- Hindi News
- देश विदेश
- सड़कों से स्टार्टअप तक: नए भारत की बदलती आर्थिक तस्वीर
सड़कों से स्टार्टअप तक: नए भारत की बदलती आर्थिक तस्वीर
Digital Desk
पिछले बारह वर्षों में भारत के बुनियादी ढांचे की कहानी को केवल सड़कों, रेलवे, हवाई अड्डों, बिजली संयंत्रों या चिकित्सा संस्थानों की संख्या के रूप में देखना अधूरा होगा। यह दरअसल उस क्षमता के निर्माण की कहानी है, जिसकी मदद से भारत एक कहीं बड़ी और अधिक महत्वाकांक्षी अर्थव्यवस्था का आधार तैयार कर रहा है।
इस बदलाव का महत्व तब और स्पष्ट होता है जब अलग-अलग क्षेत्रों को एक साथ देखा जाए। कोई डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर सिर्फ एक रेलवे परियोजना नहीं है। उसकी असली उपयोगिता तब सामने आती है जब वह विनिर्माण केंद्रों को बंदरगाहों से जोड़ता है। कोई नया एक्सप्रेसवे केवल कंक्रीट की बनी सड़क नहीं है; वह उत्पादकों, उपभोक्ताओं और बाजारों के बीच की दूरी और समय को कम करता है। एक नया हवाई अड्डा पूरे क्षेत्र की आर्थिक संभावनाओं को बदल सकता है। एक ट्रांसमिशन लाइन एक राज्य में पैदा हुई नवीकरणीय ऊर्जा को दूसरे राज्य तक पहुंचा सकती है। वहीं, एक मेडिकल कॉलेज सिर्फ डॉक्टर तैयार नहीं करता, बल्कि उसके आसपास अस्पतालों, प्रयोगशालाओं, नर्सिंग पेशेवरों और अन्य कुशल रोजगार का पूरा तंत्र विकसित हो सकता है।
भारत के बुनियादी ढांचे के विस्तार की शायद सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यही आपसी जुड़ाव है।
कई दशकों तक भारत की विकास संबंधी चुनौती को अक्सर कमी के रूप में देखा जाता था—सड़कों की कमी, बिजली की कमी, स्वास्थ्य संस्थानों की कमी, परिवहन संपर्क की कमी और औद्योगिक क्षमता की कमी। अब लक्ष्य धीरे-धीरे केवल इन कमियों को दूर करने से आगे बढ़कर ऐसा पूरा इकोसिस्टम तैयार करने की ओर बढ़ रहा है, जो लंबे समय तक आर्थिक विस्तार को सहारा दे सके।
इस बदलाव के संकेत अलग-अलग क्षेत्रों में दिखाई देने लगे हैं।
डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार देश की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को मजबूत कर रहा है। बंदरगाहों, हवाई अड्डों और अंतर्देशीय जलमार्गों की बढ़ती क्षमता भारत को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने के नए रास्ते खोल रही है। रेलवे विद्युतीकरण और बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार ऊर्जा और परिवहन प्रणालियों की पहुंच तथा दक्षता बढ़ा रहा है। दूसरी ओर, सौर और नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में वृद्धि भारत के ऊर्जा मिश्रण को भी बदल रही है।
औद्योगिक स्तर पर स्टील, कोयला, गैस बुनियादी ढांचे और रक्षा उत्पादन में बढ़ोतरी घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने की व्यापक कोशिश को दर्शाती है। खास तौर पर भारत के बढ़ते रक्षा निर्यात इस बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत हैं। देश अब केवल अत्याधुनिक रक्षा उपकरणों का बड़ा आयातक बने रहने के बजाय वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण निर्माता और निर्यातक बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
इस बदलाव में स्टार्टअप इकोसिस्टम एक अलग आयाम जोड़ता है।
सिर्फ बुनियादी ढांचा किसी आधुनिक अर्थव्यवस्था का निर्माण नहीं कर सकता। इसके साथ उद्यमिता, नवाचार, पूंजी तक पहुंच, डिजिटल कनेक्टिविटी और नई तकनीकों के अनुरूप खुद को ढालने वाली कुशल कार्यशक्ति भी जरूरी है। 2014 के बाद मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या में हुई तेज वृद्धि यह संकेत देती है कि आर्थिक आकांक्षाएं भी बदल रही हैं। युवा भारतीय अब केवल नौकरी पाने वाले नहीं, बल्कि उद्यमी, तकनीक विकसित करने वाले और नए व्यवसाय खड़े करने वाले भी बन रहे हैं।
