- Hindi News
- देश विदेश
- क्यूनेट–विहान ने कथित धोखाधड़ी को नया रूप देने के लिए अपनाई नई रणनीतियां
क्यूनेट–विहान ने कथित धोखाधड़ी को नया रूप देने के लिए अपनाई नई रणनीतियां
Digital Desk
जैसे-जैसे क्यूनेट विहान डायरेक्ट सेलिंग (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड के संचालन से जुड़ी परतें खुल रही हैं, वित्तीय विश्लेषक इस बात से हैरान हैं कि कंपनी ने किस तरह सुनियोजित नेटवर्किंग के जरिए लाखों लोगों का भरोसा हासिल किया, जबकि वह वर्षों से विभिन्न कानूनी विवादों का सामना करती रही है।
करीब एक दशक पहले, वर्ष 2016 में, बहुचर्चित करोड़ों रुपये के क्यूनेट घोटाले में पांच आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि, "ई-मार्केटिंग और कारोबार के नाम पर धोखाधड़ी और छल को छिपाया गया है। यह एक ऐसी श्रृंखला है, जिसमें पहले एक व्यक्ति को ठगा जाता है और फिर उसे दूसरों को ठगकर पैसा कमाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
ऑनलाइन कारोबार और डिजिटल लेनदेन में तेजी से बढ़ोतरी के साथ धोखाधड़ी का खतरा भी बढ़ा है। दुनिया भर में हर दिन बड़ी संख्या में ऑनलाइन ट्रांजैक्शन होने से साइबर अपराधियों के लिए लोगों और कारोबारों को निशाना बनाने के अवसर भी बढ़ गए हैं।
आरोप है कि विहान ने इसी बहुस्तरीय लेनदेन व्यवस्था का फायदा उठाकर अपने ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी की। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कंपनी की कथित अनियमितताएं और विवाद समय-समय पर सार्वजनिक होते रहे हैं, तब भी वह अपना कारोबार कैसे जारी रखे हुए है और लगातार अपने नेटवर्क का विस्तार कैसे कर रही है?
इसका जवाब कंपनी के कर्मचारियों की बेहद प्रभावशाली और सुनियोजित मार्केटिंग रणनीति में छिपा है। ऐसे कई लोग हैं, लेकिन इनमें कुछ नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनमें एवीपी बृजेश यादव और उनकी पत्नी यशु त्यागी शामिल हैं, जिन्होंने क्यूनेट में ब्लू डायमंड स्टार का दर्जा हासिल किया है, जो कंपनी की सबसे ऊंची रैंक में से एक माना जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि बृजेश यादव का काम करने का तरीका काफी सरल है और वह मुख्य रूप से डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं। वह सबसे पहले क्यूनेट में अपनी सफलता की कहानी सुनाकर लोगों को प्रभावित करते हैं और फिर उन्हें सुनहरे भविष्य तथा आर्थिक सफलता के सपने दिखाकर क्यूनेट से जुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। दुर्भाग्यवश, उनकी प्रभावशाली वक्तृत्व कला से प्रभावित होकर कई लोग क्यूनेट से जुड़ जाते हैं और बाद में कथित तौर पर आर्थिक नुकसान का सामना करते हैं।
गौरतलब है कि बृजेश यादव और उनकी पत्नी यशु त्यागी दोनों ही पेशे से योग्य डॉक्टर हैं, लेकिन उन्होंने अधिक कमाई की उम्मीद में क्यूनेट का रास्ता चुना।
इसी तरह, क्यूनेट और उसके नेटवर्क मार्केटिंग तंत्र के प्रमुख स्वतंत्र प्रतिनिधि तथा "एसोसिएट वी पार्टनर" अर्पित मलिक भी तेजी से उभरते प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। नए लोगों को शुरुआती नुकसान से निराश न होने और भविष्य में बड़े लाभ की उम्मीद बनाए रखने की उनकी सलाह क्यूनेट की कार्यप्रणाली और विचारधारा से काफी मेल खाती है।
क्यूनेट और विहान का कारोबारी मॉडल एक साधारण पिरामिड स्कीम की तरह काम करता है, जिसमें शुरुआती स्तर पर जुड़ने वाले लोग कमाई करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे स्वतंत्र प्रतिनिधियों (आईआर) की संख्या बढ़ती जाती है, नए लोगों को इस नेटवर्क से जोड़ना बेहद मुश्किल या लगभग असंभव हो जाता है।
जो लोग बाद में इस नेटवर्क से जुड़ते हैं, वे अक्सर अपनी शुरुआती निवेश राशि तक भी वापस नहीं निकाल पाते और अंततः पूरा मॉडल ढहने लगता है। यह एक बाइनरी नेटवर्किंग मॉडल पर आधारित व्यवस्था है, जिसमें समय के साथ नए सदस्यों को जोड़ना लगातार कठिन होता जाता है और एक समय के बाद यह पूरी योजना ठप पड़ जाती है।
