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TMC में बढ़ी सियासी हलचल, एक और राज्यसभा सांसद ने दिया इस्तीफा
Digital Desk
सुष्मिता देव के इस्तीफे से तृणमूल कांग्रेस को नया झटका, सांसदों और विधायकों की बगावत के बीच ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी सक्रिय
पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस के लिए मुश्किलों का दौर थमता नजर नहीं आ रहा है। पार्टी में लगातार जारी टूट के बीच बुधवार को राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी और संसद दोनों से इस्तीफा देकर राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी। राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन ने उनका इस्तीफा स्वीकार भी कर लिया है। पिछले तीन दिनों में यह दूसरा मौका है जब तृणमूल कांग्रेस के किसी राज्यसभा सांसद ने पार्टी से किनारा किया है। इससे पहले 8 जून को सुखेंदु शेखर ने भी पार्टी और राज्यसभा दोनों से इस्तीफा देकर राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया था।
सुष्मिता देव के इस्तीफे ने ऐसे समय में तृणमूल कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है जब पार्टी पहले से ही सांसदों और विधायकों की बगावत का सामना कर रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि पार्टी के भीतर चल रहे असंतोष की ओर भी संकेत करता है। हालांकि सुष्मिता देव ने अपने इस्तीफे को व्यक्तिगत और राजनीतिक कारणों से जुड़ा फैसला बताया है, लेकिन उनके इस कदम के दूरगामी राजनीतिक असर देखने को मिल सकते हैं।
इस्तीफे के बाद मीडिया से बातचीत में सुष्मिता देव ने कहा कि राज्यसभा की सीट उन्हें पार्टी की ओर से मिली थी, इसलिए पार्टी छोड़ने के साथ उन्होंने संसद की सदस्यता छोड़ना भी उचित समझा। उन्होंने साफ किया कि फिलहाल वह किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल होने को लेकर कोई निर्णय नहीं ले रही हैं। भाजपा में शामिल होने की अटकलों पर उन्होंने कहा कि अभी वह कुछ समय आराम करना चाहती हैं और अपने परिवार के साथ समय बिताएंगी।
इस बीच तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी असंतोष लगातार बड़ा रूप लेता दिखाई दे रहा है। पार्टी के लोकसभा सांसदों और विधायकों के एक बड़े वर्ग ने अलग रुख अपनाया है। हाल के दिनों में बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ी हलचल तब देखने को मिली जब बड़ी संख्या में विधायकों ने अलग गुट बनाकर अपना नेता चुन लिया। बागी खेमे का दावा है कि उनके साथ और भी विधायक जुड़ सकते हैं। इससे पार्टी नेतृत्व की चिंताएं बढ़ गई हैं।
लोकसभा में भी पार्टी की स्थिति चुनौतीपूर्ण होती दिखाई दे रही है। हाल के घटनाक्रमों के बाद तृणमूल कांग्रेस के कई सांसदों ने अलग रुख अपनाया है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि आने वाले दिनों में कुछ और नेता भी अपना फैसला बदल सकते हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व सार्वजनिक रूप से स्थिति को नियंत्रण में बताने की कोशिश कर रहा है, लेकिन लगातार हो रहे इस्तीफे और बगावत के संकेत अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं।
इन घटनाक्रमों के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं। दिल्ली में अभिषेक बनर्जी की कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाकात को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार दोनों नेताओं के बीच विपक्षी एकजुटता और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा हुई। इससे एक दिन पहले ममता बनर्जी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं की बैठक करीब एक घंटे तक चली थी।
तृणमूल कांग्रेस फिलहाल दोहरी चुनौती का सामना कर रही है। एक ओर पार्टी को अपने संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष को संभालना है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका भी मजबूत बनाए रखनी है। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व से लगातार हो रही मुलाकातों को विपक्षी राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। पार्टी में टूट के बाद कई राजनीतिक संभावनाओं पर चर्चा शुरू हो गई है। सबसे पहले कानूनी और संवैधानिक लड़ाई की संभावना जताई जा रही है। बागी गुट और मूल नेतृत्व दोनों अपने-अपने दावों को मजबूत करने की कोशिश करेंगे। विधानसभा, चुनाव आयोग और न्यायालयों में इस मामले को लेकर विवाद बढ़ सकता है। साथ ही दल-बदल कानून को लेकर भी कई सवाल खड़े हो सकते हैं।
यदि बागी नेताओं का प्रभाव बढ़ता है तो राज्य की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं। स्थानीय निकाय चुनावों और भविष्य के विधानसभा चुनावों पर भी इसका असर पड़ सकता है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मान रहे हैं कि यदि मतभेद और गहरे हुए तो अलग राजनीतिक संगठन या स्थायी गुट के रूप में नई ताकत उभर सकती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि तृणमूल कांग्रेस का भविष्य किस दिशा में जाएगा। पार्टी के सामने संगठन को एकजुट रखने की चुनौती है, जबकि बागी गुट अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने की कोशिश में जुटा हुआ है।