इस परिवर्तन के साथ कई महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार भी हुए हैं। इनमें वस्तु एवं सेवा कर यानी GST का लागू होना, श्रम सुधार, पुराने और अप्रासंगिक कानूनों को समाप्त करना तथा बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत करने के प्रयास शामिल हैं। बैंकिंग क्षेत्र में पुनर्पूंजीकरण और उसके बाद गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी NPAs में आई गिरावट ने ऋण और निवेश के लिए अपेक्षाकृत मजबूत आधार तैयार करने में भूमिका निभाई है।
ये संस्थागत बदलाव किसी नए एक्सप्रेसवे या मेट्रो लाइन की तरह तुरंत दिखाई नहीं देते, लेकिन आधुनिक अर्थव्यवस्था के सुचारु संचालन के लिए इनका महत्व कम नहीं है।
बुनियादी ढांचे के विकास का सामाजिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
घरों तक नल से पानी पहुंचाने का विस्तार इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। पानी का कनेक्शन सिर्फ किसी सरकारी रिपोर्ट में दर्ज एक आंकड़ा नहीं है। लाखों परिवारों के लिए इसका अर्थ है पानी लाने में लगने वाले घंटों की बचत और रोजमर्रा की जिंदगी में अधिक सुविधा और सुरक्षा। इसी तरह मेडिकल कॉलेजों, MBBS सीटों और AIIMS संस्थानों की संख्या में वृद्धि केवल इमारतों और सीटों की संख्या बढ़ना नहीं है। इसका अर्थ है डॉक्टर तैयार करने की देश की क्षमता में विस्तार, बेहतर चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच और बड़े महानगरों से बाहर भी मेडिकल इकोसिस्टम का विकास।
मेट्रो रेल भी शहरी भारत में इसी बदलाव की एक मिसाल है।
एक आम यात्री के लिए मेट्रो की कीमत किलोमीटर में नहीं मापी जाती। उसकी असली कीमत उस समय में है जो रोजाना बचता है, उन यात्राओं की निश्चितता में है जो पहले ट्रैफिक पर निर्भर थीं और उस सुविधा में है जिसके कारण किसी व्यक्ति के लिए शहर के अलग-अलग हिस्सों में रहना और काम करना संभव हो जाता है, बिना हर दिन कई घंटे सड़क पर गंवाए।
यहीं बुनियादी ढांचे की वास्तविक आर्थिक उपयोगिता सामने आती है—निर्माण पूरा होने के बाद पैदा होने वाले अवसरों में।
सड़क इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उस पर लोग और सामान तेजी से पहुंच सकते हैं। बंदरगाह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कारोबारी अधिक कुशलता से व्यापार कर सकते हैं। बिजली इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उद्योग उत्पादन कर सकते हैं। इंटरनेट और डिजिटल बुनियादी ढांचा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि व्यवसाय ग्राहकों तक और सरकारी सेवाएं नागरिकों तक अधिक तेजी से पहुंच सकती हैं। मेडिकल कॉलेज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह डॉक्टर और स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता तैयार करता है।
दूसरे शब्दों में, बुनियादी ढांचा तभी सार्थक होता है जब वह कारोबार की लागत कम करे, सेवाओं तक पहुंच आसान बनाए और आम नागरिकों के सामने उपलब्ध विकल्पों का दायरा बढ़ाए। हालांकि, विकास की इस तस्वीर के साथ उन चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जो अभी भी मौजूद हैं।
