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रतन टाटा की टेलीकॉम क्रांति: कैसे टाटा डोकोमो ने लाखों के लिए कॉलिंग को सस्ता बना दिया
Digital Desk
रतन टाटा द्वारा शुरू की गई टाटा डोकोमो ने भारतीय टेलीकॉम सेक्टर में एक नई क्रांति ला दी थी। 1 पैसे प्रति सेकंड की कॉल दरों ने लोगों को सस्ते संचार का साधन दिया। जानिए कैसे शुरू हुई थी ये कंपनी, किसने की थी साझेदारी, और फिर क्यों हो गई ये कंपनी बंद
आज रतन टाटा की पहली पुण्यतिथि है। एक सादगी पसंद, दूरदर्शी और जनकल्याण को प्राथमिकता देने वाले उद्योगपति के रूप में रतन टाटा ने न केवल कई बड़ी कंपनियों को खड़ा किया बल्कि देश के टेलीकॉम सेक्टर में भी बड़ा बदलाव लाया। उनकी बनाई एक टेलीकॉम कंपनी ने लोगों को सस्ती कॉलिंग की सुविधा देकर दिलों में खास जगह बना ली थी — उस क्रांतिकारी कंपनी का नाम था Tata Docomo
Tata Docomo की शुरुआत कैसे हुई?
Tata Docomo की कहानी 2008 में शुरू हुई, जब जापान की प्रतिष्ठित टेलीकॉम कंपनी NTT Docomo ने टाटा ग्रुप की दूरसंचार शाखा में 26% हिस्सेदारी खरीदी। इस साझेदारी के बाद कंपनी को नया नाम मिला – Tata Docomo।
1 पैसे प्रति सेकंड प्लान: टेलीकॉम का टर्निंग पॉइंट
2009 में टाटा डोकोमो ने भारतीय ग्राहकों के लिए एक ऐतिहासिक प्लान पेश किया – 1 पैसे प्रति सेकंड। उस समय बाकी कंपनियां कम से कम 1 मिनट के हिसाब से चार्ज करती थीं, भले ही कॉल कुछ सेकंड की ही क्यों न हो। टाटा डोकोमो का यह कदम ग्राहकों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुआ और देखते ही देखते यह प्लान लोकप्रिय हो गया।
इस प्लान की वजह से कंपनी ने लॉन्च के सिर्फ 5 महीने में ही 1 करोड़ से ज्यादा ग्राहकों को जोड़ लिया था। बाद में Airtel और Vodafone-Idea जैसी बड़ी कंपनियों को भी इसी तरह के सेकंड-बेस्ड टैरिफ लॉन्च करने पड़े।
Tata Docomo का अंत क्यों हुआ?
हालांकि Tata Docomo ने कम दरों की वजह से तेजी से लोकप्रियता हासिल की, लेकिन वित्तीय रूप से यह मॉडल ज्यादा टिक नहीं पाया। कंपनी को लगातार घाटा होने लगा। अंततः, 2014 में NTT Docomo ने इस साझेदारी से खुद को अलग कर लिया। इसके बाद कंपनी का अस्तित्व धीरे-धीरे खत्म हो गया और 2018 में Tata Docomo का अधिग्रहण भारती एयरटेल ने कर लिया।
Tata Docomo भले ही अब टेलीकॉम मार्केट में न हो, लेकिन इसके द्वारा शुरू की गई ‘सस्ती कॉल क्रांति’ आज भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा है। रतन टाटा की सोच और सामाजिक दृष्टिकोण ने करोड़ों लोगों को कम खर्च में बातचीत की सुविधा दी और यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी जाती है।
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रतन टाटा की टेलीकॉम क्रांति: कैसे टाटा डोकोमो ने लाखों के लिए कॉलिंग को सस्ता बना दिया
Digital Desk
आज रतन टाटा की पहली पुण्यतिथि है। एक सादगी पसंद, दूरदर्शी और जनकल्याण को प्राथमिकता देने वाले उद्योगपति के रूप में रतन टाटा ने न केवल कई बड़ी कंपनियों को खड़ा किया बल्कि देश के टेलीकॉम सेक्टर में भी बड़ा बदलाव लाया। उनकी बनाई एक टेलीकॉम कंपनी ने लोगों को सस्ती कॉलिंग की सुविधा देकर दिलों में खास जगह बना ली थी — उस क्रांतिकारी कंपनी का नाम था Tata Docomo
Tata Docomo की शुरुआत कैसे हुई?
Tata Docomo की कहानी 2008 में शुरू हुई, जब जापान की प्रतिष्ठित टेलीकॉम कंपनी NTT Docomo ने टाटा ग्रुप की दूरसंचार शाखा में 26% हिस्सेदारी खरीदी। इस साझेदारी के बाद कंपनी को नया नाम मिला – Tata Docomo।
1 पैसे प्रति सेकंड प्लान: टेलीकॉम का टर्निंग पॉइंट
2009 में टाटा डोकोमो ने भारतीय ग्राहकों के लिए एक ऐतिहासिक प्लान पेश किया – 1 पैसे प्रति सेकंड। उस समय बाकी कंपनियां कम से कम 1 मिनट के हिसाब से चार्ज करती थीं, भले ही कॉल कुछ सेकंड की ही क्यों न हो। टाटा डोकोमो का यह कदम ग्राहकों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुआ और देखते ही देखते यह प्लान लोकप्रिय हो गया।
इस प्लान की वजह से कंपनी ने लॉन्च के सिर्फ 5 महीने में ही 1 करोड़ से ज्यादा ग्राहकों को जोड़ लिया था। बाद में Airtel और Vodafone-Idea जैसी बड़ी कंपनियों को भी इसी तरह के सेकंड-बेस्ड टैरिफ लॉन्च करने पड़े।
Tata Docomo का अंत क्यों हुआ?
हालांकि Tata Docomo ने कम दरों की वजह से तेजी से लोकप्रियता हासिल की, लेकिन वित्तीय रूप से यह मॉडल ज्यादा टिक नहीं पाया। कंपनी को लगातार घाटा होने लगा। अंततः, 2014 में NTT Docomo ने इस साझेदारी से खुद को अलग कर लिया। इसके बाद कंपनी का अस्तित्व धीरे-धीरे खत्म हो गया और 2018 में Tata Docomo का अधिग्रहण भारती एयरटेल ने कर लिया।
Tata Docomo भले ही अब टेलीकॉम मार्केट में न हो, लेकिन इसके द्वारा शुरू की गई ‘सस्ती कॉल क्रांति’ आज भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा है। रतन टाटा की सोच और सामाजिक दृष्टिकोण ने करोड़ों लोगों को कम खर्च में बातचीत की सुविधा दी और यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी जाती है।
