव करते हुए कहा है कि कई देश जबरन श्रम (Forced Labour) से बने उत्पादों के आयात को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे हैं। प्रशासन का दावा है कि अमेरिकी व्यापार और श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए यह कदम जरूरी है। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने कहा कि अमेरिका अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करते हुए ऐसे देशों पर दबाव बना रहा है, जिनकी नीतियां अमेरिकी व्यापार को नुकसान पहुंचा रही हैं। उनके अनुसार धारा 301 के तहत लगाए गए टैरिफ राष्ट्रपति के पहले कार्यकाल में भी प्रभावी साबित हुए थे और वर्तमान में भी पूरी तरह कानूनी हैं।
हालांकि न्यूयॉर्क की गवर्नर कैथी होचुल ने प्रशासन के इस तर्क को खारिज कर दिया। उनका कहना है कि "फोर्स्ड लेबर" का मुद्दा केवल एक बहाना बनाया जा रहा है, जबकि असली असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन टैरिफ की वजह से किराना, घरेलू सामान, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा की कई आवश्यक वस्तुएं महंगी हो रही हैं।
इस मामले में एक अलग कानूनी चुनौती भी सामने आई है। लिबर्टी जस्टिस सेंटर ने दो छोटे अमेरिकी कारोबारों की ओर से भी अदालत में याचिका दायर की है। उनका कहना है कि राष्ट्रपति ने अपने कार्यकारी अधिकारों की सीमा से आगे बढ़कर यह फैसला लिया है और इससे छोटे व्यवसायों को गंभीर आर्थिक नुकसान हो रहा है। यदि अदालत इन टैरिफ को अवैध घोषित करती है तो ट्रंप प्रशासन को बड़ा राजनीतिक और कानूनी झटका लग सकता है। वहीं यदि सरकार का पक्ष मजबूत रहता है तो अमेरिका की व्यापार नीति में यह फैसला लंबे समय तक प्रभाव डाल सकता है।
भारत पर भी इन नए टैरिफ का असर पड़ने की संभावना है। अमेरिका भारत का प्रमुख निर्यात बाजार है और कई भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में बड़ी मात्रा में भेजे जाते हैं। यदि टैरिफ लंबे समय तक लागू रहते हैं तो कुछ क्षेत्रों में निर्यात लागत बढ़ सकती है और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है। वैश्विक स्तर पर भी इस घटनाक्रम पर नजर रखी जा रही है। विश्व व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका और उसके प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के बीच शुल्क विवाद बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला, वैश्विक निवेश और आर्थिक विकास पर असर पड़ सकता है।