भारत एक विशाल और असमान देश है। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता में काफी अंतर है। शहरी ट्रैफिक आज भी बड़ी समस्या है। लॉजिस्टिक्स लागत में सुधार के बावजूद इसे और कम करने की गुंजाइश बनी हुई है। गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य और शिक्षा तक पहुंच अभी भी समान नहीं है। बड़ी परियोजनाओं को भूमि, पर्यावरण, देरी और लागत बढ़ने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
इसके अलावा, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को केवल राजनीतिक समयसीमा में देखना भी सही नहीं होगा। किसी बड़े प्रोजेक्ट की योजना, वित्तीय व्यवस्था, निर्माण और अंतिम रूप से शुरू होने की प्रक्रिया में कई साल लग सकते हैं। 2014 के बाद पूरी हुई कुछ परियोजनाओं की नींव पहले की सरकारों के कार्यकाल में रखी गई हो सकती है, उसी तरह आज शुरू की गई कई परियोजनाएं आने वाले वर्षों में पूरी होंगी।
इसलिए किसी भी गंभीर मूल्यांकन में नीति की शुरुआत, निर्माण और अंतिम रूप से परियोजना के चालू होने के बीच अंतर करना जरूरी है। लेकिन यह ऐतिहासिक तथ्य पिछले बारह वर्षों में हुए व्यापक विस्तार के पैमाने को कम नहीं करता। अब असली सवाल यह है कि आगे क्या होगा। बुनियादी ढांचा बनाना पहला चरण है। उसका कुशल इस्तेमाल करना कहीं बड़ी चुनौती है।
अगले चरण में भारत को अपनी भौतिक क्षमता को अधिक उत्पादकता, बेहतर रोजगार, मजबूत विनिर्माण, बड़े निर्यात और बेहतर जीवन स्तर में बदलना होगा। फ्रेट कॉरिडोर को प्रतिस्पर्धी लॉजिस्टिक्स में बदलना होगा। एक्सप्रेसवे को औद्योगिक विकास का आधार बनाना होगा। बंदरगाहों को वैश्विक व्यापार के प्रभावी द्वार बनाना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा के साथ पर्याप्त स्टोरेज और ट्रांसमिशन क्षमता विकसित करनी होगी। स्टार्टअप्स को टिकाऊ और बड़े व्यवसायों में बदलना होगा। रक्षा उत्पादन को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी निर्यात क्षमता में बदलना होगा। मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को सुलभ और किफायती स्वास्थ्य सेवाओं में परिवर्तित करना होगा।
यानी आने वाला दशक केवल इस बात से नहीं मापा जा सकता कि भारत ने कितना बनाया। असली पैमाना यह होगा कि भारत ने जो बनाया, उससे वह कितना हासिल कर पाया। यही भारत में हो रहे बुनियादी ढांचे के बदलाव का व्यापक महत्व है। देश अब केवल अपनी पुरानी कमियों को पूरा करने के दौर से आगे बढ़कर ऐसी क्षमता तैयार करने की दिशा में बढ़ रहा है, जो तेज आर्थिक विकास का आधार बन सके।
भारत में बन रही सड़कें, रेलवे लाइनें, हवाई अड्डे, बंदरगाह, बिजली ग्रिड, पानी के कनेक्शन, अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, कारखाने और स्टार्टअप अलग-अलग कहानियां नहीं हैं। ये सभी एक बड़े आर्थिक परिवर्तन के आपस में जुड़े हिस्से हैं। आखिरकार, इस पूरी प्रक्रिया की सफलता इसी बात से तय होगी कि बढ़ती क्षमता क्या एक अधिक उत्पादक अर्थव्यवस्था, अधिक प्रतिस्पर्धी उद्योग, बेहतर रोजगार, ज्यादा क्षेत्रीय अवसर और बेहतर जीवन स्तर में बदल पाती है या नहीं।
अगर पिछले बारह वर्ष बड़े पैमाने पर आधार तैयार करने के रहे हैं, तो आने वाले वर्ष उस आधार को परिणाम में बदलने के होंगे। भारत के बुनियादी ढांचे के इस दशक का वास्तविक मूल्यांकन आखिरकार किलोमीटर की संख्या, बनाए गए संस्थानों या जोड़ी गई क्षमता से नहीं होगा। असली सवाल यह होगा कि क्या ये निवेश करोड़ों भारतीयों को पहले की पीढ़ी की तुलना में अधिक अवसरों के साथ आगे बढ़ने, काम करने, व्यापार करने, पढ़ने, नवाचार करने और बेहतर जीवन जीने में मदद करते हैं।
सड़कों से स्टार्टअप तक: नए भारत की बदलती आर्थिक तस्वीर
