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आईटीसी की पहल से दिव्यांग युवाओं को मिला रोजगार, 2300 से ज्यादा को नौकरी
देश में दिव्यांग युवाओं के लिए रोजगार हासिल करना अब भी आसान नहीं माना जाता, खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में। ऐसे माहौल में ITC Limited की कौशल विकास पहल ने हजारों युवाओं के लिए नई उम्मीद पैदा की है। कंपनी की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक अब तक 2,300 से ज्यादा दिव्यांग युवाओं को ट्रेनिंग देकर औपचारिक रोजगार से जोड़ा गया है। यह पहल फिलहाल देश के कई शहरों तक पहुंच चुकी है और अलग-अलग सेक्टर में युवाओं को काम मिल रहा है। बेंगलुरु एयरपोर्ट से लेकर कोलकाता के हॉस्पिटैलिटी सेक्टर और उत्तर प्रदेश के अकाउंटिंग ऑफिस तक, इन युवाओं की मौजूदगी अब साफ दिखाई देने लगी है।
आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले की रहने वाली 33 वर्षीय कावली ज्योति की कहानी भी इसी पहल से जुड़ी हुई है। 65 प्रतिशत लोकोमोटर डिसएबिलिटी के बावजूद उन्होंने लंबे समय तक आर्थिक और सामाजिक परेशानियों का सामना किया। बताया जा रहा है कि रोजगार के मौके लगभग बंद हो चुके थे। लेकिन ट्रेनिंग के बाद अब वह बेंगलुरु के केंपेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर कस्टमर सपोर्ट एसोसिएट के रूप में काम कर रही हैं और हर महीने करीब 16 हजार रुपये कमा रही हैं। परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ बंटाने के साथ-साथ अब उनके गांव में लोग उन्हें प्रेरणा की तरह देखने लगे हैं।
ऐसी ही कई कहानियां दूसरे राज्यों से भी सामने आई हैं। महाराष्ट्र के पुणे जिले के दृष्टिबाधित युवक जयराम रमेश सोनुने को कंप्यूटर और कम्युनिकेशन की ट्रेनिंग के बाद एयरपोर्ट पर नौकरी मिली। वहीं उत्तर प्रदेश के बाराबंकी निवासी सुनील कुमार अब अकाउंटेंट के तौर पर काम कर रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार इस प्रोग्राम में सिर्फ तकनीकी प्रशिक्षण ही नहीं दिया जाता, बल्कि अंग्रेजी बोलना, डिजिटल साक्षरता, इंटरव्यू तैयारी और कार्यस्थल पर व्यवहार जैसी चीजों पर भी फोकस किया जाता है। जरूरत पड़ने पर साइन लैंग्वेज इंटरप्रेटर और मेंटरशिप की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाती है।
जनवरी 2023 में शुरू हुई यह पहल अब बेंगलुरु, मैसुरु, लखनऊ, कोलकाता, पुणे और भुवनेश्वर जैसे शहरों तक पहुंच चुकी है। बताया जा रहा है कि यह काम कई सामाजिक संगठनों के सहयोग से चल रहा है। कंपनी के आंकड़ों के मुताबिक अब तक प्रशिक्षित युवाओं में 30 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं हैं। कई प्रतिभागियों को रिटेल, हॉस्पिटैलिटी, कस्टमर सपोर्ट, लॉजिस्टिक्स और बैक ऑफिस जैसे सेक्टर में रोजगार मिला है।
भारत में दिव्यांगजनों की रोजगार स्थिति को लेकर आंकड़े अब भी चिंता बढ़ाते हैं। कंपनी के अनुसार देश में बड़ी संख्या में दिव्यांग लोग ग्रामीण इलाकों में रहते हैं और रोजगार के अवसर सीमित हैं। ऐसे में इस तरह के स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम को अहम माना जा रहा है। कंपनी के सोशल इन्वेस्टमेंट्स विभाग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मकसद सिर्फ नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ाना भी है।
