जशोजीत मुखर्जी: संगीत का 9 वर्षीय "वंडर बॉय"

Digital Desk

जिस उम्र में अधिकांश नौ साल के बच्चे वीडियो गेम और डिजिटल स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं, उस उम्र में जशोजीत मुखर्जी सरोद के जटिल सुरों और बारीकियों को साधने में लगे हुए हैं। हिंद मोटर एजुकेशन सेंटर की कक्षा 4 के छात्र जशोजीत एक बाल प्रतिभा के रूप में उभरकर सामने आए हैं। पिछले तीन वर्षों में उन्होंने अपनी मनमोहक प्रस्तुतियों से श्रोताओं को प्रभावित किया है और कई राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में विजय प्राप्त की है।

सुरक्षित हाथों में विरासत

जशोजीत कोई साधारण प्रतिभा नहीं हैं; वे प्रख्यात पंडित जॉयदीप मुखर्जी के पुत्र और गंडा-बांध शिष्य हैं, जो सेनिया शाहजहांपुर घराने के एक प्रतिष्ठित विद्वान और अग्रणी कलाकार माने जाते हैं। अपनी समृद्ध परंपरा और जटिल रबाब-अंग शैली के लिए प्रसिद्ध यह घराना इस नन्हे बालक में अपना नया ध्वजवाहक देख रहा है। अपने पिता के स्नेहपूर्ण किंतु कठोर मार्गदर्शन में जशोजीत उस कला के सूक्ष्म आयाम सीख रहे हैं, जिसे साधने में दशकों की तपस्या लगती है।

पिता-पुत्र की युगल प्रस्तुति को देखना गुरु-शिष्य परंपरा का जीवंत उदाहरण है। जहाँ पंडित जॉयदीप मुखर्जी सूरसिंगार और तानसेनी रबाब जैसे दुर्लभ वाद्यों को पुनर्जीवित करने के लिए विख्यात हैं, वहीं जशोजीत शास्त्रीय सरोद को पूर्णता के साथ साधने पर केंद्रित हैं। उनकी परिपक्वता और उंगलियों की अद्भुत चपलता उनकी कोमल आयु को मानो झुठला देती है।

दो संसारों के बीच एक सुंदर सेतु

जशोजीत का जीवन दो सांस्कृतिक रूप से समृद्ध नगरों का सुंदर संगम है। एक ओर उनका पैतृक घर कोलकाता में है, जो पूर्व भारत की बौद्धिक राजधानी माना जाता है, और दूसरी ओर उनकी मातृभूमि उत्तर प्रदेश के आध्यात्मिक नगर वाराणसी से जुड़ी है। इस कारण वे निरंतर परंपरा की स्वरलहरियों से घिरे रहते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस दोहरी सांस्कृतिक विरासत ने उनकी संगीत-प्रेरणा को और प्रखर किया है, जिससे वे बंगाल की लयात्मक जटिलताओं और बनारस शैली की आत्मीय मिठास को सहजता से आत्मसात कर पा रहे हैं।

किताबों और कांस्य तारों के बीच संतुलन

शास्त्रीय संगीत जगत में बढ़ती ख्याति के बावजूद जशोजीत हिंद मोटर एजुकेशन सेंटर के एक समर्पित छात्र बने हुए हैं। उनके शिक्षक उन्हें एक उज्ज्वल, अनुशासित और मेहनती विद्यार्थी बताते हैं, जो अपनी पढ़ाई और घंटों के रियाज़ के बीच अद्भुत संतुलन बनाए रखते हैं।

एक पारिवारिक निकट सहयोगी का कहना है, “यह केवल पुरस्कारों की बात नहीं है। बात उस आत्मा की है, जो वह हर एक स्वर में डालता है। राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ जीतना निश्चित रूप से एक उपलब्धि है, लेकिन जशोजीत के लिए सरोद ही उसकी आवाज़ है।”

आगे का सफर

पिछले तीन वर्षों में जशोजीत की ट्रॉफियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, लेकिन उनकी यात्रा अभी बस शुरू हुई है। सेनिया शाहजहांपुर घराने के प्रतिनिधि के रूप में वे एक महान संगीत परंपरा का भार अपने कंधों पर लिए हुए हैं। यदि उनकी हाल की प्रस्तुतियाँ कोई संकेत देती हैं, तो भारतीय शास्त्रीय संगीत का भविष्य केवल सुरक्षित ही नहीं, बल्कि सजीव, युवा और अनुगूंजित भी है।

एक और सफल प्रतियोगिता सत्र के समापन के साथ, कोलकाता गर्व से अपने इस “वंडर किड” को देख रहा है, जो एक-एक तार के सहारे अपने अगले आलाप की तैयारी में जुटा है।

 