Digital Desk
पिछले बारह वर्षों में भारत के बुनियादी ढांचे की कहानी को केवल सड़कों, रेलवे, हवाई अड्डों, बिजली संयंत्रों या चिकित्सा संस्थानों की संख्या के रूप में देखना अधूरा होगा। यह दरअसल उस क्षमता के निर्माण की कहानी है, जिसकी मदद से भारत एक कहीं बड़ी और अधिक महत्वाकांक्षी अर्थव्यवस्था का आधार तैयार कर रहा है।
इस बदलाव का महत्व तब और स्पष्ट होता है जब अलग-अलग क्षेत्रों को एक साथ देखा जाए। कोई डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर सिर्फ एक रेलवे परियोजना नहीं है। उसकी असली उपयोगिता तब सामने आती है जब वह विनिर्माण केंद्रों को बंदरगाहों से जोड़ता है। कोई नया एक्सप्रेसवे केवल कंक्रीट की बनी सड़क नहीं है; वह उत्पादकों, उपभोक्ताओं और बाजारों के बीच की दूरी और समय को कम करता है। एक नया हवाई अड्डा पूरे क्षेत्र की आर्थिक संभावनाओं को बदल सकता है। एक ट्रांसमिशन लाइन एक राज्य में पैदा हुई नवीकरणीय ऊर्जा को दूसरे राज्य तक पहुंचा सकती है। वहीं, एक मेडिकल कॉलेज सिर्फ डॉक्टर तैयार नहीं करता, बल्कि उसके आसपास अस्पतालों, प्रयोगशालाओं, नर्सिंग पेशेवरों और अन्य कुशल रोजगार का पूरा तंत्र विकसित हो सकता है।
भारत के बुनियादी ढांचे के विस्तार की शायद सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यही आपसी जुड़ाव है।
कई दशकों तक भारत की विकास संबंधी चुनौती को अक्सर कमी के रूप में देखा जाता था—सड़कों की कमी, बिजली की कमी, स्वास्थ्य संस्थानों की कमी, परिवहन संपर्क की कमी और औद्योगिक क्षमता की कमी। अब लक्ष्य धीरे-धीरे केवल इन कमियों को दूर करने से आगे बढ़कर ऐसा पूरा इकोसिस्टम तैयार करने की ओर बढ़ रहा है, जो लंबे समय तक आर्थिक विस्तार को सहारा दे सके।
इस बदलाव के संकेत अलग-अलग क्षेत्रों में दिखाई देने लगे हैं।
डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार देश की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को मजबूत कर रहा है। बंदरगाहों, हवाई अड्डों और अंतर्देशीय जलमार्गों की बढ़ती क्षमता भारत को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने के नए रास्ते खोल रही है। रेलवे विद्युतीकरण और बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार ऊर्जा और परिवहन प्रणालियों की पहुंच तथा दक्षता बढ़ा रहा है। दूसरी ओर, सौर और नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में वृद्धि भारत के ऊर्जा मिश्रण को भी बदल रही है।
औद्योगिक स्तर पर स्टील, कोयला, गैस बुनियादी ढांचे और रक्षा उत्पादन में बढ़ोतरी घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने की व्यापक कोशिश को दर्शाती है। खास तौर पर भारत के बढ़ते रक्षा निर्यात इस बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत हैं। देश अब केवल अत्याधुनिक रक्षा उपकरणों का बड़ा आयातक बने रहने के बजाय वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण निर्माता और निर्यातक बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
इस बदलाव में स्टार्टअप इकोसिस्टम एक अलग आयाम जोड़ता है।
सिर्फ बुनियादी ढांचा किसी आधुनिक अर्थव्यवस्था का निर्माण नहीं कर सकता। इसके साथ उद्यमिता, नवाचार, पूंजी तक पहुंच, डिजिटल कनेक्टिविटी और नई तकनीकों के अनुरूप खुद को ढालने वाली कुशल कार्यशक्ति भी जरूरी है। 2014 के बाद मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या में हुई तेज वृद्धि यह संकेत देती है कि आर्थिक आकांक्षाएं भी बदल रही हैं। युवा भारतीय अब केवल नौकरी पाने वाले नहीं, बल्कि उद्यमी, तकनीक विकसित करने वाले और नए व्यवसाय खड़े करने वाले भी बन रहे हैं।