बृजेश यादव, उनकी पत्नी यशु त्यागी और अर्पित मलिक जैसे लोग शुरुआती सदस्यों की सफलता की कहानियों को प्रमुखता से पेश कर नए लोगों को इस कारोबार से जोड़ने का प्रयास करते हैं। इस तरह बड़ी संख्या में बेरोजगार युवाओं को इस नेटवर्क की ओर आकर्षित किया गया है। वहीं दूसरी ओर, ऑनलाइन धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों ने भारत के डिजिटल भविष्य के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।
गृह मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत में ऑनलाइन धोखाधड़ी के कारण लगभग 22,495 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। हालांकि यह आंकड़ा वर्ष 2024 में हुए 22,845 करोड़ रुपये के नुकसान से थोड़ा कम है, लेकिन मामलों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2024 में जहां 22.68 लाख मामले सामने आए थे, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 28.68 लाख हो गई। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आई4सी) हर वर्ष ऑनलाइन धोखाधड़ी के लाखों मामलों को दर्ज करते हैं।
त करने के आरोपों को लेकर समय-समय पर केंद्र और विभिन्न राज्यों की जांच एजेंसियों की नजर रही है। आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आईटीएटी) के रिकॉर्ड भी बताते हैं कि कंपनी द्वारा हांगकांग और सिंगापुर स्थित विदेशी संस्थाओं को किए गए सीमा-पार भुगतानों की जांच की गई थी।
वर्ष 2019 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कंपनी के खिलाफ धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत मामला दर्ज किया था। जांच एजेंसी का आरोप था कि कंपनी की एमएलएम योजना के माध्यम से भारत से 20,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बाहर भेजी गई। इससे पहले ईडी कंपनी के लगभग 137 करोड़ रुपये के बैंक खातों को फ्रीज कर चुकी थी तथा उसकी कई संपत्तियां भी जब्त की गई थीं।
तेलंगाना और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों की पुलिस ने भी कंपनी से जुड़े लोगों के खिलाफ हजारों निवेशकों से कथित धोखाधड़ी के आरोप में एफआईआर दर्ज की हैं और कई लोगों को गिरफ्तार किया है। उपलब्ध कानूनी रिकॉर्ड के अनुसार, अलग-अलग राज्यों में ऐसे मामलों की संख्या 38 तक बताई जाती है।
पिछले वर्ष मार्च में हैदराबाद सिटी पुलिस ने विहान के खिलाफ बड़ा अभियान चलाते हुए तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में दर्ज चार नए मामलों के संबंध में 32 लोगों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार किए गए लोगों में बड़ी संख्या आईटी पेशेवरों की थी। उन पर प्राइज चिट्स एंड मनी सर्कुलेशन स्कीम्स (प्रतिबंध) अधिनियम, 1978 के तहत प्रतिबंधित अवैध धन परिसंचरण (मनी सर्कुलेशन) योजनाएं संचालित करने का आरोप लगाया गया।
अगस्त 2019 में रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज़ ( आरओसी) ने कंपनी के कथित धोखाधड़ीपूर्ण परिचालन ढांचे के आधार पर उसके अनिवार्य परिसमापन (वाइंडिंग-अप) की मांग करते हुए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ( एनसीएलटी) के समक्ष एक औपचारिक याचिका दायर की थी।
इसके बावजूद, विहान लगातार अपने कारोबार का क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर दोनों स्तरों पर विस्तार कर रही है। कंपनी अपने बचाव में मार्च 2017 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए उस स्थगन आदेश का हवाला देती है, जिसके तहत विभिन्न राज्यों में दर्ज कई एफआईआर और जांचों पर रोक लगा दी गई थी। कंपनी का कहना है कि यदि किसी प्रकार की गलत जानकारी, भ्रामक प्रस्तुति या नियमों के उल्लंघन की घटनाएं हुई हैं, तो उसके लिए कंपनी की नीतियां नहीं, बल्कि उसके स्वतंत्र प्रतिनिधि (आईआर) जिम्मेदार हैं।
आलोचकों का आरोप है कि इस तर्क के चलते कंपनी के कर्मचारियों या स्वतंत्र प्रतिनिधियों पर तो कानूनी कार्रवाई की जा सकती है, जबकि कंपनी और उसके शीर्ष प्रबंधन पर कानूनी जवाबदेही तय करना कठिन हो जाता है।