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आईटीसी की पहल से दिव्यांग युवाओं को मिला रोजगार, 2300 से ज्यादा को नौकरी
देश में दिव्यांग युवाओं के लिए रोजगार हासिल करना अब भी आसान नहीं माना जाता, खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में। ऐसे माहौल में ITC Limited की कौशल विकास पहल ने हजारों युवाओं के लिए नई उम्मीद पैदा की है। कंपनी की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक अब तक 2,300 से ज्यादा दिव्यांग युवाओं को ट्रेनिंग देकर औपचारिक रोजगार से जोड़ा गया है। यह पहल फिलहाल देश के कई शहरों तक पहुंच चुकी है और अलग-अलग सेक्टर में युवाओं को काम मिल रहा है। बेंगलुरु एयरपोर्ट से लेकर कोलकाता के हॉस्पिटैलिटी सेक्टर और उत्तर प्रदेश के अकाउंटिंग ऑफिस तक, इन युवाओं की मौजूदगी अब साफ दिखाई देने लगी है।
आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले की रहने वाली 33 वर्षीय कावली ज्योति की कहानी भी इसी पहल से जुड़ी हुई है। 65 प्रतिशत लोकोमोटर डिसएबिलिटी के बावजूद उन्होंने लंबे समय तक आर्थिक और सामाजिक परेशानियों का सामना किया। बताया जा रहा है कि रोजगार के मौके लगभग बंद हो चुके थे। लेकिन ट्रेनिंग के बाद अब वह बेंगलुरु के केंपेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर कस्टमर सपोर्ट एसोसिएट के रूप में काम कर रही हैं और हर महीने करीब 16 हजार रुपये कमा रही हैं। परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ बंटाने के साथ-साथ अब उनके गांव में लोग उन्हें प्रेरणा की तरह देखने लगे हैं।
ऐसी ही कई कहानियां दूसरे राज्यों से भी सामने आई हैं। महाराष्ट्र के पुणे जिले के दृष्टिबाधित युवक जयराम रमेश सोनुने को कंप्यूटर और कम्युनिकेशन की ट्रेनिंग के बाद एयरपोर्ट पर नौकरी मिली। वहीं उत्तर प्रदेश के बाराबंकी निवासी सुनील कुमार अब अकाउंटेंट के तौर पर काम कर रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार इस प्रोग्राम में सिर्फ तकनीकी प्रशिक्षण ही नहीं दिया जाता, बल्कि अंग्रेजी बोलना, डिजिटल साक्षरता, इंटरव्यू तैयारी और कार्यस्थल पर व्यवहार जैसी चीजों पर भी फोकस किया जाता है। जरूरत पड़ने पर साइन लैंग्वेज इंटरप्रेटर और मेंटरशिप की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाती है।
जनवरी 2023 में शुरू हुई यह पहल अब बेंगलुरु, मैसुरु, लखनऊ, कोलकाता, पुणे और भुवनेश्वर जैसे शहरों तक पहुंच चुकी है। बताया जा रहा है कि यह काम कई सामाजिक संगठनों के सहयोग से चल रहा है। कंपनी के आंकड़ों के मुताबिक अब तक प्रशिक्षित युवाओं में 30 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं हैं। कई प्रतिभागियों को रिटेल, हॉस्पिटैलिटी, कस्टमर सपोर्ट, लॉजिस्टिक्स और बैक ऑफिस जैसे सेक्टर में रोजगार मिला है।
भारत में दिव्यांगजनों की रोजगार स्थिति को लेकर आंकड़े अब भी चिंता बढ़ाते हैं। कंपनी के अनुसार देश में बड़ी संख्या में दिव्यांग लोग ग्रामीण इलाकों में रहते हैं और रोजगार के अवसर सीमित हैं। ऐसे में इस तरह के स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम को अहम माना जा रहा है। कंपनी के सोशल इन्वेस्टमेंट्स विभाग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मकसद सिर्फ नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ाना भी है।
