राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान सोमवार को लोकसभा का माहौल उस समय तनावपूर्ण हो गया, जब विपक्ष के नेता ने चीन और डोकलाम से जुड़े एक कथित सैन्य संदर्भ का उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि भारतीय सीमा के पास चीनी टैंक आगे बढ़ रहे थे और यह जानकारी एक पूर्व सैन्य अधिकारी की पुस्तक में दर्ज है। बयान शुरू होते ही सत्ता पक्ष के सदस्यों ने आपत्ति जताई और सदन में जोरदार हंगामा शुरू हो गया।
विपक्ष नेता ने कहा कि वह जिस दस्तावेज का उल्लेख कर रहे हैं, उससे यह स्पष्ट होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर कौन गंभीर है। उनके इस बयान पर रक्षा मंत्री खड़े हुए और पूछा कि जिस पुस्तक या दस्तावेज का हवाला दिया जा रहा है, क्या वह प्रकाशित और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है या नहीं। उन्होंने कहा कि यदि सामग्री आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं है, तो उसका उल्लेख सदन में नहीं किया जा सकता।
लोकसभा अध्यक्ष ने भी हस्तक्षेप करते हुए कहा कि विपक्ष के नेता एक संवैधानिक पद पर हैं और उनसे अपेक्षा है कि वे सदन में केवल प्रमाणिक और आधिकारिक स्रोतों के आधार पर ही बात रखें। अध्यक्ष ने यह भी स्पष्ट किया कि सदन की कार्यवाही नियमों और परंपराओं के अनुसार ही चलेगी।
इसके बावजूद विपक्ष नेता ने दोहराया कि जिस सामग्री का वह हवाला दे रहे हैं, वह पूरी तरह प्रमाणिक है और उसमें शीर्ष स्तर के राजनीतिक नेतृत्व का उल्लेख किया गया है। इस पर रक्षा मंत्री ने फिर कहा कि यदि संबंधित पुस्तक या दस्तावेज प्रकाशित नहीं हुआ है, तो उसे सदन के रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।
बहस के दौरान गृह मंत्री ने भी हस्तक्षेप करते हुए कहा कि जिस जानकारी का हवाला दिया जा रहा है, वह किसी पत्रिका या रिपोर्ट पर आधारित है, और ऐसी रिपोर्ट्स तथ्यात्मक रूप से प्रमाणित नहीं मानी जा सकतीं। उन्होंने कहा कि अप्रकाशित या अप्रमाणित सामग्री के आधार पर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर बयान देना उचित नहीं है।
लगातार बढ़ते हंगामे के बीच लोकसभा अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि सदन में केवल आधिकारिक दस्तावेज, प्रकाशित पुस्तकें या समाचार पत्रों की प्रमाणित रिपोर्ट ही स्वीकार्य हैं। उन्होंने विपक्ष नेता से नियमों का पालन करने का आग्रह किया। इसके बाद भी शोर-शराबा जारी रहने पर अध्यक्ष ने माइक बंद करने के निर्देश दिए।
इस घटनाक्रम के चलते कुछ समय के लिए सदन की कार्यवाही बाधित रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बहस आने वाले दिनों में भी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा और तीखी कर सकती है। यह मामला न केवल संसदीय नियमों बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े बयानों की जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़े करता है।
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