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सबरीमाला केस सुनवाई: SC में ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ पर टिप्पणी
नेशनल न्यूज
सबरीमाला केस सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा- बिना ठोस स्रोत जानकारी स्वीकार नहींसुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान टिप्पणियों ने बहस को नया मोड़ दे दिया। धार्मिक परंपरा बनाम संवैधानिक अधिकार पर फिर से गहन चर्चा तेज हुई।
सबरीमाला केस सुनवाई के दौरान गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण टिप्पणियां सामने आईं, जब जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने स्पष्ट कहा कि “व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी” से मिली जानकारी को अदालत स्वीकार नहीं कर सकती। यह टिप्पणी उस समय आई, जब दलीलों के दौरान विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी को स्वीकार करने पर बहस चल रही थी। अदालत ने यह भी साफ किया कि निजी लेख या विचार, जैसे कि किसी नेता का लेख, कानूनी आधार नहीं बन सकते।
सबरीमाला केस सुनवाई इस समय देश में धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता से जुड़े बड़े संवैधानिक प्रश्नों के केंद्र में है। 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नौ जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि किसी भी धार्मिक प्रथा की वैधता का परीक्षण ठोस सबूत और संवैधानिक कसौटियों के आधार पर ही किया जाएगा।
दलीलों में टकराव
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने तर्क दिया कि ज्ञान और जानकारी किसी भी स्रोत से मिले, उसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत को प्रमाणिक और सत्यापित स्रोतों पर ही भरोसा करना होगा।
इसी दौरान चीफ जस्टिस ने भी स्पष्ट किया कि किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति का लेख, चाहे वह कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, व्यक्तिगत राय ही माना जाएगा। सूत्रों के मुताबिक, अदालत का यह रुख इस बात को रेखांकित करता है कि न्यायिक प्रक्रिया में केवल प्रमाणिक और कानूनी रूप से स्वीकार्य सामग्री ही अहम होती है।
संवैधानिक बहस
धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार को लेकर सुनवाई में अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या पर भी गहन चर्चा हुई। अदालत ने पूछा कि किसी प्रथा को “आवश्यक धार्मिक प्रथा” मानने का आधार क्या होना चाहिए।
एडवोकेट्स ने अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि हर धार्मिक प्रथा को अनिवार्य नहीं माना जा सकता, खासकर जब वह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ हो। रिपोर्ट्स के अनुसार, अदालत इस बात पर विचार कर रही है कि क्या धार्मिक परंपराओं के नाम पर भेदभाव को वैध ठहराया जा सकता है।
क्या है विवाद
सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी, लेकिन इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।
इसके बाद मामला बड़ी संविधान पीठ को सौंपा गया, जहां अब व्यापक स्तर पर यह तय किया जा रहा है कि धार्मिक संस्थाओं के अधिकार और व्यक्तिगत मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
अधिकारियों के अनुसार, केंद्र सरकार ने पहले भी अपनी दलीलों में कहा है कि धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। वहीं, याचिकाकर्ताओं का पक्ष है कि संविधान के तहत समानता और गैर-भेदभाव का अधिकार सर्वोपरि है।
सूत्रों के मुताबिक, अदालत इस पूरे मामले को केवल एक मंदिर विवाद के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक संवैधानिक सिद्धांतों के संदर्भ में देख रही है।
यह मामला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर के अन्य धार्मिक स्थलों पर लागू हो सकता है। यदि अदालत स्पष्ट दिशा-निर्देश देती है, तो यह कई परंपराओं और व्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकता है।
आगे की सुनवाई में विभिन्न पक्ष अपनी दलीलें जारी रखेंगे और अदालत सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद अंतिम फैसला सुनाएगी।
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सबरीमाला केस सुनवाई: SC में ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ पर टिप्पणी
नेशनल न्यूज
सबरीमाला केस सुनवाई के दौरान गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण टिप्पणियां सामने आईं, जब जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने स्पष्ट कहा कि “व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी” से मिली जानकारी को अदालत स्वीकार नहीं कर सकती। यह टिप्पणी उस समय आई, जब दलीलों के दौरान विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी को स्वीकार करने पर बहस चल रही थी। अदालत ने यह भी साफ किया कि निजी लेख या विचार, जैसे कि किसी नेता का लेख, कानूनी आधार नहीं बन सकते।
सबरीमाला केस सुनवाई इस समय देश में धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता से जुड़े बड़े संवैधानिक प्रश्नों के केंद्र में है। 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नौ जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि किसी भी धार्मिक प्रथा की वैधता का परीक्षण ठोस सबूत और संवैधानिक कसौटियों के आधार पर ही किया जाएगा।
दलीलों में टकराव
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने तर्क दिया कि ज्ञान और जानकारी किसी भी स्रोत से मिले, उसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत को प्रमाणिक और सत्यापित स्रोतों पर ही भरोसा करना होगा।
इसी दौरान चीफ जस्टिस ने भी स्पष्ट किया कि किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति का लेख, चाहे वह कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, व्यक्तिगत राय ही माना जाएगा। सूत्रों के मुताबिक, अदालत का यह रुख इस बात को रेखांकित करता है कि न्यायिक प्रक्रिया में केवल प्रमाणिक और कानूनी रूप से स्वीकार्य सामग्री ही अहम होती है।
संवैधानिक बहस
धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार को लेकर सुनवाई में अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या पर भी गहन चर्चा हुई। अदालत ने पूछा कि किसी प्रथा को “आवश्यक धार्मिक प्रथा” मानने का आधार क्या होना चाहिए।
एडवोकेट्स ने अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि हर धार्मिक प्रथा को अनिवार्य नहीं माना जा सकता, खासकर जब वह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ हो। रिपोर्ट्स के अनुसार, अदालत इस बात पर विचार कर रही है कि क्या धार्मिक परंपराओं के नाम पर भेदभाव को वैध ठहराया जा सकता है।
क्या है विवाद
सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी, लेकिन इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।
इसके बाद मामला बड़ी संविधान पीठ को सौंपा गया, जहां अब व्यापक स्तर पर यह तय किया जा रहा है कि धार्मिक संस्थाओं के अधिकार और व्यक्तिगत मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
अधिकारियों के अनुसार, केंद्र सरकार ने पहले भी अपनी दलीलों में कहा है कि धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। वहीं, याचिकाकर्ताओं का पक्ष है कि संविधान के तहत समानता और गैर-भेदभाव का अधिकार सर्वोपरि है।
सूत्रों के मुताबिक, अदालत इस पूरे मामले को केवल एक मंदिर विवाद के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक संवैधानिक सिद्धांतों के संदर्भ में देख रही है।
यह मामला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर के अन्य धार्मिक स्थलों पर लागू हो सकता है। यदि अदालत स्पष्ट दिशा-निर्देश देती है, तो यह कई परंपराओं और व्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकता है।
आगे की सुनवाई में विभिन्न पक्ष अपनी दलीलें जारी रखेंगे और अदालत सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद अंतिम फैसला सुनाएगी।