इस परिवर्तन के साथ कई महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार भी हुए हैं। इनमें वस्तु एवं सेवा कर यानी GST का लागू होना, श्रम सुधार, पुराने और अप्रासंगिक कानूनों को समाप्त करना तथा बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत करने के प्रयास शामिल हैं। बैंकिंग क्षेत्र में पुनर्पूंजीकरण और उसके बाद गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी NPAs में आई गिरावट ने ऋण और निवेश के लिए अपेक्षाकृत मजबूत आधार तैयार करने में भूमिका निभाई है।
ये संस्थागत बदलाव किसी नए एक्सप्रेसवे या मेट्रो लाइन की तरह तुरंत दिखाई नहीं देते, लेकिन आधुनिक अर्थव्यवस्था के सुचारु संचालन के लिए इनका महत्व कम नहीं है।
बुनियादी ढांचे के विकास का सामाजिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
घरों तक नल से पानी पहुंचाने का विस्तार इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। पानी का कनेक्शन सिर्फ किसी सरकारी रिपोर्ट में दर्ज एक आंकड़ा नहीं है। लाखों परिवारों के लिए इसका अर्थ है पानी लाने में लगने वाले घंटों की बचत और रोजमर्रा की जिंदगी में अधिक सुविधा और सुरक्षा। इसी तरह मेडिकल कॉलेजों, MBBS सीटों और AIIMS संस्थानों की संख्या में वृद्धि केवल इमारतों और सीटों की संख्या बढ़ना नहीं है। इसका अर्थ है डॉक्टर तैयार करने की देश की क्षमता में विस्तार, बेहतर चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच और बड़े महानगरों से बाहर भी मेडिकल इकोसिस्टम का विकास।
मेट्रो रेल भी शहरी भारत में इसी बदलाव की एक मिसाल है।
एक आम यात्री के लिए मेट्रो की कीमत किलोमीटर में नहीं मापी जाती। उसकी असली कीमत उस समय में है जो रोजाना बचता है, उन यात्राओं की निश्चितता में है जो पहले ट्रैफिक पर निर्भर थीं और उस सुविधा में है जिसके कारण किसी व्यक्ति के लिए शहर के अलग-अलग हिस्सों में रहना और काम करना संभव हो जाता है, बिना हर दिन कई घंटे सड़क पर गंवाए।
यहीं बुनियादी ढांचे की वास्तविक आर्थिक उपयोगिता सामने आती है—निर्माण पूरा होने के बाद पैदा होने वाले अवसरों में।
सड़क इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उस पर लोग और सामान तेजी से पहुंच सकते हैं। बंदरगाह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कारोबारी अधिक कुशलता से व्यापार कर सकते हैं। बिजली इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उद्योग उत्पादन कर सकते हैं। इंटरनेट और डिजिटल बुनियादी ढांचा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि व्यवसाय ग्राहकों तक और सरकारी सेवाएं नागरिकों तक अधिक तेजी से पहुंच सकती हैं। मेडिकल कॉलेज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह डॉक्टर और स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता तैयार करता है।
दूसरे शब्दों में, बुनियादी ढांचा तभी सार्थक होता है जब वह कारोबार की लागत कम करे, सेवाओं तक पहुंच आसान बनाए और आम नागरिकों के सामने उपलब्ध विकल्पों का दायरा बढ़ाए। हालांकि, विकास की इस तस्वीर के साथ उन चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जो अभी भी मौजूद हैं।
भारत एक विशाल और असमान देश है। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता में काफी अंतर है। शहरी ट्रैफिक आज भी बड़ी समस्या है। लॉजिस्टिक्स लागत में सुधार के बावजूद इसे और कम करने की गुंजाइश बनी हुई है। गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य और शिक्षा तक पहुंच अभी भी समान नहीं है। बड़ी परियोजनाओं को भूमि, पर्यावरण, देरी और लागत बढ़ने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
