धार्मिक परंपरा बनाम न्यायिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, सरकार बोली अंधविश्वास तय करना अदालत का काम नहीं

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महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामलों पर सुनवाई के दौरान केंद्र और अदालत आमने-सामने, न्यायिक समीक्षा के अधिकार पर भी उठे सवाल

धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश और भेदभाव से जुड़े मामलों पर Supreme Court of India में सुनवाई के दौरान बुधवार को केंद्र सरकार और न्यायपालिका के बीच अहम संवैधानिक बहस देखने को मिली। सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने कहा कि कोई भी धर्मनिरपेक्ष अदालत किसी धार्मिक परंपरा को अंधविश्वास घोषित नहीं कर सकती, क्योंकि यह निर्णय विशेषज्ञता का विषय है और इसका अधिकार विधायिका के पास होना चाहिए।

सरकार का तर्क था कि भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में किसी एक समुदाय की धार्मिक प्रथा दूसरे के लिए अंधविश्वास प्रतीत हो सकती है। ऐसे में अदालत द्वारा इस तरह का निर्धारण करना सामाजिक संतुलन के लिए जोखिम भरा हो सकता है।

हालांकि, इस पर न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसके पास न्यायिक समीक्षा का पूर्ण अधिकार है। जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि अदालत यह तय कर सकती है कि कोई प्रथा संवैधानिक मानकों पर खरी उतरती है या नहीं। कानून बनाना विधायिका का कार्य हो सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय का अधिकार केवल उसी तक सीमित नहीं है।

यह मामला लंबे समय से विभिन्न अदालतों में लंबित है और इसकी जड़ें Sabarimala Temple से जुड़े विवाद में हैं, जहां 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहराया था। इसके बाद देशभर से 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।

वर्तमान में 9 जजों की संविधान पीठ 7 से 22 अप्रैल तक इन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और अनुच्छेद 14, 15 और 17 के तहत समानता के अधिकार के बीच संतुलन पर विस्तृत चर्चा हो रही है।

बहस के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई प्रथा सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ जाती है, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है। जस्टिस बागची ने उदाहरण देते हुए पूछा कि यदि जादू-टोना को धार्मिक प्रथा बताया जाए, तो क्या अदालत उसे अंधविश्वास नहीं कह सकती? इस पर सरकार ने कहा कि ऐसे मामलों को सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के दायरे में देखा जाना चाहिए।

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08 Apr 2026 By ANKITA

धार्मिक परंपरा बनाम न्यायिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, सरकार बोली अंधविश्वास तय करना अदालत का काम नहीं

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धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश और भेदभाव से जुड़े मामलों पर Supreme Court of India में सुनवाई के दौरान बुधवार को केंद्र सरकार और न्यायपालिका के बीच अहम संवैधानिक बहस देखने को मिली। सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने कहा कि कोई भी धर्मनिरपेक्ष अदालत किसी धार्मिक परंपरा को अंधविश्वास घोषित नहीं कर सकती, क्योंकि यह निर्णय विशेषज्ञता का विषय है और इसका अधिकार विधायिका के पास होना चाहिए।

सरकार का तर्क था कि भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में किसी एक समुदाय की धार्मिक प्रथा दूसरे के लिए अंधविश्वास प्रतीत हो सकती है। ऐसे में अदालत द्वारा इस तरह का निर्धारण करना सामाजिक संतुलन के लिए जोखिम भरा हो सकता है।

हालांकि, इस पर न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसके पास न्यायिक समीक्षा का पूर्ण अधिकार है। जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि अदालत यह तय कर सकती है कि कोई प्रथा संवैधानिक मानकों पर खरी उतरती है या नहीं। कानून बनाना विधायिका का कार्य हो सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय का अधिकार केवल उसी तक सीमित नहीं है।

यह मामला लंबे समय से विभिन्न अदालतों में लंबित है और इसकी जड़ें Sabarimala Temple से जुड़े विवाद में हैं, जहां 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहराया था। इसके बाद देशभर से 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।

वर्तमान में 9 जजों की संविधान पीठ 7 से 22 अप्रैल तक इन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और अनुच्छेद 14, 15 और 17 के तहत समानता के अधिकार के बीच संतुलन पर विस्तृत चर्चा हो रही है।

बहस के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई प्रथा सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ जाती है, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है। जस्टिस बागची ने उदाहरण देते हुए पूछा कि यदि जादू-टोना को धार्मिक प्रथा बताया जाए, तो क्या अदालत उसे अंधविश्वास नहीं कह सकती? इस पर सरकार ने कहा कि ऐसे मामलों को सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के दायरे में देखा जाना चाहिए।

https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/religious-tradition-vs-judicial-authority-heated-debate-in-supreme-court/article-50574

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