-----------------
हमारे आधिकारिक प्लेटफॉर्म्स से जुड़ें –
🔴 व्हाट्सएप चैनल: https://whatsapp.com/channel/0029VbATlF0KQuJB6tvUrN3V
🔴 फेसबुक: Dainik Jagran MP/CG Official
🟣 इंस्टाग्राम: @dainikjagranmp.cg
🔴 यूट्यूब: Dainik Jagran MPCG Digital
📲 सोशल मीडिया पर जुड़ें और बने जागरूक पाठक।
👉 आज ही जुड़िए
क्यूनेट–विहान ने कथित धोखाधड़ी को नया रूप देने के लिए अपनाई नई रणनीतियां
Digital Desk
करीब एक दशक पहले, वर्ष 2016 में, बहुचर्चित करोड़ों रुपये के क्यूनेट घोटाले में पांच आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि, "ई-मार्केटिंग और कारोबार के नाम पर धोखाधड़ी और छल को छिपाया गया है। यह एक ऐसी श्रृंखला है, जिसमें पहले एक व्यक्ति को ठगा जाता है और फिर उसे दूसरों को ठगकर पैसा कमाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
ऑनलाइन कारोबार और डिजिटल लेनदेन में तेजी से बढ़ोतरी के साथ धोखाधड़ी का खतरा भी बढ़ा है। दुनिया भर में हर दिन बड़ी संख्या में ऑनलाइन ट्रांजैक्शन होने से साइबर अपराधियों के लिए लोगों और कारोबारों को निशाना बनाने के अवसर भी बढ़ गए हैं।
आरोप है कि विहान ने इसी बहुस्तरीय लेनदेन व्यवस्था का फायदा उठाकर अपने ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी की। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कंपनी की कथित अनियमितताएं और विवाद समय-समय पर सार्वजनिक होते रहे हैं, तब भी वह अपना कारोबार कैसे जारी रखे हुए है और लगातार अपने नेटवर्क का विस्तार कैसे कर रही है?
इसका जवाब कंपनी के कर्मचारियों की बेहद प्रभावशाली और सुनियोजित मार्केटिंग रणनीति में छिपा है। ऐसे कई लोग हैं, लेकिन इनमें कुछ नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनमें एवीपी बृजेश यादव और उनकी पत्नी यशु त्यागी शामिल हैं, जिन्होंने क्यूनेट में ब्लू डायमंड स्टार का दर्जा हासिल किया है, जो कंपनी की सबसे ऊंची रैंक में से एक माना जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि बृजेश यादव का काम करने का तरीका काफी सरल है और वह मुख्य रूप से डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं। वह सबसे पहले क्यूनेट में अपनी सफलता की कहानी सुनाकर लोगों को प्रभावित करते हैं और फिर उन्हें सुनहरे भविष्य तथा आर्थिक सफलता के सपने दिखाकर क्यूनेट से जुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। दुर्भाग्यवश, उनकी प्रभावशाली वक्तृत्व कला से प्रभावित होकर कई लोग क्यूनेट से जुड़ जाते हैं और बाद में कथित तौर पर आर्थिक नुकसान का सामना करते हैं।
गौरतलब है कि बृजेश यादव और उनकी पत्नी यशु त्यागी दोनों ही पेशे से योग्य डॉक्टर हैं, लेकिन उन्होंने अधिक कमाई की उम्मीद में क्यूनेट का रास्ता चुना।
इसी तरह, क्यूनेट और उसके नेटवर्क मार्केटिंग तंत्र के प्रमुख स्वतंत्र प्रतिनिधि तथा "एसोसिएट वी पार्टनर" अर्पित मलिक भी तेजी से उभरते प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। नए लोगों को शुरुआती नुकसान से निराश न होने और भविष्य में बड़े लाभ की उम्मीद बनाए रखने की उनकी सलाह क्यूनेट की कार्यप्रणाली और विचारधारा से काफी मेल खाती है।
क्यूनेट और विहान का कारोबारी मॉडल एक साधारण पिरामिड स्कीम की तरह काम करता है, जिसमें शुरुआती स्तर पर जुड़ने वाले लोग कमाई करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे स्वतंत्र प्रतिनिधियों (आईआर) की संख्या बढ़ती जाती है, नए लोगों को इस नेटवर्क से जोड़ना बेहद मुश्किल या लगभग असंभव हो जाता है।
जो लोग बाद में इस नेटवर्क से जुड़ते हैं, वे अक्सर अपनी शुरुआती निवेश राशि तक भी वापस नहीं निकाल पाते और अंततः पूरा मॉडल ढहने लगता है। यह एक बाइनरी नेटवर्किंग मॉडल पर आधारित व्यवस्था है, जिसमें समय के साथ नए सदस्यों को जोड़ना लगातार कठिन होता जाता है और एक समय के बाद यह पूरी योजना ठप पड़ जाती है।