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TMC में बढ़ी सियासी हलचल, एक और राज्यसभा सांसद ने दिया इस्तीफा
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पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस के लिए मुश्किलों का दौर थमता नजर नहीं आ रहा है। पार्टी में लगातार जारी टूट के बीच बुधवार को राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी और संसद दोनों से इस्तीफा देकर राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी। राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन ने उनका इस्तीफा स्वीकार भी कर लिया है। पिछले तीन दिनों में यह दूसरा मौका है जब तृणमूल कांग्रेस के किसी राज्यसभा सांसद ने पार्टी से किनारा किया है। इससे पहले 8 जून को सुखेंदु शेखर ने भी पार्टी और राज्यसभा दोनों से इस्तीफा देकर राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया था।
सुष्मिता देव के इस्तीफे ने ऐसे समय में तृणमूल कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है जब पार्टी पहले से ही सांसदों और विधायकों की बगावत का सामना कर रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि पार्टी के भीतर चल रहे असंतोष की ओर भी संकेत करता है। हालांकि सुष्मिता देव ने अपने इस्तीफे को व्यक्तिगत और राजनीतिक कारणों से जुड़ा फैसला बताया है, लेकिन उनके इस कदम के दूरगामी राजनीतिक असर देखने को मिल सकते हैं।
इस्तीफे के बाद मीडिया से बातचीत में सुष्मिता देव ने कहा कि राज्यसभा की सीट उन्हें पार्टी की ओर से मिली थी, इसलिए पार्टी छोड़ने के साथ उन्होंने संसद की सदस्यता छोड़ना भी उचित समझा। उन्होंने साफ किया कि फिलहाल वह किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल होने को लेकर कोई निर्णय नहीं ले रही हैं। भाजपा में शामिल होने की अटकलों पर उन्होंने कहा कि अभी वह कुछ समय आराम करना चाहती हैं और अपने परिवार के साथ समय बिताएंगी।
इस बीच तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी असंतोष लगातार बड़ा रूप लेता दिखाई दे रहा है। पार्टी के लोकसभा सांसदों और विधायकों के एक बड़े वर्ग ने अलग रुख अपनाया है। हाल के दिनों में बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ी हलचल तब देखने को मिली जब बड़ी संख्या में विधायकों ने अलग गुट बनाकर अपना नेता चुन लिया। बागी खेमे का दावा है कि उनके साथ और भी विधायक जुड़ सकते हैं। इससे पार्टी नेतृत्व की चिंताएं बढ़ गई हैं।
लोकसभा में भी पार्टी की स्थिति चुनौतीपूर्ण होती दिखाई दे रही है। हाल के घटनाक्रमों के बाद तृणमूल कांग्रेस के कई सांसदों ने अलग रुख अपनाया है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि आने वाले दिनों में कुछ और नेता भी अपना फैसला बदल सकते हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व सार्वजनिक रूप से स्थिति को नियंत्रण में बताने की कोशिश कर रहा है, लेकिन लगातार हो रहे इस्तीफे और बगावत के संकेत अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं।
इन घटनाक्रमों के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं। दिल्ली में अभिषेक बनर्जी की कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाकात को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार दोनों नेताओं के बीच विपक्षी एकजुटता और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा हुई। इससे एक दिन पहले ममता बनर्जी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं की बैठक करीब एक घंटे तक चली थी।
तृणमूल कांग्रेस फिलहाल दोहरी चुनौती का सामना कर रही है। एक ओर पार्टी को अपने संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष को संभालना है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका भी मजबूत बनाए रखनी है। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व से लगातार हो रही मुलाकातों को विपक्षी राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। पार्टी में टूट के बाद कई राजनीतिक संभावनाओं पर चर्चा शुरू हो गई है। सबसे पहले कानूनी और संवैधानिक लड़ाई की संभावना जताई जा रही है। बागी गुट और मूल नेतृत्व दोनों अपने-अपने दावों को मजबूत करने की कोशिश करेंगे। विधानसभा, चुनाव आयोग और न्यायालयों में इस मामले को लेकर विवाद बढ़ सकता है। साथ ही दल-बदल कानून को लेकर भी कई सवाल खड़े हो सकते हैं।
यदि बागी नेताओं का प्रभाव बढ़ता है तो राज्य की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं। स्थानीय निकाय चुनावों और भविष्य के विधानसभा चुनावों पर भी इसका असर पड़ सकता है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मान रहे हैं कि यदि मतभेद और गहरे हुए तो अलग राजनीतिक संगठन या स्थायी गुट के रूप में नई ताकत उभर सकती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि तृणमूल कांग्रेस का भविष्य किस दिशा में जाएगा। पार्टी के सामने संगठन को एकजुट रखने की चुनौती है, जबकि बागी गुट अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने की कोशिश में जुटा हुआ है।