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09 Apr 2026 By दैनिक जागरण

जशोजीत मुखर्जी: संगीत का 9 वर्षीय "वंडर बॉय"

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जिस उम्र में अधिकांश नौ साल के बच्चे वीडियो गेम और डिजिटल स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं, उस उम्र में जशोजीत मुखर्जी सरोद के जटिल सुरों और बारीकियों को साधने में लगे हुए हैं। हिंद मोटर एजुकेशन सेंटर की कक्षा 4 के छात्र जशोजीत एक बाल प्रतिभा के रूप में उभरकर सामने आए हैं। पिछले तीन वर्षों में उन्होंने अपनी मनमोहक प्रस्तुतियों से श्रोताओं को प्रभावित किया है और कई राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में विजय प्राप्त की है।

सुरक्षित हाथों में विरासत

जशोजीत कोई साधारण प्रतिभा नहीं हैं; वे प्रख्यात पंडित जॉयदीप मुखर्जी के पुत्र और गंडा-बांध शिष्य हैं, जो सेनिया शाहजहांपुर घराने के एक प्रतिष्ठित विद्वान और अग्रणी कलाकार माने जाते हैं। अपनी समृद्ध परंपरा और जटिल रबाब-अंग शैली के लिए प्रसिद्ध यह घराना इस नन्हे बालक में अपना नया ध्वजवाहक देख रहा है। अपने पिता के स्नेहपूर्ण किंतु कठोर मार्गदर्शन में जशोजीत उस कला के सूक्ष्म आयाम सीख रहे हैं, जिसे साधने में दशकों की तपस्या लगती है।

पिता-पुत्र की युगल प्रस्तुति को देखना गुरु-शिष्य परंपरा का जीवंत उदाहरण है। जहाँ पंडित जॉयदीप मुखर्जी सूरसिंगार और तानसेनी रबाब जैसे दुर्लभ वाद्यों को पुनर्जीवित करने के लिए विख्यात हैं, वहीं जशोजीत शास्त्रीय सरोद को पूर्णता के साथ साधने पर केंद्रित हैं। उनकी परिपक्वता और उंगलियों की अद्भुत चपलता उनकी कोमल आयु को मानो झुठला देती है।

दो संसारों के बीच एक सुंदर सेतु

जशोजीत का जीवन दो सांस्कृतिक रूप से समृद्ध नगरों का सुंदर संगम है। एक ओर उनका पैतृक घर कोलकाता में है, जो पूर्व भारत की बौद्धिक राजधानी माना जाता है, और दूसरी ओर उनकी मातृभूमि उत्तर प्रदेश के आध्यात्मिक नगर वाराणसी से जुड़ी है। इस कारण वे निरंतर परंपरा की स्वरलहरियों से घिरे रहते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस दोहरी सांस्कृतिक विरासत ने उनकी संगीत-प्रेरणा को और प्रखर किया है, जिससे वे बंगाल की लयात्मक जटिलताओं और बनारस शैली की आत्मीय मिठास को सहजता से आत्मसात कर पा रहे हैं।

किताबों और कांस्य तारों के बीच संतुलन

शास्त्रीय संगीत जगत में बढ़ती ख्याति के बावजूद जशोजीत हिंद मोटर एजुकेशन सेंटर के एक समर्पित छात्र बने हुए हैं। उनके शिक्षक उन्हें एक उज्ज्वल, अनुशासित और मेहनती विद्यार्थी बताते हैं, जो अपनी पढ़ाई और घंटों के रियाज़ के बीच अद्भुत संतुलन बनाए रखते हैं।

एक पारिवारिक निकट सहयोगी का कहना है, “यह केवल पुरस्कारों की बात नहीं है। बात उस आत्मा की है, जो वह हर एक स्वर में डालता है। राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ जीतना निश्चित रूप से एक उपलब्धि है, लेकिन जशोजीत के लिए सरोद ही उसकी आवाज़ है।”

आगे का सफर

पिछले तीन वर्षों में जशोजीत की ट्रॉफियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, लेकिन उनकी यात्रा अभी बस शुरू हुई है। सेनिया शाहजहांपुर घराने के प्रतिनिधि के रूप में वे एक महान संगीत परंपरा का भार अपने कंधों पर लिए हुए हैं। यदि उनकी हाल की प्रस्तुतियाँ कोई संकेत देती हैं, तो भारतीय शास्त्रीय संगीत का भविष्य केवल सुरक्षित ही नहीं, बल्कि सजीव, युवा और अनुगूंजित भी है।

एक और सफल प्रतियोगिता सत्र के समापन के साथ, कोलकाता गर्व से अपने इस “वंडर किड” को देख रहा है, जो एक-एक तार के सहारे अपने अगले आलाप की तैयारी में जुटा है।

 

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