बृजेश यादव, उनकी पत्नी यशु त्यागी और अर्पित मलिक जैसे लोग शुरुआती सदस्यों की सफलता की कहानियों को प्रमुखता से पेश कर नए लोगों को इस कारोबार से जोड़ने का प्रयास करते हैं। इस तरह बड़ी संख्या में बेरोजगार युवाओं को इस नेटवर्क की ओर आकर्षित किया गया है। वहीं दूसरी ओर, ऑनलाइन धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों ने भारत के डिजिटल भविष्य के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।
गृह मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत में ऑनलाइन धोखाधड़ी के कारण लगभग 22,495 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। हालांकि यह आंकड़ा वर्ष 2024 में हुए 22,845 करोड़ रुपये के नुकसान से थोड़ा कम है, लेकिन मामलों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2024 में जहां 22.68 लाख मामले सामने आए थे, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 28.68 लाख हो गई। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आई4सी) हर वर्ष ऑनलाइन धोखाधड़ी के लाखों मामलों को दर्ज करते हैं।
त करने के आरोपों को लेकर समय-समय पर केंद्र और विभिन्न राज्यों की जांच एजेंसियों की नजर रही है। आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आईटीएटी) के रिकॉर्ड भी बताते हैं कि कंपनी द्वारा हांगकांग और सिंगापुर स्थित विदेशी संस्थाओं को किए गए सीमा-पार भुगतानों की जांच की गई थी।
वर्ष 2019 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कंपनी के खिलाफ धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत मामला दर्ज किया था। जांच एजेंसी का आरोप था कि कंपनी की एमएलएम योजना के माध्यम से भारत से 20,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बाहर भेजी गई। इससे पहले ईडी कंपनी के लगभग 137 करोड़ रुपये के बैंक खातों को फ्रीज कर चुकी थी तथा उसकी कई संपत्तियां भी जब्त की गई थीं।
तेलंगाना और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों की पुलिस ने भी कंपनी से जुड़े लोगों के खिलाफ हजारों निवेशकों से कथित धोखाधड़ी के आरोप में एफआईआर दर्ज की हैं और कई लोगों को गिरफ्तार किया है। उपलब्ध कानूनी रिकॉर्ड के अनुसार, अलग-अलग राज्यों में ऐसे मामलों की संख्या 38 तक बताई जाती है।
पिछले वर्ष मार्च में हैदराबाद सिटी पुलिस ने विहान के खिलाफ बड़ा अभियान चलाते हुए तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में दर्ज चार नए मामलों के संबंध में 32 लोगों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार किए गए लोगों में बड़ी संख्या आईटी पेशेवरों की थी। उन पर प्राइज चिट्स एंड मनी सर्कुलेशन स्कीम्स (प्रतिबंध) अधिनियम, 1978 के तहत प्रतिबंधित अवैध धन परिसंचरण (मनी सर्कुलेशन) योजनाएं संचालित करने का आरोप लगाया गया।
अगस्त 2019 में रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज़ ( आरओसी) ने कंपनी के कथित धोखाधड़ीपूर्ण परिचालन ढांचे के आधार पर उसके अनिवार्य परिसमापन (वाइंडिंग-अप) की मांग करते हुए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ( एनसीएलटी) के समक्ष एक औपचारिक याचिका दायर की थी।
इसके बावजूद, विहान लगातार अपने कारोबार का क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर दोनों स्तरों पर विस्तार कर रही है। कंपनी अपने बचाव में मार्च 2017 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए उस स्थगन आदेश का हवाला देती है, जिसके तहत विभिन्न राज्यों में दर्ज कई एफआईआर और जांचों पर रोक लगा दी गई थी। कंपनी का कहना है कि यदि किसी प्रकार की गलत जानकारी, भ्रामक प्रस्तुति या नियमों के उल्लंघन की घटनाएं हुई हैं, तो उसके लिए कंपनी की नीतियां नहीं, बल्कि उसके स्वतंत्र प्रतिनिधि (आईआर) जिम्मेदार हैं।
आलोचकों का आरोप है कि इस तर्क के चलते कंपनी के कर्मचारियों या स्वतंत्र प्रतिनिधियों पर तो कानूनी कार्रवाई की जा सकती है, जबकि कंपनी और उसके शीर्ष प्रबंधन पर कानूनी जवाबदेही तय करना कठिन हो जाता है।