इसके अलावा, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को केवल राजनीतिक समयसीमा में देखना भी सही नहीं होगा। किसी बड़े प्रोजेक्ट की योजना, वित्तीय व्यवस्था, निर्माण और अंतिम रूप से शुरू होने की प्रक्रिया में कई साल लग सकते हैं। 2014 के बाद पूरी हुई कुछ परियोजनाओं की नींव पहले की सरकारों के कार्यकाल में रखी गई हो सकती है, उसी तरह आज शुरू की गई कई परियोजनाएं आने वाले वर्षों में पूरी होंगी।
इसलिए किसी भी गंभीर मूल्यांकन में नीति की शुरुआत, निर्माण और अंतिम रूप से परियोजना के चालू होने के बीच अंतर करना जरूरी है। लेकिन यह ऐतिहासिक तथ्य पिछले बारह वर्षों में हुए व्यापक विस्तार के पैमाने को कम नहीं करता। अब असली सवाल यह है कि आगे क्या होगा। बुनियादी ढांचा बनाना पहला चरण है। उसका कुशल इस्तेमाल करना कहीं बड़ी चुनौती है।
अगले चरण में भारत को अपनी भौतिक क्षमता को अधिक उत्पादकता, बेहतर रोजगार, मजबूत विनिर्माण, बड़े निर्यात और बेहतर जीवन स्तर में बदलना होगा। फ्रेट कॉरिडोर को प्रतिस्पर्धी लॉजिस्टिक्स में बदलना होगा। एक्सप्रेसवे को औद्योगिक विकास का आधार बनाना होगा। बंदरगाहों को वैश्विक व्यापार के प्रभावी द्वार बनाना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा के साथ पर्याप्त स्टोरेज और ट्रांसमिशन क्षमता विकसित करनी होगी। स्टार्टअप्स को टिकाऊ और बड़े व्यवसायों में बदलना होगा। रक्षा उत्पादन को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी निर्यात क्षमता में बदलना होगा। मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को सुलभ और किफायती स्वास्थ्य सेवाओं में परिवर्तित करना होगा।
यानी आने वाला दशक केवल इस बात से नहीं मापा जा सकता कि भारत ने कितना बनाया। असली पैमाना यह होगा कि भारत ने जो बनाया, उससे वह कितना हासिल कर पाया। यही भारत में हो रहे बुनियादी ढांचे के बदलाव का व्यापक महत्व है। देश अब केवल अपनी पुरानी कमियों को पूरा करने के दौर से आगे बढ़कर ऐसी क्षमता तैयार करने की दिशा में बढ़ रहा है, जो तेज आर्थिक विकास का आधार बन सके।
भारत में बन रही सड़कें, रेलवे लाइनें, हवाई अड्डे, बंदरगाह, बिजली ग्रिड, पानी के कनेक्शन, अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, कारखाने और स्टार्टअप अलग-अलग कहानियां नहीं हैं। ये सभी एक बड़े आर्थिक परिवर्तन के आपस में जुड़े हिस्से हैं। आखिरकार, इस पूरी प्रक्रिया की सफलता इसी बात से तय होगी कि बढ़ती क्षमता क्या एक अधिक उत्पादक अर्थव्यवस्था, अधिक प्रतिस्पर्धी उद्योग, बेहतर रोजगार, ज्यादा क्षेत्रीय अवसर और बेहतर जीवन स्तर में बदल पाती है या नहीं।
अगर पिछले बारह वर्ष बड़े पैमाने पर आधार तैयार करने के रहे हैं, तो आने वाले वर्ष उस आधार को परिणाम में बदलने के होंगे। भारत के बुनियादी ढांचे के इस दशक का वास्तविक मूल्यांकन आखिरकार किलोमीटर की संख्या, बनाए गए संस्थानों या जोड़ी गई क्षमता से नहीं होगा। असली सवाल यह होगा कि क्या ये निवेश करोड़ों भारतीयों को पहले की पीढ़ी की तुलना में अधिक अवसरों के साथ आगे बढ़ने, काम करने, व्यापार करने, पढ़ने, नवाचार करने और बेहतर जीवन जीने में मदद करते हैं।
Recommended for You
दैनिक जागरण से जुड़ें:
देश-प्रदेश की ताज़ा ख़बरों को सबसे पहले पढ़ने के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल को फॉलो करें:
